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रविवार, मार्च 25, 2018

क्या किया सोचो कभी तो

बेबसी में ज़िन्दगानी
बोतलों में बंद पानी

काटना होगा जो बोया
है यही चिंता पुरानी

नीर के स्त्रोतों से कब तक
और होगी छेड़खानी

कल धरा का रूप क्या हो !
दिख रही जो आज धानी

गर नहीं सत्ता रहेगी
कौन राजा, कौन रानी !

क्या किया, सोचो कभी तो
गुम कुंआ, नदिया सुखानी

काटना होगा जो बोया
रीत दुनिया की पुरानी

रह न जाये याद बन कर
बूंद-"वर्षा" की कहानी

- डॉ. वर्षा सिंह

रविवार, जून 05, 2016

पर्यावरण : बुंदेली छंद

पर्यावरण :- एक बुंदेली छंद
      - डॉ वर्षा सिंह

काट-काट जंगल खों,
बस्तियां बसाय दईं
मूंड़ धरे घुटनों पे
सबई अब रोए हैं।

‘पर्यावरण’ की मनो
ऐसी- तैसी कर डारी
बेई फल मिलहें जाके
बीजा हमने बोए हैं।

गरमी के मारे सबई
भुट्टा घाईं भुन रए
‘वर्षा’ खों टेर- टेर
बदरा खों रोय हैं।

कछू तो सरम करो
ऐसो- कैसो स्वारथ है
दूध की मटकिया में
मट्ठा जा बिलोए हैं।
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