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शुक्रवार, अगस्त 21, 2020

मित्रता पर दोहे | दोहों में मित्रता का आख्यान | डॉ. वर्षा सिंह

         मित्रता से भला कौन परिचित नहीं ? बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक मित्रता कभी भी किसी से भी हो सकती है। मित्रता या दोस्ती दो या अधिक व्यक्तियों के बीच पारस्परिक लगाव का संबंध है। जब दो दिल एक-दूसरे के प्रति सच्ची आत्मीयता से भरे होते हैं, तब उस सम्बन्ध को मित्रता कहते हैं। यह संगठन की तुलना में अधिक सशक्त अंतर्वैयक्तिक बंधन है। मित्रता के अनेक उदाहरण हमारे ग्रंथों में उपलब्ध हैं। यथा - कृष्ण-सुदामा की मित्रता, कृष्ण-द्रौपदी की मित्रता, राम-सुग्रीव की मित्रता, दुर्योधन-कर्ण की मित्रता छत्रपति शिवाजी-महाबली छत्रसाल. की मित्रता आदि। 
    कवियों ने समय-समय पर मित्रता पर काव्यसृजन किया है। आज यहां मैं चर्चा करूंगी मित्रता संदर्भित कुछ नये- पुराने चर्चित दोहों की।

     संत कवि कबीर ने बोलचाल की भाषा का प्रयोग कर लोककल्याण हेतु अनेक दोहे कहे हैं। जो बाद में उनके शिष्यों द्वारा "बीजक" नामक ग्रंथ में संग्रहीत किए गए हैं। अंधविश्वास, जाति-धर्म, अमीरी-ग़रीबी जैसी सामाजिक विषमताओं एवं कुरीतियों के विरोध में कबीर ने जो दोहे कहे, वे आज भी प्रासंगिक हैं। मित्रता के प्रति भी उनका नज़रिया एकदम स्पष्ट है -

कबीर दुनिया से दोस्ती, होेये भक्ति में भंग।
एंका ऐकी राम सो, कै साधुन के संग।।
अर्थात् कबीर का कहना है की दुनिया के लोगों से मित्रता करने पर भक्ति में बाधा होती है।
या तो अकेले में प्रभु का सुमिरन करो या संतो की संगति करो।

कबीर चुनता कन फिरा, हीरा पाया बाट। ताको मरम ना जानिए, ले खलि खाई हाट।।
अर्थात् कबीर चावल का दाना चुनते चल रहे हैं और उन्हें रास्ते में हीरा मिल गया। किंतु उसका महत्व नहीं जानने के कारण वे बाजार में चूना लेकर खा रहे है। सत्संग के बिना ज्ञान नहीं हैं।

गिरिये पर्वत शिखर ते, परिए धरनी मंझार।
मूरख मित्र न कीजिए, बुड़ो काली धार।।

अर्थात् कबीर कहते हैं, कि पर्वत से गिर जाओ या शिखर से गिर पड़ों। चाहो कोई भी परेशानी आ जाए किंतु मूर्ख मित्र से मित्रता मत करो। मूर्ख से मित्रता बहुत भारी पड़ती है और हमें कभी भी मूर्ख मित्रता नहीं करनी चाहिए।

कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खीड भोजन मिलै, साकट संग न जाय।।
अर्थात् साधु की संगत में अगर भूसी भी मिलै तो वह भी श्रेयस्कर है। खीर तथा तमाम तरह के व्यंजन मिलने की संभावना हो तब भी दुष्ट व्यक्ति की संगत न करें।

कबीर संगत साधु की, कभी न निष्फल जाय।
जो पै बोवै भूनिके, फूलै फलै अघाय।। अर्थात् साधुओं की संगति कभी भी व्यर्थ नहीं जाती और उसका समय पर अवश्य लाभ मिलता है। जैसे बीज भूनकर भी बौऐं तो खेती लहलहाती है।

रामचरित मानस के रचयिता तुलसीदास ने मित्रता संदर्भित बहुत ही सुंदर और शिक्षामूलक दोहों की रचना की है। यहां प्रस्तुत हैं उनके कुछ दोहे -

तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक। 
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक।।
अर्थात् जीवन में हर स्थिति का सामना मजबूती से करने की सीख देते हुए तुलसीदास जी कहते हैं, परिस्थिति कितनी ही विपरीत क्यों न हो, मनुष्य के ये 7 गुण उसकी रक्षा करते हैं। आपका ज्ञान और शिक्षा, आपकी विनम्रता, आपकी बुद्धि, आपके भीतर का साहस, आपके अच्छे कर्म, सच बोलने की आदत और राम यानी ईश्वर में विश्वास।

आवत ही हरषै नहीं नैनं नहीं सनेह।
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह।।
अर्थात् अपने सम्मान के प्रति सजग रहने की सीख देते हुए तुलसीदास जी कहते हैं, जिस जगह आपके जाने से लोग प्रसन्न नहीं होते हों, जहां लोगों की आंखों में आपके लिए स्नेह या मित्रता का भाव नहीं हो, वहां हमें कभी नहीं जाना चाहिए। फिर चाहे वहां धन की बारिश ही क्यों न हो रही हो।

अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानां जो रहीम के नाम से विख्यात हैं, ने लौकिक जीवनव्यवहार पक्ष पर अवधी और ब्रजभाषा, दोनों में ही कविता की है जो सरल, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण है। उनके काव्य में श्रृंगार, शांत तथा हास्य रस मिलते हैं। दोहा, सोरठा, बरवै, कवित्त और सवैया उनके प्रिय छंद हैं। रहीम की भाषा अत्यंत सरल है, उनके काव्य में भक्ति, नीति, प्रेम और श्रृंगार का सुन्दर समावेश मिलता है। उन्होंने दोहों का प्रयोग करते हुए मित्रता संदर्भित काव्यसृजन किया है -

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥

अर्थात् प्रेम के धागे को कभी तोड़ना नहीं चाहिए क्योंकि यह यदि एक बार टूट जाता है तो फिर दुबारा नहीं जुड़ता है और यदि जुड़ता भी है तो गांठ तो पड़ ही जाती है।

मथत मथत माखन रहै, दही मही बिलगाय।
रहिमन सोई मीत है भीर परे ठहराय।।

अर्थात् दही को बार बार मथने से दही और मक्खन अलग हो जाते हैं। रहीम कहते हैं कि सच्चा मित्र दुख आने पर तुरंत सहायता के लिये पहुंच जाता है। मित्रता की पहचान दुख में ही होती है।

टूटे सुजन मनाइये जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोहिये, टूटे मुक्ताहार।।

अर्थात् अच्छे व्यक्तियों अर्थात् मित्रों को रूठने पर उसे अनेक प्रकार से मना लेना चाहिये। मूल्यवान मोतियों का हार टूटने पर उसके मोतियों को पुनः पिरो लिया जाता है। 

जलहिं मिलाई रहीम ज्यों, कियो आपु सग छीर।
अगबहिं आपुहि आप त्यों, सकल आंच की भीर ।

अर्थात् दूध पानी को अपने में पूर्णतः मिला लेता है पर दूध को आग पर चढ़ाने से पानी ऊपर आ जाता है और अन्त तक सहता रहता है। सच्चे दोस्त की यही पहचान है। 

कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
विपति कसौटी जे कसे तेई सांचे मीत।।

अर्थात् संपत्ति रहने पर लोग अपने सगे संबंधी अनेक प्रकार से खोज कर बन जाते हैं। लेकिन विपत्ति संकट के समय जो साथ देता है वही सच्चा मित्र संबंधी है।

ये रहीम दर -दर फिरहि, मांगि मधुकरी खाहिं।
यारो-यारी छोड़िये, वे रहीम अब नाहिं ।।

अर्थात् अब रहीम दर-दर फिर रहा है और भीख मांगकर खा रहा है। अब दोस्तों ने भी दोस्ती छोड़ दिया है और अब वे पुराने रहीम नहीं रहे। गरीब रहीम अब मित्रता नहीं निबाह सकता है।

रहिमन तुम हमसों करी, करी-करी जो तीर।
बाढ़े दिन के मीत हो, गाढ़े दिन रघुबीर ।।

अर्थात् कठिनाई के दिनों में मित्र गायब हो जाते हैं और अच्छे दिन आने पर हाजिर हो जाते हैं। केवल प्रभु ही अच्छे और बुरे दिनों के मित्र रहते हैं। मैं अब अच्छे और बुरे दिनों के मित्रों को पहचान गया हूं।

रीतिकालीन कवि बिहारी ने ब्रज भाषा में दोहों का सृजन किया। उनके काव्य में शांत, हास्य, करुण आदि रसों के भी उदाहरण मिल जाते हैं, किंतु मुख्य रस श्रृंगार ही है। उनके दोहों में मित्रता की सुंदर व्याख्या मिलती है -

जौ चाहत, चटकन घटे, मैलौ होइ न मित्त।
रज राजसु न छुवाइ तौ, नेह-चीकन चित्त ॥ 

अर्थात् यदि आप चाहते हैं कि मित्रता की चटक अर्थात् चमक समाप्त न हो तथा मित्रता स्थायी बनी रहे और उसमें दोष उत्पन्न न हों, तो धन-वैभव का इससे सम्बन्ध न होने दें। धन अथवा किसी अन्य वस्तु का लोभ मित्रता को मलिन कर देता है। मित्र के स्नेह से चिकना मन धनरूपी धूल के स्पर्श से मैला हो जाता है; अत: स्नेह में धन का स्पर्श न होने दें। जिस प्रकार तेल से चिकनी वस्तु धूल के स्पर्श से मैली हो जाती है और उसकी चमक घट जाती है, उसी प्रकार प्रेम से कोमल चित्त; धनरूपी धूल के स्पर्श से दोषयुक्त हो जाता है और मित्रता में कमी आ जाती है।

बुरी बुराई जौ तजे, तौ चितु खरौ डरातु ।
ज्यौं निकलंकु मयंकु लखि, गनैं लोग उतपातु ॥

अर्थात् यदि दुष्ट व्यक्ति सहसा अपनी दुष्टता छोड़कर मित्रवत् अच्छा व्यवहार करने लगे तो उससे चित्त अधिक भयभीत होने लगता है। जैसे चन्द्रमा को कलंकरहित देखकर लोग अमंगलसूचक मानने लगते हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार चन्द्रमा का कलंकरहित होना असम्भव है, उसी प्रकार दुष्ट व्यक्ति का एकाएक दुष्टता त्यागना भी असम्भव है।
वर्तमान समय में जहां अतुकांत कविताएं ख़ूब लिखी जा रही हैं, वहीं अनेक सृजनधर्मी गीत, ग़ज़ल और छंदबद्ध रचनाओं का सृजन कर रहे हैं। ऐसी ही एक बहुआयामी सृजनधर्मी हैं डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, जो गद्य के साथ ही पद्य में भी क़लम चला रही हैं। उनके उपन्यास पाठकों को प्रिय हैं तो उनका काव्य भी पसन्द किया जाता है। शरद सिंह के मित्रता संदर्भित कुछ दोहे यहां प्रस्तुत हैं -

सखियां करती थीं सदा, दुख-सुख साझा रोज़।
अब वो सखियां ग़ुम हुईं, मन करता है खोज।।

व्यस्त ज़िंदगी ले गई, सखियों से भी दूर।
इंस्टा पर या फेसबुक, मिलना हुआ ज़रूर।।

गुड्डे-गुड़िया ब्याहना, अब तक हमको याद।
हंसती हम सखियां सभी, होता जब संवाद।।

गूगल पर या ज़ूम पर, होती तो है बात।
लगे अधूरा किन्तु ज्यों, दूल्हा बिना बरात।।

कहते सब हैं - दोस्ती, जोड़े रखती तार।
दशकों गुज़रें या सदी, आती नहीं दरार।।

"शरद"  दोस्त हो या सखी, कभी न छूटे साथ।
भले दूर से ही सही, मिलें दिलों के हाथ।।

दोहों में अपनी अभिव्यक्ति देने में डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' को महारत हासिल है। मित्रता पर उनके कुछ दोहे देखें -

जिस पग पर काँटे चुभें, वहाँ न रखना पैर।
जहाँ एक दिन मित्रता, बाकी दिन हो बैर।।

मतलब की है दोस्ती, मतलब का सब प्यार।
मतलब के ही वास्ते, होती है मनुहार।।

उनसे कैसी मित्रता, जो करते हैं घात।
ऐसे लोगों से बचो, जो करते उत्पात।।

सौ-सौ बार विचारिए, क्या होता है मित्र।
खूब जाँचिए-परखिए, उसका चित्त-चरित्र।।

हँसी-खेल मत समझिए, दुनिया बड़ी विचित्र।
जीवन में है मित्रता, पावन और पवित्र।।

जिसको अपना कह दिया, वो जीवनभर मीत।
सच्ची होनी चाहिए, दिल में उपजी प्रीत।।


     कवि सुशील शर्मा के मित्रता संदर्भित ये चर्चित दोहे भी मित्रता को पारिभाषित करने में सक्षम हैं -

सुख दुख के साथी रहें, बचपन के वो यार।
छिपा छिपाई खेलना, वो गेंदों की मार।

नहीं धर्म अरु जात का, दिखा कभी संयोग।
मित्र सदा मन में बसें, मन से मन का योग।

मित्र कभी लेता नहीं, बस देने की बात।
जिसमें स्वारथ है बसा, मित्र नहीं वह घात।

खुश्बू जैसे दोस्त हैं, महकें चारों ओर।
रिश्तों की इस रात में, मित्र ऊगती भोर।

शब्दों में गाली भरी, मन में बसता प्यार।
मित्र जहाँ भी मिल गए, मन होता गुलजार।

मित्र स्वर्ग की देन हैं , मित्र धरा के रंग।
मित्र सदा मन में बसें, बन जीवन के ढंग।

कृष्ण सुदामा मित्रता ,देती है सन्देश।
ऊँच नीच से दूर हैं, मित्रों के परिवेश।

और अंत में मेरे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह के मित्रता संदर्भित कुछ दोहे यहां प्रस्तुत हैं -

मुंहदेखी की  मित्रता, मुंहदेखी का साथ।
दुख में ऐसे व्यक्ति ही सदा छुड़ायें हाथ।।

कृष्ण-सुदामा की तरह, मित्र न मिलते आज।
चार पलों के कर्ज़ पर, मांगे सौ दिन ब्याज।।

सदा करे जो मित्र के हित में दिल से बात।
मित्र सही "वर्षा" वही, करे न भीतर घात।।

ऊंच-नीच, औकात का नहीं करे जो भेद।
मित्र वही जो मित्र के लिए बहाए स्वेद ।।

निर्भय होकर कर सकें, जिससे मन की बात।
मित्र बने सम्बल सदा दिन हो या हो रात।।

अपने से ज़्यादा रहे जिसे मित्र का ध्यान।
"वर्षा" ऐसे मित्र का करें सदा सम्मान।।

             ------------

#मित्रता #दोहे #दोहाछंद #कबीर #रहीम #तुलसीदास #बिहारी #सुशीलकुमार #शरदसिंह #मयंक #वर्षासिंह #हिन्दीसाहित्य

मंगलवार, जुलाई 28, 2020

हिन्दी साहित्य का कैनवास | वर्षा के रंग | गीतों के संग | डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,
         आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन यानी आम बोलचाल की भाषा में असाढ़, सावन, भादों और क्वांर ... वर्षा ऋतु के ये चार माह सुखी मनुष्यों को और अधिक सुख और दुखी मनुष्यों को और अधिक दुख पहुंचाने वाले सिद्ध होते हैं। वर्षा ऋतु का प्रभाव ही ऐसा रहता है कि सामान्य व्यक्ति भी सुख या दुख में डूब कर गुनगुनाने लगता है, फिर कवियों की तो बात ही क्या! ... आज हिन्दी साहित्य के कैनवास पर वर्षा के रंग देखें कुछ चुने हुए गीतों के संग ... 
          फ़िल्म 'कालिदास' का मन्ना डे के द्वारा गाया यह गीत अपने सुना ही होगा-
ओ आषाढ़ के पहले बादल, ओ नभ के काजल!
विरही जनों के करुण अश्रुजल, रुक जा रे एक पल।
दूर दूर मेरा देश जहाँ बिखराए केश,
 विरहन का बनाये वेश
प्रिया मेरी विदेश,कैसे काटे कलेश,
उसे देना मेरा ये सन्देश रे
ओ अषाढ़ के पहले बादल !!
जा रे जा ओ मेघ ओ मेरे दुःख के साथी,
चल एसे ज्यों गगन मार्ग में चलता हाथी।
मंद पवन मुंह खोले चातक बोल रहा है
बाँध कतार बगुलियों का दल डोल रहा है।
राजहंस भी उड़ते है पंखों को ताने,
मित्र विदा के समय हो रहे शगुन सुहाने।
ओ आषाढ़  के  पहले बादल !!
जाते जाते तुम्हें मार्ग में मिलेगा मालव देश,
जहाँ मोहिनी मलिनियों का मधुर मनोहर वेश!
आगे तुमको मित्र मिलेगी कुरुक्षेत्र की भूमि विशाल ,
 महाभारत के महा युद्ध की जहाँ जली थी एक दिन ज्वाल,
कोटि कोटि जहाँ बरस पड़े थे रिपु दल पर अर्जुन के बाण,
कमल दलों पर बरसें ज्यों तेरी बरखा के अगणित  बाण।

       राग मेघमल्हार में निबद्ध विरह श्रृंगार का यह गीत वस्तुतः महाकवि कालिदास के 'मेघदूत’ महाकाव्य पर आधारित है। कालिदासकृत 'ऋतुसंहार' और 'मेघदूत' संस्कृत साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। 'ऋतुसंहार' में तो षडऋतु वर्णन के अंतर्गत वर्षा वर्णन है ही, साथ ही कालिदास ने मेघदूत में विरही यक्ष द्वारा बादलों को अपना दूत बना कर अपनी प्रियतमा को संदेश भेजे जाने का अद्भुत वर्णन किया है। वे कहते हैं-

तस्मिन्‍नद्रो कतिचिदबलाविप्रयुक्‍त: स कामी
नीत्‍वा मासान्‍कनकवलयभ्रंशरिक्‍त प्रकोष्‍ठ:
आषाढस्‍य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिष्‍टसानु
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श।।

     अर्थात् स्‍त्री के विछोह में विरही यक्ष ने उस पर्वत पर कई मास बिता दिए। उसकी कलाई
सुनहले कंगन के खिसक जाने से सूनी
दिखने लगी। आषाढ़ मास के पहले दिन पहाड़ की चोटी पर झुके हुए मेघ को उसने देखा तो ऐसा जान पड़ा जैसे क्रीड़ा में मगन कोई हाथी हो।

 हिन्दी साहित्य में वर्षा ऋतु के काव्य सौंदर्य का भंडार है। 'रामचरित मानस' में तुलसीदासजी ने अनेक स्थानों पर अपनी चौपाइयों में वर्षा ऋतु का  वर्णन किया है- घन घमंड नभ गरजत घोरा... दामिनि दमक रह न घन माहीं... बरसहिं जलद भूमि निअराएं... नव पल्लव भए बिटप अनेका... कृषी निरावहिं चतुर किसाना... आदि।
           प्रसिद्ध काव्यकृति 'पद्मावत' में कवि
मलिक मोहम्मद जायसी ने षट-ऋतु वर्णन में वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए लिखा है - रितु पावस बरसे पिउ पावा, सावन-भादौ अधिक सोहावा।
पद्मावती चाहत ऋतु आई, गगन सोहावन भूमि सोहाई।

        सागर, मध्यप्रदेश में जन्में महाकवि पद्माकर का वर्षा ऋतु वर्णन हृदयग्राही है। देखें ये छंद -
चपला चमाकैं चहु ओरन ते चाह भरी
चरजि गई ती फेरि चरजन लागी री ।
कहैं पद्माकर लवंगन की लोनी लता
लरजि गयी ती फेरि लरजन लागी री ।
कैसे धरौ धीर वीर त्रिबिध समीरैं तन
तरजि गयी ती फेरि तरजन लागी री ।
घुमड़ि घमंड घटा घन की घनेरी अबै
गरजि गई ती फेरि गरजन लागी री ।

          अपने षडऋतु वर्णन के लिए पहचाने जाने वाले ख्यातिलब्ध रीतिकालीन कवि सेनापति ने वर्षा ऋतु का बहुत सुंदर वर्णन किया है --
‘सेनापति’ उनए गए जल्द सावन कै ,
चारिह दिसनि घुमरत भरे तोई कै।
सोभा सरसाने ,न बखाने जात कहूँ भांति ,
आने हैं पहार मानो काजर कै ढोइ कै।
धन सों गगन छ्यों,तिमिर सघन भयो ,
देखि न परत मानो रवि गयो खोई कै।
चारि मासि भरि स्याम निशा को भरम मानि ,
मेरी जान, याही ते रहत हरि सोई कै।

           हिन्दी, अरबी, फारसी और देशज शब्दों का ख़ूबसूरती से एकसाथ करने वाले सूफ़ी कवि अमीर खुसरो का यह गीत  लोक का हिस्सा बन कर आज भी जनमानस में समाया हुआ है। विवाहिता बेटी श्रावण में मायके जाने को लालायित हो कर अपनी मां को संदेश भेजती है। देखें यह गीत -
अम्मा मेरे बाबा को भेजो री - कि सावन आया
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री - कि सावन आया
अम्मा मेरे भाई को भेजो री - कि सावन आया
बेटी तेरा भाई तो बाला री - कि सावन आया
अम्मा मेरे मामू को भेजो री - कि सावन आया
बेटी तेरा मामू तो बांका री - कि सावन आया

        धर्म से मुस्लिम हो कर भी हिन्दू  त्यौहारों, रीति-रिवाज़ों से प्रभावित जनकवि नज़ीर अकबराबादी बरसात में भी बहारों को देखते हैं, वे कहते हैं -
हैं इस हवा में क्या-क्या बरसात की बहारें।
सब्जों की लहलहाहट ,बाग़ात की बहारें।
बूँदों की झमझमाहट, क़तरात की बहारें।
हर बात के तमाशे, हर घात की बहारे।
क्या - क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

         कवि सुमित्रानंदन पंत का यह वर्षा गीत आनंदित करने वाला है -
आज दिशा हैं घोर अँधेरी
नभ में गरज रही रण भेरी,
चमक रही चपला क्षण-क्षण पर
झनक रही झिल्‍ली झन-झन कर!
नाच-नाच आँगन में गाते केकी-केका
काले बादल में लहरी चाँदी की रेखा।

      सुप्रसिद्ध  कवयित्री महादेवी वर्मा ने जहां एक ओर 'मैं नीर भरी दुख की बदली' लिख कर स्वयं को प्रकृति से एकाकार कर लिया है वहीं दूसरी ओर प्रिय की प्रतीक्षारत नायिका के मुख से वे कहलवाती हैं -
लाए कौन संदेश नए घन!
अम्बर गर्वित, हो आया नत,
चिर निस्पंद हृदय में उसके
उमड़े री पुलकों के सावन!
लाए कौन संदेश नए घन!

           महाकवि जयशंकर प्रसाद ने 'झरना' में पावस -प्रभात में अत्यंत सुंदर वर्षा वर्णन किया है -
नव तमाल श्यामल नीरद माला भली
श्रावण की राका रजनी में घिर चुकी,
अब उसके कुछ बचे अंश आकाश में
भूले भटके पथिक सदृश हैं घूमते।

अर्ध रात्री में खिली हुई थी मालती,
उस पर से जो विछल पड़ा था, वह चपल
मलयानिल भी अस्त व्यस्त हैं घूमता
उसे स्थान ही कहीं ठहरने को नहीं।

मुक्त व्योम में उड़ते-उड़ते डाल से,
कातर अलस पपीहा की वह ध्वनि कभी
निकल-निकल कर भूल या कि अनजान में,
लगती हैं खोजनें किसी को प्रेम से।

          अपने समय की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली कवयित्री डॉ. विद्यावती 'मालविका' ने वर्षा ऋतु पर अनेक गीत लिखे हैं। उनके दो गीतों की बानगी यहां प्रस्तुत है -
बोल सहेली बोल
पंछी बनकर बोल

सावन के काले घने में
हरे भरे जीवन वन में
कर दे मधुर किलोल
सहेली पंछी बनकर बोल

प्रेम भरा संगीत सुना दे
दुनिया का दुख-दर्द मिटा दे
प्रीत गीत अनमोल
सहेली पंछी बनकर बोल

       'मालविका' जी का यह दूसरा गीत देखें -

सुघर सलोनी श्याम घटाओ
बरसो जल बरसाओ
ज्योति-तरंगिणी, आशा-रंगिणी
हरियाली बन आओ
प्यासे हैं वसुधा के कण-कण
तुम्हीं जगाओ सोया जीवन
ताप-विभंजनि, जन-मन-रंजनि
जग की पीर भुलाओ
सुघर सलोनी श्याम घटाओ
बरसो जल बरसाओ

   कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय "हरिऔध" की काव्यपंक्तियां पठनीय हैं -

सखी ! बादल थे नभ में छाये
बदला था रंग समय का
थी प्रकृति भरी करूणा में
कर उपचय मेघ निश्चय का।

वे विविध रूप धारण कर
नभ–तल में घूम रहे थे
गिरि के ऊँचे शिखरों को
गौरव से चूम रहे थे।

वे कभी स्वयं नग सम बन
थे अद्भुत दृश्य दिखाते
कर कभी दुंदभी–वादन
चपला को रहे नचाते।

   वर्षों 'धर्मयुग' पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे कवि   धर्मवीर भारती दिन ढले की बारिश शीर्षक कविता में कहते हैं...
बारिश दिन ढले की
हरियाली-भीगी, बेबस, गुमसुम
तुम हो

और,
और वही बलखाई मुद्रा
कोमल शंखवाले गले की
वही झुकी-मुँदी पलक सीपी में खाता हुआ पछाड़
बेज़बान समन्दर

अन्दर
एक टूटा जलयान
थकी लहरों से पूछता है पता
दूर- पीछे छूटे प्रवालद्वीप का

       कवि शिरोमणि डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" वर्षा ऋतु का स्वागत करते हुए कहते हैं -
झुक गईं शाखाएँ स्वागत में तुम्हारे।
आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।

बुझ गई प्यासी धरा की है पिपासा,
छँट गई व्याकुल हृदय से अब निराशा,
एक अरसे बाद आयी हैं फुहारे।
आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।

धान के पौधों को जीवन मिल गया है,
धूप से झुलसा चमन अब खिल गया है,
पर्वतों पर गा रहे हैं गान धारे।
आ गई वर्षा हमारे आज द्वारे।।

      बहुमुखी प्रतिभा की धनी ख्यातिनाम नवगीतकार, ग़ज़लकार, लेखिका, कवयित्री डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का यह नवगीत हृदयग्राही है -
सावन की बूंद जो झरे
बरसाती दिन
अब जाकर हुए हरे ।

यादों ने कूक फिर लगाई
झूले में झूले अंगनाई
आंखों के कूप दो भरे
बरसाती दिन
अब जाकर हुए हरे ।

हरियाए बेल और बूटे
मन तोड़े हर एक खूंटे
तन कब तक को धरे
बरसाती दिन
अब जाकर हुए हरे ।

बिजुरी की दौड़ती चमक
मुखड़े पर जागती दमक
अंजुरी में प्यास को धरे
बरसाती दिन
अब जाकर हुए हरे।

       ब्लॉगर सुजाता प्रिय 'समृद्धि' ने सावनी झूलों का यह बहुत सुंदर गीत लिखा है -
झूला लगा कदम की डाली,
झूल रही मैं मधुवन में ।
चलती मधुर-मधुर पुरवाई,
मस्ती छाई तन-मन में।

आया सावन बड़ा सुहावन,
हरियाली छाई।
देख घटा का रूप सलोना,
मन में मैं हरषाई।
नभ की छटा बड़ी मनभावन,
खुशियाँ' लायी जीवन में।
झूला लगा कदम की डाली,
झूल रही मैं मधुवन में।

        प्रवासी भारतीय कवयित्री एवं पंडित नरेन्द्र शर्मा की  अमेरिका निवासी पुत्री लावण्या शाह का वर्षा गीत देखें -
उमड़-घुमड़कर बरसे,
तृप्त हुई, हरी-भरी, शुष्क धरा।

बागों में खिले कंवल-दल,
कलियों ने ली मीठी अंगड़ाई।
फैला बादल दल, गगन पर मस्ताना
सूखी धरती भीगकर मुस्काई।

 मटमैले पैरों से हल जोत रहा,
कृषक थका गाता पर उमंग भरा।
'मेघा बरसे, मोरा जियरा तरसे,
आंगन देवा, घी का दीप जला जा।'

           प्रखर कवयित्री अनीता सैनी 'दीप्ति' की कविताओं का एक अलग ही प्रभाव पड़ता है पाठक के मनोमस्तिष्क पर। देखें यह उनकी कविता -
कल आसमान साफ़ था
फिर भी दिनभर पानी बरसता रहा।
बरसते पानी ने कहा बरसात नहीं है
बरसात भिगोती है गलाती नहीं।

सीली दीवारों पर चुप्पी की छाया थी
न सूरज निकला न साँझ ढली।
गरजे बादल चमकती रही बिजली
न पक्षी चहके न घोंसले से निकले।

दौड़ते पानी से गलियाँ सिकुड़ी
धुल गए वृक्ष झरते पानी के अनुराग से।
धारा की शोभा सुशोभित हुई
नव किसलय के श्रृंगार से।

.... और अब मेरी अपनी रचना। जी हां, मेरा तो नाम ही वर्षा है, और मैं कवयित्री भी हूं तो मेरे प्रिय ब्लॉग पाठकों,  वर्षा ऋतु पर अपनी लेखनी चलाना मेरा तो प्रथम अधिकार है न 😊
   अतः अंत में मेरी यानी डॉ. वर्षा सिंह की इस वर्षा ऋतु संबंधी रचना का आनंद लें -
गरमी के झुलसाते दिन तो गए बीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
        वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

कितना भी सूखे ने  कहर यहां ढाया,
अब तो है कजरारे  बादल की छाया,
रिमझिम से सजती है पौधों की काया,
इसको ही कहते हैं ऋतुओं की माया,
दुनिया ये न्यारी है, परिवर्तन जारी है
दुख के हज़ार दंश, एक खुशी भारी है
रहती हर  हार  में  छुपी हुई जीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
      वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

मेरे इस चार अंतरे वाले गीत का अंतिम बंध है -
पड़ती हैं  धरती   पर  पावसी फुहारें,
गली-गली बरस  रहीं अमृत की धारें,
मेघों से  करती  है  बिजली  मनुहारें,
टूट रहीं जल-थल के बीच की दीवारें,
बिखरी हरियाली है, छायी खुशहाली है
फूलों के बंधन में, बंधती हर डाली है
पाया है ‘‘वर्षा’’  ने  अपना मनमीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
      वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

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बुधवार, नवंबर 15, 2017

‘सामयिक सरस्वती’ पत्रिका में मेरी छः ग़ज़लें - डॉ वर्षा सिंह

Ghazals of Dr Varsha Singh in  Samayik Saraswati Oct.-Dec 2017

Ghazals of Dr Varsha Singh in  Samayik Saraswati Oct.-Dec 2017
हिन्दी साहित्य जगत् की लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण पत्रिका ‘‘सामयिक सरस्वती’’ के अक्टूबर-दिसम्बर 2017 अंक में मेरी छः ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं।
मैं आभारी हूं ‘‘सामयिक सरस्वती’’ के संपादक महेश भारद्वाज जी की जिन्होंने मेरी ग़ज़लों को अपनी पत्रिका में स्थान दिया।