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शुक्रवार, दिसंबर 28, 2018
शनिवार, दिसंबर 22, 2018
शुक्रवार, नवंबर 10, 2017
गुरुवार, नवंबर 02, 2017
शुक्रवार, अगस्त 18, 2017
कविताएं
अक्षर-अक्षर जुड़ कर
बनते शब्द कई
शब्दों से मिल कर बनती है
पंक्ति नई
.....और पंक्ति दर पंक्ति बनी जब कविताएं
बही भाव और संवेगों की सरिताएं
- डॉ वर्षा सिंह
बुधवार, अगस्त 16, 2017
यादों के ठिकाने....
कभी सोते हुए
कभी जागते हुए
अचानक, अप्रयास
सामने आ जाती हैं
बीते हुए दिनों की कतरनें
यादों के ठिकाने
पता नहीं कहां- कहां होते हैं
- डॉ वर्षा सिंह
गुरुवार, अप्रैल 06, 2017
बुधवार, दिसंबर 14, 2016
बुधवार, जुलाई 20, 2016
रविवार, जुलाई 10, 2016
रविवार, जून 05, 2016
पर्यावरण : बुंदेली छंद
पर्यावरण :- एक बुंदेली छंद
- डॉ वर्षा सिंह
काट-काट जंगल खों,
बस्तियां बसाय दईं
मूंड़ धरे घुटनों पे
सबई अब रोए हैं।
‘पर्यावरण’ की मनो
ऐसी- तैसी कर डारी
बेई फल मिलहें जाके
बीजा हमने बोए हैं।
गरमी के मारे सबई
भुट्टा घाईं भुन रए
‘वर्षा’ खों टेर- टेर
बदरा खों रोय हैं।
कछू तो सरम करो
ऐसो- कैसो स्वारथ है
दूध की मटकिया में
मट्ठा जा बिलोए हैं।
-–----
- डॉ वर्षा सिंह
काट-काट जंगल खों,
बस्तियां बसाय दईं
मूंड़ धरे घुटनों पे
सबई अब रोए हैं।
‘पर्यावरण’ की मनो
ऐसी- तैसी कर डारी
बेई फल मिलहें जाके
बीजा हमने बोए हैं।
गरमी के मारे सबई
भुट्टा घाईं भुन रए
‘वर्षा’ खों टेर- टेर
बदरा खों रोय हैं।
कछू तो सरम करो
ऐसो- कैसो स्वारथ है
दूध की मटकिया में
मट्ठा जा बिलोए हैं।
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सोमवार, दिसंबर 28, 2015
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