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बुधवार, अप्रैल 08, 2020

लॉकडाउन में घर में ही रहें - डॉ. विद्यावती "मालविका".... प्रस्तुति डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       "कोरोना लॉकडाउन और हम" के अंतर्गत web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 08 अप्रैल 2020 में मेरी माता जी डॉ. विद्यावती सिंह "मालविका" के विचार प्रकाशित किए गए हैं।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=28459

डॉ. विद्यावती "मालविका"


लॉकडाउन में घर में ही रहें
    - डॉ. विद्यावती "मालविका"
    वरिष्ठ साहित्यकार, सागर

    मेरे जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए। मुझे अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा लेकिन मैंने अपनी 90 वर्ष की आयु में पहली बार ऐसी तालाबंदी देखी है। ब्रिटिश काल में तो कई बार कर्फ्यू की स्थिति बन जाती थी और इसी प्रकार दंगे फसाद के समय भी कर्फ्यू लगाया जाता था लेकिन लॉकडाउन मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा है, जब मंदिर के पट भी बंद हैं और अस्पतालों में ओपीडी भी बंद कर दी गई है। पहले जब कर्फ्यू लगाया जाता था तो उस कर्फ्यू के नियमों को तोड़ने वालों पर पुलिस के डंडे चलते थे या उन्हें जेल भेज दिया जाता था, लेकिन आज पुलिसकर्मी अपनी जान जोखिम में डाल कर लॉकडाउन के नियमों का पालन करा रहे हैं। यदि हम नियमों का पालन नहीं करेंगे, सोशल डिस्टेंसिंग नहीं बनाएंगे  तो हम अपने स्वास्थ्य से ही नहीं बल्कि अपने परिवार के, अपने पड़ोसियों के, अपने देशवासियों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाएंगे। यह जीवन और मृत्यु का सवाल है अतः हमें इसे गंभीरता से लेना होगा। कोरोना वायरस को किसी भी हाल में और फैलने नहीं देना है।
     मेरी दोनों बेटियां - बड़ी बेटी डॉ. वर्षा सिंह और छोटी बेटी डॉ. शरद सिंह पहले की तरह मेरा बहुत ख़याल रखती हैं। मुझे चिंतामुक्त रखने के लिए कोरोना से संबंधित अपडेट्स बताती रहती हैं। वे दोनों लॉकडाउन का कड़ाई से पालन कर रही हैं। इसे देख कर मेरी चिंता यूं भी कम हो जाती है । इन दिनों मैं दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत देख रही हूं। इन्हें फिर से देखना सुखद लग रहा है। हमारी कॉलोनी में शांति रहती है। इसका तो नाम ही है शांति विहार कॉलोनी।
     देश में लॉकडाउन पहली बार किया गया है तो  ऐसा संकट भी तो पहली बार आया है। कोरोना वायरस का असर इतना भीषण है कि पूरा देश, पूरी मानव जाति संकट में आ गई है। इस संकट से उबरने के लिए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का आह्वान किया था लेकिन दुख है कि लोगों ने उसका ढंग से पालन नहीं किया। जबकि मोदी जी ने हम सभी भारतीय जनता की भलाई के लिए ही जनता कर्फ्यू लगवाया था और अब यह लॉकडाउन लगाया है। कोरोना वायरस संक्रमण को देखते हुए अत्यधिक सतर्कता बरतने की जरूरत है। कोरोना वायरस से सम्बन्धित लक्षण यदि किसी भी व्यक्ति में पाए जाते है तो उसे तुरंत नजदीकी हस्पताल में ले जाएं।
     प्रशासन बहुत ठीक कर रही है। प्रशासन की तरह मेरा भी सबसे अनुरोध है कि प्रतिदिन घर में रह कर पूजा-पाठ करें। घर से बाहर बिलकुल नहीं निकलें। ईश्वर तो कण-कण में विराजमान हैं। उनकी पूजा के लिए मंदिर जाना ज़रूरी नहीं है।  ईश्वर भक्ति से प्रसन्न होता है, जोकि घर में रह कर भी उतनी ही श्रद्धा से की जा सकती है। घर में रहें और प्रार्थना करें कि दुनिया में सभी मनुष्य स्वस्थ-प्रसन्न रहें। यह मानें कि ईश्वर हमारी परीक्षा ले रहा है और हमें इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना ही है।
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#युवाप्रवर्तक
#लॉकडाउन #कोरोना

शुक्रवार, जनवरी 10, 2020

विश्व हिन्दी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
      विश्व हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ❤💐❤
      मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 10 जनवरी 2020 में स्थान मिला है।
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गुरुवार, नवंबर 14, 2019

बाल दिवस पर विशेष गीत ... ख़्वाब वही था नेहरू का - डॉ. वर्षा सिंह



ख़्वाब जो था बापू गांधी का
 ख़्वाब जो वल्लभभाई का
 ख़्वाब जो था बाबा साहेब का
    ख़्वाब वही था नेहरू का

ख़्वाब वही था नेहरू का
हां, ख़्वाब वही था नेहरू का

नाम जवाहरलाल
शख़्सियत से भी वे तेजस्वी थे
अतुल ऊर्जावान
विश्व की वे इक मानी हस्ती  थे

आज़ादी तो मिली
दर्द भी हमें मिला बंटवारे का
तब नेहरू ने मंत्र दिया था
सबको स्वयं सहारे का

अपने श्रम से तब मिल कर
इतिहास नया लिख डाला था
हमने नव-भारत का कर
निर्माण रचा उजियाला था

प्रगतिशील, औद्योगिक औ
वैज्ञानिक उन्नति के सपने
विकसित देश बने अपना
संकल्प उठाया था सबने

बांध भाखड़ा नांगल जैसे
बड़े-बड़े थर्मल पावर
बना आधुनिक भारत ऐसा
रही नहीं धरती बंजर

कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा का
क्षेत्र नहीं छूटा कोई
सुदृढ़ हुआ अपना भारत तो
ख़्वाब नहीं टूटा कोई

ख़्वाब जो था बापू गांधी का
 ख़्वाब जो वल्लभभाई का
 ख़्वाब जो था बाबा साहेब का
    ख़्वाब वही था नेहरू का

ख़्वाब वही था नेहरू का
हां, ख़्वाब वही था नेहरू का

बच्चों के वे प्रिय चाचा थे
माताओं के बेटे थे
बहनों के भ्राता स्नेही
सबके बड़े चहेते थे

सबकी अपनी अलग शख़्सियत
सबके अपने रूप अलग
समय, काल औ स्थितियों के
प्रति जो मानव रहे सजग

नाम उसी का जग में होता
जिसने जग को जीत लिया
जनहित में कर काम स्वयं को
सीमित रखना सीख लिया

ऐसे महापुरुष दुनिया में
रोज़ नहीं पैदा होते
जो होते हैं उनको खो कर
भी हम कभी नहीं खोते

याद रहेंगे चाचा नेहरू
और उनके सद्कर्म सभी
यह भारत की भूमि तो उनको
भूल सकेगी नहीं कभी

होता है मतभेद विचारों में
भारत हम सबका है
इसका हित सबसे पहले है
शेष गौण सब किस्सा है

एक ख़्वाब करने में पूरा
जन्म व्यर्थ हो जाता है
धन्य वही है जो ख़्वाबों को
सच की राह दिखाता है

ख़्वाब जो था बापू गांधी का
 ख़्वाब जो वल्लभभाई का
 ख़्वाब जो था बाबा साहेब का
    ख़्वाब वही था नेहरू का

ख़्वाब वही था नेहरू का
हां, ख़्वाब वही था नेहरू का

            ----------------


मेरे इस गीत को web magazine "युवा प्रवर्तक" के अंक दिनांक 14 नवम्बर 2019 में स्थान मिला है।
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शुक्रवार, अक्टूबर 25, 2019

धनवन्तरी की अर्चना.... धनतेरस पर हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh


धनतेरस दिनांक 25.10.2019 पर विशेष
धनवन्तरी की अर्चना

                 - डॉ. वर्षा सिंह

रश्मि की मंजुल कलाएं, ज्योति के त्यौहार में जगमगाती तारिकाएं, ज्योति के त्यौहार में 

स्वास्थ्य-सुख की कामना,  धनवन्तरी की अर्चना
आरती करती दिशाएं, ज्योति के त्यौहार में 

दीप माटी के सजे, फिर आ रही दीपावली
गूंजती पावन ऋचाएं, ज्योति के त्यौहार में 

प्रकृति का श्रंगार, स्वर्णिम हार, नख-शिख आभरण
मुग्ध बेसुध व्यंजनाएं, ज्योति के त्यौहार में 

हासमय उल्लास, कातिक मास, मंगल कामना
नेह सिंचित भावनाएं, ज्योति के त्यौहार में 

धूप, अक्षत, पान, सुख का गान, आंगन-द्वार पर
इंद्रधनुषी अल्पनाएं, ज्योति के त्यौहार में

रूप की "वर्षा", नई आशा, नए संकल्प से
झूमती नव वर्तिकाएं, ज्योति के त्यौहार में
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       मेरी इस ग़ज़ल को धनतेरस के अवसर पर web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 25 अक्टूबर 2019 में स्थान मिला है।
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बुधवार, अक्टूबर 16, 2019

करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

करवा चौथ दिनांक 17.10.2019 पर विशेष

सुहागिन बहनों के प्रति शुभकामना

                  - डॉ. वर्षा सिंह

दे  रहा  मन  हो  विह्वल, शुभकामना।
नित खिले सुख का कमल, शुभकामना।

दिन  वसंती  हों, निशा  हेमंतिनी 
सांझ  बरसे  नेह-जल, शुभकामना।

आज के  सपने  सभी साकार हों
और बिखरे हास कल, शुभकामना।

हर्ष  की, उल्लास की  गाथा  गढ़े 
आयु का हर एक पल, शुभकामना।

इंद्रधनुषी  अल्पनाओं  से सजे 
कल्पनाओं  का महल, शुभकामना।

तुम  जहां  हो रोशनी भी हो वहां 
दे  रही  आंखें  सजल, शुभकामना।

भावनाओं के शिखर को चूम कर 
कह रही है यह ग़ज़ल, शुभकामना।

सिर्फ़  छूने  से बने  अमृत कलश 
हर निराशा  का गरल, शुभकामना।

मन की अभिलाषा सदा साकार हो
हर कदम पर हों सफल, शुभकामना।

ज्योत्सना बिखरे सदा सुख शांति की 
है  यही  निर्मल- धवल, शुभकामना।

मांग में  सौभाग्य  की  दें  लालिमा
चंद्र की  किरणें  चपल, शुभकामना।

नित्य "वर्षा"  हो  सरस आल्हाद की 
पल्लवित हो नित नवल, शुभकामना।

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 करवा चौथ पर्व के अवसर पर सृजित मेरी इस ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 17 अक्टूबर 2019 में स्थान मिला है।
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करवा चौथ की काव्यात्मक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह

गुरुवार, जुलाई 18, 2019

गीत.... बचपन की स्मृतियां - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

        मेरे गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 18 जुलाई 2019 में स्थान मिला है।
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*गीत*
बचपन की स्मृतियां
                 - डॉ. वर्षा सिंह

फूलों जैसी ताज़ा अब भी बचपन की स्मृतियां हैं।
खेल-खिलौने, झूला-मस्ती, प्यारी-प्यारी सखियां हैं।

चिंता से पहचान नहीं थी,
बेफिक्री का आलम था
होठों पर लहराता हरदम,
खुशियों वाला परचम था
अब लगता है मानों जैसे बीत गई कुछ सदियां हैं ।
फूलों जैसी ताज़ा अब भी बचपन की स्मृतियां हैं।

दो चुटियों में बंधी हुई थी
उम्मीदों की एक पुड़िया
“वर्षा” को “वर्षा” ना कहकर
कहते थे रानी गुड़िया
जुड़ती रहतीं छुटपन वाली बीते पल की कड़ियां हैं ।
फूलों जैसी ताज़ा अब भी बचपन की स्मृतियां हैं ।

कितना लाड़ प्यार मिलता था
नानी, दादी अम्मा से
रूठा-रूठी मान-मनौव्वल होती
कक्का, मम्मा से
रिश्ते-नातों की रिमझिम से, नम हो जाती अखियां हैं  ।
फूलों जैसी ताज़ा अब भी बचपन की स्मृतियां हैं ।

यह तो है मालूम, नहीं दिन
बीते अब आने वाले
मनवा चाहे जितना इनको
भीतर ही भीतर पाले
बदल गए हैं गांव शहर सब, बदल गई सब कलियां हैं ।
फूलों जैसी ताजा अब भी बचपन की स्मृतियां हैं ।
              -------------
#गीतवर्षा
   
गीत... बचपन की स्मृतियां - डॉ. वर्षा सिंह

गुरुवार, जून 20, 2019

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2019 पर विशेष बुंदेली गीत - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

मेरे बुंदेली गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 21 जून 2019 में स्थान मिला है। 
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अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2019 पर बुंदेली गीत 

योगासन है सबसे न्यारो

            - डॉ. वर्षा सिंह


हो गई भोर सुहानी, ओ बिन्ना

काय परी अलसानी, ओ बिन्ना

मूंड़ पे डारे चदरा- पटका

कसर-मसर तोड़त हो पलका
उठ बैठो महरानी, ओ बिन्ना
हो गई भोर सुहानी, ओ बिन्ना

उठ के कारज रोज के कर ल्यौ

भगवन की छवि ध्यान में धर ल्यौ
भूल के बात पुरानी, ओ बिन्ना
हो गई भोर सुहानी, ओ बिन्ना

भारत देस हमारो प्यारो

योगासन है सबसे न्यारो
दुनिया जाकी दिवानी, ओ बिन्ना
हो गई भोर सुहानी, ओ बिन्ना

काया के सब रोग मिटा ल्यौ

योग करन की लगन लगा ल्यौ
छोड़ो अब मनमानी, ओ बिन्ना
हो गई भोर सुहानी, ओ बिन्ना

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#बुंदेलीवर्षा


बुंदेली गीत - डॉ. वर्षा सिंह


अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस - डॉ. वर्षा सिंह

शनिवार, जून 15, 2019

पितृ दिवस ( फादर्स डे, रविवार, 16 जून 2019) पर विशेष गीत .... पिता यहीं हैं पास - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
यह सिर्फ़ एक गीत ही नहीं, वरन् मेरा आत्मकथ्य भी है....

पिता यहीं हैं पास ...

            - डॉ. वर्षा सिंह

हरदम इक अहसास बना सा रहता है।
पिता यहीं हैं पास, हमेशा लगता है ।।

पिता हुए स्वर्गीय, समय प्रतिकूल हुआ,
निपट अकेली मां ने है पाला-पोसा,
बचपन मेरा था कितना संत्रास घिरा,
बिना पिता की छाया के संघर्ष भरा,
किन्तु पिता की छवि ताज़ा हो जाती है
जब तूफान कहीं कोई भी उठता है।
पिता यहीं हैं पास, हमेशा लगता है ।।

कभी -कभी मन किन्तु ये सोचा करता है,
याद पिता को अक्सर करता रहता है,
पिता अगर जीवित होते तो क्या होता !
जैसा अब है, जीवन वैसा ना रहता,
मेरी अपनी दुनिया भी रोशन होती
अंधियारों में एक दिया - सा जलता है।
पिता यहीं हैं पास, हमेशा लगता है ।।

रक्त उन्हीं का रग में मेरी दौड़ रहा,
जिनका तेजस्वी स्वरूप है मुझे मिला,
ईश्वर को मंजूर यही तो बेशक़ ही,
मुझे नियति से कभी न कोई रहा गिला,
किन्तु न उनका होना भी तो खलता है
बन कर जैसे फांस हृदय में चुभता है।
पिता यहीं हैं पास, हमेशा लगता है ।।
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मेरे इस गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 16 जून 2019 में स्थान मिला है।
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पितृ दिवस पर गीत - डॉ. वर्षा सिंह


Happy Father's Day

शुक्रवार, मई 31, 2019

ग़ज़ल - कुछ बोल पाते हैं नहीं - डॉ. वर्षा सिंह


Dr.Varsha Singh

        मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 28 मई 2019 में स्थान मिला है। 

युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

ग़ज़ल
        - डॉ. वर्षा सिंह


सोचते तो हैं मगर, कुछ बोल पाते हैं नहीं।
बंद दरवाज़े हृदय के खोल पाते हैं नहीं।

सच को परदे में रखें, हम ये नहीं कर पायेंगे
झूठ को हम चाशनी में घोल पाते हैं नहीं।

जी-हज़ूरी से रहे हैं दूर कोसों उम्र भर
चाटुकारी के लिए हम डोल पाते हैं नहीं।

हर तरफ बिक्री-खरीदी, हर तरफ मक्कारियां,
कोई भी शै हम यहां, अनमोल पाते हैं नहीं।

कै़द जिनको कर लिया हो ज़िन्दगी ने बेवज़ह,
आखिरी दम तक कभी पैरोल पाते हैं नहीं।

जो न "वर्षा" कर सके अभिनय किसी भी मंच पर,
वक़्त के नाटक में इच्छित रोल पाते हैं नहीं।
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ग़ज़ल- डॉ. वर्षा सिंह


मंगलवार, मई 21, 2019

ग़ज़ल... सोचो क्या होगा - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 21 मई 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
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ग़ज़ल

सोचो क्या होगा !
                     - डॉ. वर्षा सिंह

टूट गए सब धागे, सोचो क्या होगा
बचे नहीं गर रिश्ते, सोचो क्या होगा

उमड़ रहे हैं काले बादल पश्चिम से
हाथ नहीं हैं छाते, सोचो क्या होगा

धुंधलापन मन पर भी हावी लगता है
आंखों फैले जाले, सोचो क्या होगा

जमे हुए थे जो ''अंगद'' का पांव बने
बदल लिए हैं पाले, सोचो क्या होगा

भंवर मिले तो चप्पू साथ नहीं देते
गर फंसने पर जागे, सोचो क्या होगा

सांझ खड़ी है सिर पर, दीपक शेष नहीं
गहरे होते साये, सोचो क्या होगा

पानी देने में बरती कोताही तो
सूखे सारे पत्ते, सोचो क्या होगा

रात जुन्हाई की न समझी कद्र ज़रा
दिन में दिखते तारे, सोचो क्या होगा

मौसम के ये खेल न "वर्षा" समझी है
जीती बाजी हारे, सोचो क्या होगा

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#ग़ज़लवर्षा

ग़ज़ल - डॉ. वर्षा सिंह

मंगलवार, मई 07, 2019

बाल विवाह के विरुद्ध जागरूकता केन्द्रित बुंदेली गीत... बचपन न छीनो- छिनाओ - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
     
   आज अक्षय तृतीया के अवसर पर  बाल विवाह के विरुद्ध जागरूकता केन्द्रित मेरे बुंदेली गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 07 मई 2019 में स्थान मिला है।

युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

http://yuvapravartak.com/?p=14485

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बचपन न छीनो- छिनाओ
           - डॉ. वर्षा सिंह

बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !
अक्षय तीजा खूबई मनइयो
पुतरा-पुतरियन को ब्याओ रचइयो
नबालिग को ब्याओ न कराओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !

खेलत- पढ़त की जोई उमरिया
मूड़े न धरियो भारी गगरिया
अबई से दुलैया न बनाओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो - छिनाओ मोरी बिन्ना !

अठरा बरस की मोड़ी हो जैहे
इक्किस को मोड़ा जब मिल जैहे
माथे पे सेहरा बंधाओ मोरी बिन्ना
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !

बच्चन की शिक्छा-दिक्छा कराओ
जिम्मेदारी को पाठ पढ़ाओ
मड़वा तबई गड़ाओ  मोरी बिन्ना !
बचपन न छीनो - छिनाओ मोरी बिन्ना !

छोटी उमर को ब्याव बुरो है
जिनगी भर को कष्ट बनो है
समझो जा बात समझाओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !
            -------------
#बुंदेली वर्षा

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सोमवार, अप्रैल 29, 2019

अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस (29.04.2019 ) के अवसर पर विशेष गीत .... नृत्य बिना सूना रहता है - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

सदा सृष्टि में चलता रहता है, ऋतुओं का नर्तन।
नृत्य बिना सूना रहता है प्राणी मात्र का जीवन।

नृत्य सदा परिभाषित करता सुख-दुख के अनुभव को,
अपने सम्मोहन में रखता देव और दानव को,

धरा गगन को बांधे रहता, यह अदृश्य इक बंधन ।
नृत्य बिना सूना रहता है प्राणी मात्र का जीवन।

जड़-चेतन के बीच सेतु की भांति व्यापत रहता है,
नृत्य, जगत के दृश्य-पटल पर इक हलचल रखता है,

मुद्राओं के ताल मेल से खुलते सारे गोपन।
नृत्य बिना सूना रहता है प्राणी मात्र का जीवन।

नृत्य व्यक्त करता है मन की सारी मनोदशा को,
सूर्य, चन्द्रमा से संचालित करता दिवस, निशा को,

शिव का प्रिय, रसिया कान्हा का, नृत्य मर्म का दरपन।
नृत्य बिना सूना रहता है प्राणी मात्र का जीवन।
                     -------------



       मेरे इस गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 30 अप्रैल 2019 में स्थान मिला है। जो कि अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस (International Dance Day दि. 29.04.2019) पर लिखा गया था।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

यदि आप चाहें तो पत्रिका में मेरी ग़ज़ल इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...

http://yuvapravartak.com/?p=14174

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मंगलवार, फ़रवरी 05, 2019

ग़ज़ल .... शिकायत - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों,
       मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 05.02.2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

कृपया पत्रिका में मेरी ग़ज़ल पढ़ने हेतु निम्नलिखित Link पर जायें....

http://yuvapravartak.com/?p=9423

ग़ज़ल

ज़िन्दगी से शिकायत करें भी तो क्या !
हर तरफ है शिकायत का मेला लगा ।

जबसे मैंने भी की दिल्लगी आपसे
रंग बदलने लगा चेहरा आपका ।

अब न कोई यहां जिसको अपना कहें
रास आती नहीं अब यहां की हवा।

जब भी चाहा करूं मैं भी मनमर्जियां
रोक लेते हैं रिश्ते मेरा रास्ता ।

हर किसी को मिले मीत जिसका हो जो
दिल से "वर्षा" के निकली है अब ये दुआ
        - डॉ. वर्षा सिंह

http://yuvapravartak.com/?p=9423