#डॉ_सुश्री_शरद_सिंह #कस्बाई_सीमोन #उपन्यास #सामयिक_प्रकाशन #वान्या_प्रकाशन #माली_गीता
उपन्यास लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
उपन्यास लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, अगस्त 25, 2020
शरद सिंह कृत 'कस्बाई सीमोन' में स्त्री विमर्श | उपन्यास | शोधकर्ता माली गीता | डॉ. वर्षा सिंह
प्रिय बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद के प्रादेशिक "पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार " मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रतिष्ठित "वागीश्वरी सम्मान" और हेमंत फाउण्डेशन, मुंबई के राष्ट्रीय "विजय वर्मा कथा सम्मान" से सम्मानित उनकी पुस्तक 'कस्बाई सिमोन' (उपन्यास) पर शोधात्मक पुस्तक के प्रकाशन पर बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं 💐❤💐
गुरुवार, अप्रैल 23, 2020
📖 विश्व पुस्तक दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं 📚 - डॉ. वर्षा सिंह
![]() |
| Dr. Varsha Singh |
आज विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल) पर "नवदुनिया" सागर संस्करण में मेरे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह के विचारों को स्थान मिला है। 📖
हार्दिक आभार "नवदुनिया" 🙏💐
मित्रों, इस विशेष फीचर के कुल तीन सहभागियों में मेरे साथ मेरी बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह एवं डॉ. आशुतोष मिश्रा के विचार भी प्रकाशित हुए हैं।📚
कृपया पढ़ें और प्रतिक्रिया से अवगत करायें 🙏
आप सभी को विश्व पुस्तक दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं 🙏💐 📚📙📔📖
मेरे विचार ...
*किताबें मेरी सबसे अच्छी मित्र*
- डॉ. वर्षा सिंह, वरिष्ठ कवयित्री
लगती भले हों पहेली किताबें ।
बनती हैं हरदम सहेली किताबें।
चाहे ये दुनिया अगर रूठ जाये
नहीं रूठती इक अकेली किताबें।
मेरी ये काव्य पंक्तियां किताबों के प्रति मेरी सहज अभिव्यक्ति है। जी हां, किताबें बचपन से ही मेरी मित्र रही हैं। पहले पंचतंत्र और जातक कथाओं सरीखी किताबें, फिर क्रमशः अनेक कविता, कथा, उपन्यास, एकांकी, नाटक से भरपूर किताबें... ज़िन्दगी का शायद ही कोई दिन ऐसा रहा हो जब मैंने किसी किताब को हाथ नहीं लगाया हो। यानी हर दिन किताबों का साथ।
ढेरों ढेर किताबों में वह किताब जिसके लिए मैं यह कह सकती हूं कि यह हमेशा मेरे दिल के बहुत क़रीब रही और जिसने मेरी ज़िन्दगी को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई... वह है "अज्ञेय" का उपन्यास "अपने-अपने अजनबी"। यह वैयक्तिक यथार्थबोध पर आधारित उपन्यास है। आधुनिक युग में सबसे बड़ी विड़म्बना यह है कि हम साथ होते हुए भी आतंरिक रूप से बहुत अकेले होते हैं। करीब रहकर भी एक-दूसरे को समझ नहीं पाते हैं, एक-दूसरे के लिए अजनबी बने रहते हैं। 80 के दशक में इसे पढ़ने-समझने के बाद मेरा समूचा व्यक्तित्व अंतर्मुखी से बाह्यमुखी हो गया।
![]() |
| Happy World Book Day |
-------------------------
सोमवार, नवंबर 20, 2017
पाठक मंच
पाठक मंच सागर नगर की मासिक गोष्ठी में लेखक साने गुरुजी के उपन्यास "श्याम की मां" (प्रसिद्ध मराठी लेखक एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पांडुरंग सदाशिव साने की मूल मराठी पुस्तक "श्यामची आई " का संध्या पेडणेकर द्वारा हिन्दी अनुवाद ) पर चर्चा हुई.
तस्वीरों में डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. शरद सिंह एवं अन्य
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

