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शुक्रवार, जून 26, 2020

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती | कवि जयशंकर प्रसाद को याद करते हुए (भाग 2).... - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,
   30 जनवरी 1889 को जन्में कवि, नाटककार, लेखक जयशंकर प्रसाद ने कामायनी महाकाव्य के साथ अनेक नाटक, उपन्यास तथा कहानी संग्रह की रचना की थी। चन्द्रगुप्त उनकी अद्वितीय नाट्यकृति है। जिसमें यह प्रसंग है कि यवन आक्रमक सेल्यूकश की सेना आक्रमण हेतु भारत की सीमा पर पड़ाव डाले थी। तक्षशिला की राजकुमारी अलका भारत के सैनिको में उत्साहवर्धन करते हुए कहती है कि हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती, स्वयं प्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती। इसे सुनें मेरे स्वर में.....


  हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के, रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाडवाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो, बढ़े चलो, बढ़े चलो!
                             - जयशंकर प्रसाद

कवि जयशंकर प्रसाद को याद करते हुए (भाग 1).... - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,
आज मैं यहां चर्चा कर रही हूं कवि जयशंकर के कृतित्व पर ...जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1890 काशी उत्तर प्रदेश – 15 नवम्बर 1937), हिन्दी कवि, नाटककार, कहानीकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी काव्य में एक तरह से छायावाद की स्थापना की, जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में न केवल कमनीय माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाहित हुई, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई और कामायनी तक पहुँचकर वह काव्य प्रेरक शक्तिकाव्य के रूप में भी प्रतिष्ठित हो गया। बाद के प्रगतिशील एवं नयी कविता दोनों धाराओं के प्रमुख आलोचकों ने उसकी इस शक्तिमत्ता को स्वीकृति दी। इसका एक अतिरिक्त प्रभाव यह भी हुआ कि खड़ीबोली हिन्दी काव्य की निर्विवाद सिद्ध भाषा बन गयी। कामायनी, लहर, झरना आंसू, ध्रुवस्वामिनी, स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त  आदि उनकी प्रमुख कृतियां हैं।