गुरुवार, जुलाई 30, 2020

हिन्दी काव्य में कथासम्राट प्रेमचंद और उनके कथापात्र - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
कथाकार प्रेमचंद के जन्मदिवस 31 जुलाई पर विशेष:

हिन्दी काव्य में कथासम्राट प्रेमचंद और उनके कथापात्र
- डाॅ. वर्षा सिंह

31 जुलाई 1880 को उत्तरप्रदेश के लमही ग्राम में जन्मे प्रेमचंद ने आधुनिक हिन्दी साहित्य को जिस प्रकार अपने नूतन कथानकों से सूमृद्ध किया, वह अ़िद्वतीय है। जिन दिनों हिन्दी काव्य जगत में  छायावाद की प्रकृति और प्रेम संबंधी कविताएं अपनी कोमल धाराएं बहा रही थीं, उन दिनों जीवन के खुरदरे यथार्थ पर कहानियां लिखने का साहस किया प्रेमचंद ने। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था। आरंभ में वे उर्दू की पत्रिका ‘ज़माना’ में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखते थे। प्रथम कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ (1907) के अंगरेज सरकार द्वारा जब्त किए जाने तथा लिखने पर प्रतिबंध लगाने के बाद वे प्रेमचंद के नए नाम से लिखने लगे। सन् 1919 में उनका हिंदी में पहला उपन्यास ‘‘सेवासदन’’ प्रकाशित हुआ। यह अत्यंत लोकप्रिय हुआ। प्रेमचंद ने लगभग तीन सौ कहानियां भी लिखीं जिनमें तत्कालीन भारतीय समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दशा के दर्शन होते हैं।
Kathakar Premchand
उनका उपन्यास ‘गोदान’ जो कि 1936 में प्रकाशित हुआ था, कृषक जीवन पर लिखी अद्वितीय रचना है। उनकी रचनात्मकता का युग प्रेमचंद युग कहा जाता है। उन्होंने ‘जागरण’ नामक समाचार पत्र तथा ‘हंस’ नामक मासिक साहित्यिक पत्रिका का संपादन किया। वे प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम सभापति रहे। 
प्रेमचंद की कहानियों के पात्र अपनी अमिट छाप के साथ  पाठक के मन-मस्तिष्क पर छा जाते हैं।  होरी, हामिद, धनिया, निर्मला, घीसू जैसे पात्र आमजन जीवन से उठकर आए और प्रेमचंद की कथा-कहानियों में अमरत्व पा गए।
Adam Gondavi
हिन्दी काव्यजगत में भी प्रेमचंद के कथापात्रों का स्मरण करते हुए प्रेमचंद की लेखनी को सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। जैसे अदम गोंडवी कहते हैं-

रोटी के लिए बिक गई धनिया की आबरू
‘लमही’ में प्रेमचंद का  ‘होरी’  उदास है।

गीतकार गुलज़ार ने प्रेमचंद और उनके सृजन पर बहुत गहराई से यह नज़्म कही है-

प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है
लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ बहुत है....

Gulzar
मुंशी जी आप ने कितने दर्द दिए हैं
हम को भी और जिनको आप ने पीस पीस के मारा है
कितने दर्द दिए हैं आप ने हम को मुंशी जी
‘होरी’ को पिसते रहना और एक सदी तक
पोर पोर दिखलाते रहे हो
किस गाय की पूंछ पकड़ के बैकुंठ पार कराना था
सड़क किनारे पत्थर कूटते जान गंवा दी
और सड़क न पार हुई, या तुम ने करवाई नही
‘धनिया’ बच्चे जनती, पालती अपने और पराए भी
ख़ाली गोद रही आख़िर
कहती रही डूबना ही किस्मत में है तो
बोल गढ़ी क्या और गंगा क्या

‘हामिद की दादी’ बैठी चूल्हे पर हाथ जलाती रही
कितनी देर लगाई तुमने एक चिमटा पकड़ाने में
‘घीसू’ ने भी कूजा कूजा उम्र की सारी बोतल पी ली
तलछट चाट के अख़िर उसकी बुद्धि फूटी
नंगे जी सकते हैं तो फिर बिना कफन जलने में क्या है
‘एक सेर इक पाव गंदुम’, दाना दाना सूद चुकाते
सांस की गिनती छूट गई है
तीन तीन पुश्तों को बंधुआ मजदूरी में बांध के तुमने क़लम उठा ली
‘शंकर महतो’ की नस्लें अब तक वो सूद चुकाती हैं.
‘ठाकुर का कुआं’, और ठाकुर के कुएं से एक लोटा पानी
एक लोटे पानी के लिए दिल के सोते सूख गए
‘झोंकू’ के जिस्म में एक बार फिर ‘रायदास’ को मारा तुम ने

वहीं कवि दशरथ मसानिया प्रेमचंद की जीवनी को कविता में पिरोते हुए लिखते हैं -

सन् अट्ठारह सौ अस्सी, लमही सुंदर ग्राम।
Dasharath Masaniya
प्रेमचंद को जनम भयो, हिन्दी साहित काम।।
परमेश्वर पंचन बसें, प्रेमचंद कहि बात।
हल्कू कम्बल बिन मरे, वही पूस की रात।।
सिलिया को भरमाय के, पंडित करता पाप।
धरम ज्ञान की आड़ में, मनमानी चुपचाप।।
बेटी बुधिया मर गई, कफन न पायो अंग।
घीसू माधू झूमते, मधुशाला के संग।।
होरी धनिया मर गए, कर न सके गोदान।
जीवनभर मेहनत करी, प्रेमचंद वरदान।।
मुन्नी तो तरसत रही, आभूषण नहि पाई।
झुनिया गोबर घूमते, बिन शिक्षा के माहि।।
बेटी निर्मला कह रही, कन्या दीजे मेल।
जीवनभर को मरण है, ब्याह होय बेमेल।।
पंच बसे परमात्मा, खाला लिए बुलाय।
शेखा जुम्मन देखते, अलगू करते न्याय।।

प्रेमचंद के कथापात्र वे दलित, शोषित इंसान थे जिन पर प्रेमचंद से
पूर्व इतनी बारीकी से किसी ने कलम नहीं चलाई थी। कथाकार एवं कवयित्री डाॅ शरद सिंह मानती हैं कि ‘‘प्रेमचंद ने समाज का एक समाजशास्त्री की भांति आकलन किया और सुधार के मार्ग सुझाए। उन्होंने समाज में व्याप्त विसंगतियों को अपनी कथासाहित्य के माध्यम से उजागर किया ताकि लोगों का उस ओर ध्यान आकृष्ट हो और समाज सुधार के कदम उठाए जा सकें। उन्होंने विधवा स्त्री से विवाह कर स्वयं इस दिशा में पहल की।’’
प्रेमचंद ने संवेदनाओं एवं भावनाओं को जिस गंभीरता से अपने कथानकों में प्रस्तुत किया है उसे देखते हुए डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने अपनी ग़ज़ल में प्रेमचंद को ‘‘भावनाओं के इक सच्चे कांवरिया’’ कहा है, देखें उनकी पूरी ग़ज़ल -

गोबर, घीसू, माधव, हामिद, होरी एवं धनिया।
प्रेमचंद के जरिए इनसे मिल पाई है दुनिया।

प्रेमचंद ने कथाजगत को वह तबका दिखलाया
जिसका शोषण करते आए सदियों ठाकुर, बनिया।

रात पूस की ठंडी हो कर कैसे जलती आई
कैसे बिना दवा दम तोड़े इक गरीब की मुनिया।

प्रेमचंद ने ‘कफ़न’ कहानी में यथार्थ लिख डाला
दारूखोरों के घर तड़पे एक अभागी तिरिया।

इक मशाल था जिसका लेखन उसको ‘शरद’ नमन है
प्रेमचंद थे भावनाओं के इक सच्चे कांवरिया।

मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डॉ वर्षा सिंह ने भी अपनी ग़ज़लों में यथार्थ के चित्रण के लिए प्रेमचंद के कथापात्रों को प्रतीकों के रूप में शामिल किया है। बानगी देखिए- 

मत रो ‘धनिया’ बरबादी पर, ये तो हरदम होता है
Dr Varsha Singh
कर्जा देना, कुर्की करना, धनवानों की चाहत है।

‘वर्षा’ कैसे हो जब बादल घबराए से दिखते हैं
टैक्स लगे ज्यों दुहरा-तिहरा बूंदों की भी सांसत है।

मेरी एक अन्य ग़ज़ल के कुछ शेर देखें-

सच्चाई की काया देखो, कितनी दुबली- पतली है
जब-जब खुदे पहाड़ यहां पर हरदम चुहिया निकली है।

यूं तो हर मुद्दे पर पूछा -‘‘कहो मुसद्दी ! कैसे हो ? ’’
बोल न पाया लेकिन कुछ भी, मुंह पर रख दी उंगली है।

‘बुधिया’ के मरने पर निकले ‘घीसू’- ‘माधव’ के आंसू
वे आंसू भी नकली ही थे, यह आंसू भी नकली है।

08 अक्टूबर 1936 में प्रेमचंद ने जब इस दुनिया से विदा ली तो अनेक
Nazir Banarasi
साहित्यकारों की क़लम से मानों आंसुओं की धार बह निकली थी। प्रेमचंद की कमी को महसूस करते हुए नज़ीर बनारसी ने लिखा है-

बनके टूटे दिलों की सदा प्रेमचन्द।
देश से कर गये है वफा प्रेमचन्द।
जब कि पूरी जवानी प’ था साम्राज
उस जमाने के है रहनुमा प्रेमचन्द।
देखने में शिकस्ता-सा एक साज है
साथ लाखों दुखे दिल की आवाज है।

प्रेमचंद ने हिन्दी साहित्य में कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने अपने एक अलग मुहावरे गढ़े। उनका सृजन कालजयी है। आज भी प्रासंगिक है। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर है।
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मंगलवार, जुलाई 28, 2020

हिन्दी साहित्य का कैनवास | वर्षा के रंग | गीतों के संग | डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,
         आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन यानी आम बोलचाल की भाषा में असाढ़, सावन, भादों और क्वांर ... वर्षा ऋतु के ये चार माह सुखी मनुष्यों को और अधिक सुख और दुखी मनुष्यों को और अधिक दुख पहुंचाने वाले सिद्ध होते हैं। वर्षा ऋतु का प्रभाव ही ऐसा रहता है कि सामान्य व्यक्ति भी सुख या दुख में डूब कर गुनगुनाने लगता है, फिर कवियों की तो बात ही क्या! ... आज हिन्दी साहित्य के कैनवास पर वर्षा के रंग देखें कुछ चुने हुए गीतों के संग ... 
          फ़िल्म 'कालिदास' का मन्ना डे के द्वारा गाया यह गीत अपने सुना ही होगा-
ओ आषाढ़ के पहले बादल, ओ नभ के काजल!
विरही जनों के करुण अश्रुजल, रुक जा रे एक पल।
दूर दूर मेरा देश जहाँ बिखराए केश,
 विरहन का बनाये वेश
प्रिया मेरी विदेश,कैसे काटे कलेश,
उसे देना मेरा ये सन्देश रे
ओ अषाढ़ के पहले बादल !!
जा रे जा ओ मेघ ओ मेरे दुःख के साथी,
चल एसे ज्यों गगन मार्ग में चलता हाथी।
मंद पवन मुंह खोले चातक बोल रहा है
बाँध कतार बगुलियों का दल डोल रहा है।
राजहंस भी उड़ते है पंखों को ताने,
मित्र विदा के समय हो रहे शगुन सुहाने।
ओ आषाढ़  के  पहले बादल !!
जाते जाते तुम्हें मार्ग में मिलेगा मालव देश,
जहाँ मोहिनी मलिनियों का मधुर मनोहर वेश!
आगे तुमको मित्र मिलेगी कुरुक्षेत्र की भूमि विशाल ,
 महाभारत के महा युद्ध की जहाँ जली थी एक दिन ज्वाल,
कोटि कोटि जहाँ बरस पड़े थे रिपु दल पर अर्जुन के बाण,
कमल दलों पर बरसें ज्यों तेरी बरखा के अगणित  बाण।

       राग मेघमल्हार में निबद्ध विरह श्रृंगार का यह गीत वस्तुतः महाकवि कालिदास के 'मेघदूत’ महाकाव्य पर आधारित है। कालिदासकृत 'ऋतुसंहार' और 'मेघदूत' संस्कृत साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। 'ऋतुसंहार' में तो षडऋतु वर्णन के अंतर्गत वर्षा वर्णन है ही, साथ ही कालिदास ने मेघदूत में विरही यक्ष द्वारा बादलों को अपना दूत बना कर अपनी प्रियतमा को संदेश भेजे जाने का अद्भुत वर्णन किया है। वे कहते हैं-

तस्मिन्‍नद्रो कतिचिदबलाविप्रयुक्‍त: स कामी
नीत्‍वा मासान्‍कनकवलयभ्रंशरिक्‍त प्रकोष्‍ठ:
आषाढस्‍य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्‍टसानु
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।

     अर्थात् स्‍त्री के विछोह में विरही यक्ष ने उस पर्वत पर कई मास बिता दिए। उसकी कलाई
सुनहले कंगन के खिसक जाने से सूनी
दिखने लगी। आषाढ़ मास के पहले दिन पहाड़ की चोटी पर झुके हुए मेघ को उसने देखा तो ऐसा जान पड़ा जैसे क्रीड़ा में मगन कोई हाथी हो।

 हिन्दी साहित्य में वर्षा ऋतु के काव्य सौंदर्य का भंडार है। 'रामचरित मानस' में तुलसीदासजी ने अनेक स्थानों पर अपनी चौपाइयों में वर्षा ऋतु का  वर्णन किया है- घन घमंड नभ गरजत घोरा... दामिनि दमक रह न घन माहीं... बरसहिं जलद भूमि निअराएं... नव पल्लव भए बिटप अनेका... कृषी निरावहिं चतुर किसाना... आदि।
           प्रसिद्ध काव्यकृति 'पद्मावत' में कवि
मलिक मोहम्मद जायसी ने षट-ऋतु वर्णन में वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए लिखा है - रितु पावस बरसे पिउ पावा, सावन-भादौ अधिक सोहावा।
पद्मावती चाहत ऋतु आई, गगन सोहावन भूमि सोहाई।

        सागर, मध्यप्रदेश में जन्में महाकवि पद्माकर का वर्षा ऋतु वर्णन हृदयग्राही है। देखें ये छंद -
चपला चमाकैं चहु ओरन ते चाह भरी
चरजि गई ती फेरि चरजन लागी री ।
कहैं पद्माकर लवंगन की लोनी लता
लरजि गयी ती फेरि लरजन लागी री ।
कैसे धरौ धीर वीर त्रिबिध समीरैं तन
तरजि गयी ती फेरि तरजन लागी री ।
घुमड़ि घमंड घटा घन की घनेरी अबै
गरजि गई ती फेरि गरजन लागी री ।

          अपने षडऋतु वर्णन के लिए पहचाने जाने वाले ख्यातिलब्ध रीतिकालीन कवि सेनापति ने वर्षा ऋतु का बहुत सुंदर वर्णन किया है --
‘सेनापति’ उनए गए जल्द सावन कै ,
चारिह दिसनि घुमरत भरे तोई कै।
सोभा सरसाने ,न बखाने जात कहूँ भांति ,
आने हैं पहार मानो काजर कै ढोइ कै।
धन सों गगन छ्यों,तिमिर सघन भयो ,
देखि न परत मानो रवि गयो खोई कै।
चारि मासि भरि स्याम निशा को भरम मानि ,
मेरी जान, याही ते रहत हरि सोई कै।

           हिन्दी, अरबी, फारसी और देशज शब्दों का ख़ूबसूरती से एकसाथ करने वाले सूफ़ी कवि अमीर खुसरो का यह गीत  लोक का हिस्सा बन कर आज भी जनमानस में समाया हुआ है। विवाहिता बेटी श्रावण में मायके जाने को लालायित हो कर अपनी मां को संदेश भेजती है। देखें यह गीत -
अम्मा मेरे बाबा को भेजो री - कि सावन आया
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री - कि सावन आया
अम्मा मेरे भाई को भेजो री - कि सावन आया
बेटी तेरा भाई तो बाला री - कि सावन आया
अम्मा मेरे मामू को भेजो री - कि सावन आया
बेटी तेरा मामू तो बांका री - कि सावन आया

        धर्म से मुस्लिम हो कर भी हिन्दू  त्यौहारों, रीति-रिवाज़ों से प्रभावित जनकवि नज़ीर अकबराबादी बरसात में भी बहारों को देखते हैं, वे कहते हैं -
हैं इस हवा में क्या-क्या बरसात की बहारें।
सब्जों की लहलहाहट ,बाग़ात की बहारें।
बूँदों की झमझमाहट, क़तरात की बहारें।
हर बात के तमाशे, हर घात की बहारे।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

         कवि सुमित्रानंदन पंत का यह वर्षा गीत आनंदित करने वाला है -
आज दिशा हैं घोर अँधेरी
नभ में गरज रही रण भेरी,
चमक रही चपला क्षण-क्षण पर
झनक रही झिल्‍ली झन-झन कर!
नाच-नाच आँगन में गाते केकी-केका
काले बादल में लहरी चाँदी की रेखा।

      सुप्रसिद्ध  कवयित्री महादेवी वर्मा ने जहां एक ओर 'मैं नीर भरी दुख की बदली' लिख कर स्वयं को प्रकृति से एकाकार कर लिया है वहीं दूसरी ओर प्रिय की प्रतीक्षारत नायिका के मुख से वे कहलवाती हैं -
लाए कौन संदेश नए घन!
अम्बर गर्वित, हो आया नत,
चिर निस्पंद हृदय में उसके
उमड़े री पुलकों के सावन!
लाए कौन संदेश नए घन!

           महाकवि जयशंकर प्रसाद ने 'झरना' में पावस -प्रभात में अत्यंत सुंदर वर्षा वर्णन किया है -
नव तमाल श्यामल नीरद माला भली
श्रावण की राका रजनी में घिर चुकी,
अब उसके कुछ बचे अंश आकाश में
भूले भटके पथिक सदृश हैं घूमते।

अर्ध रात्री में खिली हुई थी मालती,
उस पर से जो विछल पड़ा था, वह चपल
मलयानिल भी अस्त व्यस्त हैं घूमता
उसे स्थान ही कहीं ठहरने को नहीं।

मुक्त व्योम में उड़ते-उड़ते डाल से,
कातर अलस पपीहा की वह ध्वनि कभी
निकल-निकल कर भूल या कि अनजान में,
लगती हैं खोजनें किसी को प्रेम से।

          अपने समय की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कवयित्री डॉ. विद्यावती 'मालविका' ने वर्षा ऋतु पर अनेक गीत लिखे हैं। उनके दो गीतों की बानगी यहां प्रस्तुत है -
बोल सहेली बोल
पंछी बनकर बोल

सावन के काले घने में
हरे भरे जीवन वन में
कर दे मधुर किलोल
सहेली पंछी बनकर बोल

प्रेम भरा संगीत सुना दे
दुनिया का दुख-दर्द मिटा दे
प्रीत गीत अनमोल
सहेली पंछी बनकर बोल

       'मालविका' जी का यह दूसरा गीत देखें -

सुघर सलोनी श्याम घटाओ
बरसो जल बरसाओ
ज्योति-तरंगिणी, आशा-रंगिणी
हरियाली बन आओ
प्यासे हैं वसुधा के कण-कण
तुम्हीं जगाओ सोया जीवन
ताप-विभंजनि, जन-मन-रंजनि
जग की पीर भुलाओ
सुघर सलोनी श्याम घटाओ
बरसो जल बरसाओ

   कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय "हरिऔध" की काव्यपंक्तियां पठनीय हैं -

सखी ! बादल थे नभ में छाये
बदला था रंग समय का
थी प्रकृति भरी करूणा में
कर उपचय मेघ निश्चय का।

वे विविध रूप धारण कर
नभ–तल में घूम रहे थे
गिरि के ऊँचे शिखरों को
गौरव से चूम रहे थे।

वे कभी स्वयं नग सम बन
थे अद्भुत दृश्य दिखाते
कर कभी दुंदभी–वादन
चपला को रहे नचाते।

   वर्षों 'धर्मयुग' पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे कवि   धर्मवीर भारती दिन ढले की बारिश शीर्षक कविता में कहते हैं...
बारिश दिन ढले की
हरियाली-भीगी, बेबस, गुमसुम
तुम हो

और,
और वही बलखाई मुद्रा
कोमल शंखवाले गले की
वही झुकी-मुँदी पलक सीपी में खाता हुआ पछाड़
बेज़बान समन्दर

अन्दर
एक टूटा जलयान
थकी लहरों से पूछता है पता
दूर- पीछे छूटे प्रवालद्वीप का

       कवि शिरोमणि डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" वर्षा ऋतु का स्वागत करते हुए कहते हैं -
झुक गईं शाखाएँ स्वागत में तुम्हारे।
आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।

बुझ गई प्यासी धरा की है पिपासा,
छँट गई व्याकुल हृदय से अब निराशा,
एक अरसे बाद आयी हैं फुहारे।
आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।

धान के पौधों को जीवन मिल गया है,
धूप से झुलसा चमन अब खिल गया है,
पर्वतों पर गा रहे हैं गान धारे।
आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।

      बहुमुखी प्रतिभा की धनी ख्यातिनाम नवगीतकार, ग़ज़लकार, लेखिका, कवयित्री डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का यह नवगीत हृदयग्राही है -
सावन की बूंद जो झरे
बरसाती दिन
अब जाकर हुए हरे ।

यादों ने कूक फिर लगाई
झूले में झूले अंगनाई
आंखों के कूप दो भरे
बरसाती दिन
अब जाकर हुए हरे ।

हरियाए बेल और बूटे
मन तोड़े हर एक खूंटे
तन कब तक को धरे
बरसाती दिन
अब जाकर हुए हरे ।

बिजुरी की दौड़ती चमक
मुखड़े पर जागती दमक
अंजुरी में प्यास को धरे
बरसाती दिन
अब जाकर हुए हरे।

       ब्लॉगर सुजाता प्रिय 'समृद्धि' ने सावनी झूलों का यह बहुत सुंदर गीत लिखा है -
झूला लगा कदम की डाली,
झूल रही मैं मधुवन में ।
चलती मधुर-मधुर पुरवाई,
मस्ती छाई तन-मन में।

आया सावन बड़ा सुहावन,
हरियाली छाई।
देख घटा का रूप सलोना,
मन में मैं हरषाई।
नभ की छटा बड़ी मनभावन,
खुशियाँ' लायी जीवन में।
झूला लगा कदम की डाली,
झूल रही मैं मधुवन में।

        प्रवासी भारतीय कवयित्री एवं पंडित नरेन्द्र शर्मा की  अमेरिका निवासी पुत्री लावण्या शाह का वर्षा गीत देखें -
उमड़-घुमड़कर बरसे,
तृप्त हुई, हरी-भरी, शुष्क धरा।

बागों में खिले कंवल-दल,
कलियों ने ली मीठी अंगड़ाई।
फैला बादल दल, गगन पर मस्ताना
सूखी धरती भीगकर मुस्काई।

 मटमैले पैरों से हल जोत रहा,
कृषक थका गाता पर उमंग भरा।
'मेघा बरसे, मोरा जियरा तरसे,
आंगन देवा, घी का दीप जला जा।'

           प्रखर कवयित्री अनीता सैनी 'दीप्ति' की कविताओं का एक अलग ही प्रभाव पड़ता है पाठक के मनोमस्तिष्क पर। देखें यह उनकी कविता -
कल आसमान साफ़ था
फिर भी दिनभर पानी बरसता रहा।
बरसते पानी ने कहा बरसात नहीं है
बरसात भिगोती है गलाती नहीं।

सीली दीवारों पर चुप्पी की छाया थी
न सूरज निकला न साँझ ढली।
गरजे बादल चमकती रही बिजली
न पक्षी चहके न घोंसले से निकले।

दौड़ते पानी से गलियाँ सिकुड़ी
धुल गए वृक्ष झरते पानी के अनुराग से।
धारा की शोभा सुशोभित हुई
नव किसलय के श्रृंगार से।

.... और अब मेरी अपनी रचना। जी हां, मेरा तो नाम ही वर्षा है, और मैं कवयित्री भी हूं तो मेरे प्रिय ब्लॉग पाठकों,  वर्षा ऋतु पर अपनी लेखनी चलाना मेरा तो प्रथम अधिकार है न 😊
   अतः अंत में मेरी यानी डॉ. वर्षा सिंह की इस वर्षा ऋतु संबंधी रचना का आनंद लें -
गरमी के झुलसाते दिन तो गए बीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
        वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

कितना भी सूखे ने  कहर यहां ढाया,
अब तो है कजरारे  बादल की छाया,
रिमझिम से सजती है पौधों की काया,
इसको ही कहते हैं ऋतुओं की माया,
दुनिया ये न्यारी है, परिवर्तन जारी है
दुख के हज़ार दंश, एक खुशी भारी है
रहती हर  हार  में  छुपी हुई जीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
      वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

मेरे इस चार अंतरे वाले गीत का अंतिम बंध है -
पड़ती हैं  धरती   पर  पावसी फुहारें,
गली-गली बरस  रहीं अमृत की धारें,
मेघों से  करती  है  बिजली  मनुहारें,
टूट रहीं जल-थल के बीच की दीवारें,
बिखरी हरियाली है, छायी खुशहाली है
फूलों के बंधन में, बंधती हर डाली है
पाया है ‘‘वर्षा’’  ने  अपना मनमीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
      वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

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सोमवार, जुलाई 27, 2020

श्रावण शुक्ला सप्तमी | वर्षा विचार | कहावतें | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

  प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि है और आज सोमवार भी है ... श्रावण मास का चतुर्थ सोमवार। श्रावण सोमवार का अपना अलग महत्व है। शिव आराधना के लिए श्रावण सोमवार सर्वाधिक पवित्र दिन माना जाता है।
   श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि कवि संत तुलसीदास जी के जन्म की भी तिथि है, अतः आज तुलसीदास जी का चहुंओर स्मरण किया जा रहा है। विशेष रूप से साहित्यकार और धर्मप्रेमीजन तुलसीदास जी की जयंती मना रहे हैं।
  आज इस सप्तमी तिथि से संबंधित एक और बात मुझे स्मरण आ रही है और वह यह कि श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को वर्षा विचार भी किया जाता रहा है। अनेक कहावतें इससे जुड़ी हुई हैं जिन्हें मैं बचपन में अपने नाना जी से सुनती रही हूं। मेरे नाना ठाकुर संत श्याम चरण सिंह जी लोक से जुड़े हुए एक प्रबुद्ध व्यक्ति थे, असीम ज्ञान का भंडार थे, वे अनेक पुस्तकों के अध्ययन थे और अनेक भाषाओं के जानकार भी । मुझे और मेरी अनुजा सुश्री शरद को हमारे बचपन में वे अनेक ज्ञानवर्धक कथाएं, कहावतें, पहेलियां इत्यादि सुनाते थे। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को चंद्रमा की स्थिति, बादलों की स्थिति, हवा के प्रवाह की दिशा और सूर्योदय का समय इत्यादि को देखकर आगामी बारिश के प्रति अनुमान लगाया जाता था।
   संभवतः ये कहावतें आपने भी सुनी होंगी तथापि अपने नाना जी से सुनी हुई कुछ कहावतें जो मेरी स्मृति में मौजूद हैं, मैं आप सभी ब्लॉग पाठकों से शेयर करना चाहती हूं।

1- श्रावण शुक्ला सप्तमी चंदा दिखे तुरंत। 
या जल मिलहिं समुद्र में या तरणि, कूप भरंत।

अर्थात् श्रावण शुक्ला सप्तमी तिथि को यदि चंद्रमा शाम होते ही तुरंत दिखाई दे तो या पानी समुद्र में ही मिलेगा यानी अकाल पड़ेगा अथवा इतना अधिक पानी बरसेगा कि तालाब, कुएं लबालब मर जाएंगे।

2- श्रावण शुक्ला सप्तमी चंदा दिखे जो रात।
मैं जैहों पिय मालवा, तुम जैहो गुजरात।

अर्थात् श्रावण शुक्ला सप्तमी तिथि को यदि चंद्रमा रात में दिखाई देता रहे तो स्त्री अपने पति से कहेगी कि ऐ मेरे प्रिय, हम दोनों जीविकोपार्जन के लिए बिछुड़ जाएंगे...  मुझे मालवा जाना पड़ेगा और तुम्हें गुजरात जाना पड़ेगा यानी अकाल पड़ना निश्चित है।

3- श्रावण शुक्ला सप्तमी चंदा दिखे न रात।
हरियाले वन- खेत हों, सुखकारी बरसात।

अर्थात् श्रावण शुक्ला सप्तमी तिथि को यदि चंद्रमा रात भर दिखाई न दे तो जंगल - खेत सभी ओर हरियाली रहेगी और सुखदायक पर्याप्त वर्षा होगी। 

4- श्रावण शुक्ला सप्तमी गरजे अधि रात।
बरसै तो झूला पड़ै, बिन बरसे बरसात।

अर्थात् श्रावण शुक्ला सप्तमी तिथि को यदि आधी रात को बादलों की गर्जना सुनाई दे तो या तो पानी बरसेगा और सावन के झूले पड़ेंगे अथवा पानी बरसाये बगैर बादल उड़ जाएंगे।

5- श्रावण शुक्ला सप्तमी, छिपी के उगहिं भान।
तब लगि मेघ बरसिहैं, जब लगि देव उठान ।

अर्थात् श्रावण शुक्ला सप्तमी तिथि को यदि सूर्योदय के बाद भी सूर्य बहुत देर से दिखाई दे और सूर्योदय के समय पानी बरसता रहे तो देवोत्थानी एकादशी तक बरसात होती रहेगी। यानी श्रावण से ले कर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक भरपूर बरसात होती रहेगी।

6-  श्रावण शुक्ला सप्तमी, वायु बहे ईशान।
मन- मयूर नाचन लगै, हरषें सबहि किसान।

अर्थात् श्रावण शुक्ला सप्तमी तिथि को यदि हवा का प्रवाह नैऋत्य से ईशान की ओर रहे तो मन का मयूर नाच उठता है और कृषकों में प्रसन्नता छा जाती है यानी अच्छी बरसात होती है। 

7- श्रावण शुक्ला सप्तमी, थमे वायु की चाल।
दूर देश जैहैं पिया, नाव बंधाए पाल।

अर्थात् श्रावण शुक्ला सप्तमी तिथि को यदि हवा का प्रवाह थमा हुआ हो, वायु गतिमान नहीं हो तो जीविकोपार्जन के लिए स्त्री के पति को नाव में पाल बांध कर जल मार्ग से किसी दूसरे देश जाना पड़ेगा। अर्थात बारिश होने की बहुत कम संभावना रहेगी और अकाल की स्थिति निर्मित हो सकती है।
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सोमवार, जुलाई 20, 2020

शिव आराधना | सोमवती अमावस्या | श्रावण मास | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय मित्रों, आज दिन सोमवार है, तिथि अमावस्या है और मास श्रावण है। अर्थात् शिव-पार्वती पूजन का सबसे पवित्र दिन- 🚩❤ श्रावण मास की सोमवती अमावस्या।🚩
  तो आईए आराधना करें शिव की....

🚩 पंचाक्षर स्त्रोत

 नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नम: शिवाय ।।1।।🚩

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय, नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय, तस्मै मकाराय नम: शिवाय ।।2।।🚩

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय, तस्मै शिकाराय नम: शिवाय ।।3।।🚩

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य, मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय, तस्मै वकाराय नम: शिवाय ।।4।।🚩

यक्षस्वरूपाय जटाधराय, पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय, तस्मै यकाराय नम: शिवाय ।।5।।🚩

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ।।🚩


( फोटो :  बड़े शिव, खुरई रोड, सागर, मध्यप्रदेश में सिंधु नगर, खुरई रोड पर स्थापित 71 फुट ऊंची भगवान शंकर की विशाल प्रतिमा )

गुरुवार, जुलाई 16, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर यूट्यूब वीडियो - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. विद्यावती "मालविका"
प्रिय ब्लॉग पाठकों,
             हिन्दी की वरिष्ठ साहित्यकार, कवयित्री मेरी माताजी डॉ. विद्यावती "मालविका" के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं साहित्यिक अवदान पर केंद्रित वीडियो यूट्यूब चैनल "साहित्य सागर" पर कल दिनांक 15.07.2020 को रिलीज़ किया गया है। जिसकी link निम्नलिखित है....
https://youtu.be/CNeoV6EM9Rw

Pinterest पर इस video को निम्नलिखित link पर देखा जा सकता है।
https://pin.it/2VEb9ym

यूट्यूब पर डॉ. विद्यावती "मालविका"

मित्रों, मैं आपको यहां यह भी बताना चाहूंगी कि मेरी माता जी 92 वर्ष की आयु में भी पठन, पाठन, अध्ययन, मनन में सक्रिय हैं। इस वीडियो में उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं का सस्वर पाठ भी किया है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि इस वीडियो में माता जी के कृतित्व, व्यक्तित्व पर मेरी अनुजा डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने चर्चा की है।


शुक्रवार, जुलाई 10, 2020

लावण्या शाह की मानसून और सावन के झूलों पर कविताएं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों, सहज, सरल स्वभाव की धनी संवेदनशील लेखिका एवं कवयित्री लावण्या शाह उत्तर अमेरिका के ओहायो प्रांत में सिनसिनाटी में रहती हैं। वे सुप्रसिद्ध गीतकार पंडित नरेंद्र शर्मा की पुत्री हैं। भारतीयता उनके रग- रग में बसी है। समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में बी.ए.(आनर्स) की उपाधि प्राप्त लावण्या शाह भारतीय  टेलीविजन दूरदर्शन पर प्रसारित बी.आर.चोपड़ा के धारावाहिक “महाभारत” के लिये कुछ दोहे भी लिख चुकी हैं। उनकी एक चर्चित पुस्तक “फिर गा उठा प्रवासी”  पिता पंडित नरेन्द्र शर्मा की प्रसिद्ध कृति “प्रवासी के गीत” के प्रति श्रद्धांजलि पर आधारित है।
         उनकी नवीनतम पुस्तक "सांग्स फ्रॉम ए मानसून स्विंग एण्ड अदर पोयम"  ( Songs from a Monsoon Swing and Other Poems ) ..... आशा है कि पठनीय होगी और साहित्य प्रेमियों को रुचिकर लगेगी। हिन्दी के पाठकों को इस पुस्तक के हिन्दी अनुवाद की प्रतीक्षा रहेगी।



लावण्या शाह की दो कविताएं यहां प्रस्तुत है....

1. बरखा-सहृदया

उमड़-घुमड़कर बरसे,
तृप्त हुई, हरी-भरी, शुष्क धरा।

बागों में खिले कंवल-दल,
कलियों ने ली मीठी अंगड़ाई।
फैला बादल दल, गगन पर मस्ताना
सूखी धरती भीगकर मुस्काई।

 मटमैले पैरों से हल जोत रहा,
कृषक थका गाता पर उमंग भरा।
'मेघा बरसे, मोरा जियरा तरसे,
आंगन देवा, घी का दीप जला जा।'

रुनझुन-रुनझुन बैलों की जोड़ी,
जिनके संग-संग सावन गरजे।
पवन चलाए बाण, बिजुरिया चमके,
सत्य हुआ है स्वप्न धरा का आज,

पाहुन बन हर घर बरखा जल बरसे।


 लावण्या शाह, लेखिका एवं कवयित्री
2. गुंजित पुरवाई

खिले कंवल से,
लदे ताल पर,
मंडराता मधुकर,
मधु का लोभी।

गुंजित पुरवाई,
बहती प्रति क्षण,
चपल लहर,
हंस, संग-संग हो ली।

एक बदली ने झुककर पूछा,
'मधुकर, तू गुन-गुन क्या गाए?
छपक-छप मार कुलांचे,
मछलियां, कंवल पत्र में,
छिप-छिप जाएं।'

हंसा मधुप रस का लोभी,
बोला, 'कर दो छाया बदली रानी।
मैं भी छिप जाऊं कंवल जाल में,
प्यासे पर कर दो, मेहरबानी।'

रे धूर्त भ्रमर तू रस का लोभी,
फूल-फूल मंडराता निस दिन,
मांग रहा क्यों मुझसे छाया?
गरज रहे घन ना मैं तेरी सहेली।'

 टप-टप बूंदों ने,
बाग, ताल, उपवन पर,
तृण पर, बन पर,
धरती के कण-कण पर,
अमृत रस बरसाया,
निज कोष लुटाया।

अब लो बरखा आई,
हरीतिमा छाई,
आज कंवल में कैद
मकरंद की सुन लो
प्रणयपाश में बंधकर,
हो गई सगाई।

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