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मंगलवार, अक्टूबर 08, 2019

🚩विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🚩- डॉ. वर्षा सिंह


          बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय के महापर्व विजयादशमी की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌺🙏

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        शारदीय नवरात्रि के नौ दिन दुर्गा पूजा के उपरांत दसवें दिन मनाई जाने वाली विजयादशमी अभिमान,अत्याचार एवं बुराई पर सत्य,धर्म और अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
दशहरा दस पापों को हरनेवाला, दस शक्तियों को विकसित करनेवाला, दसों दिशाओं में मंगल करनेवाला और दस प्रकार की विजय देनेवाला पर्व है, इसलिए इसे ‘विजयादशमी’ भी कहते हैं ।

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह

      विजयादशमी को जीत का पर्व भी कहते हैं। रावण से जीतने हेतु श्रीराम ने भगवती दुर्गा की 9 दिन आराधना की थी और उनके आशीर्वाद से दसवें दिन रावण का वध किया था, इसलिये इसे विजयादशमी के रूप में मनाते हैं।
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       जब जब संसार मे असत्य अन्याय होता है तब तब कोई दैवीय शक्ति असत्य व अन्याय का अंत करती है। रावण अन्यायकारी था व श्रीरामजी मानवता कल्याणप्रिय थे। इनके युद्ध में श्रीराम जी की जीत हुई। यानी विजयादशमी प्रतीक है अन्याय पर न्याय की जीत का।
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 #विजयादशमी
#VijayaDashami

शुक्रवार, अक्टूबर 19, 2018

विजयादशमी की शुभकामनाएं Happy Dussehra


Dr. Varsha Singh
विजयादशमी के पावनपर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं🙏
आईये, इस अवसर पर तुलसीदास कृत रामचरित मानस के इस छंद का स्मरण करें

जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।। 
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।। 
रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।
महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।।
मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।। 
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।। 
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।। 
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।
नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।। 
एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।
सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।। 
तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।।
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।। 
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
श्री राम दरबार