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शनिवार, नवंबर 07, 2020

जीवन | गीत | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

गीत
      जीवन
          - डॉ. वर्षा सिंह

हंसी-खुशी, दुख-आंसू तब तक
जब तक भी यह जीवन है ।।
फिर अनंत तक का सफर अनवरत
टूटा हर एक बंधन है ।।

तिरस्कार, उपहास, मान के
सारे किस्से बेमानी
गागर सागर में डूबी तो
मिलता पानी से पानी

भुला हक़ीक़त मानव का मन 
करता रहता नर्तन है ।।

साथ समय के नाम-ख्याति सब 
भुला दिए जाते हैं 
नई-नई घटनाएं लेकर 
दिवस-वर्ष आते हैं

इस दुनिया की फ़ितरत सबको 
भाता जो भी नूतन है ।।

आपस में संग्राम किस लिए 
राग-द्वेष सब व्यर्थ यहां 
हर पल धुंधले होते दर्पण 
खो देते हैं अर्थ है यहां 

जब तक "वर्षा" की रिमझिम है 
तब तक भादों,सावन है ।।
       --------
#गीतवर्षा #गीत #जीवन #सावन #सागर #रिमझिम #दर्पण

मंगलवार, अक्टूबर 20, 2020

हरसिद्धी देवी | रानगिर | सागर | नवरात्रि | शुभकामनाएं | डॉ. वर्षा सिंह

🙏🚩 सभी ब्लॉग पाठकों को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 🚩🙏

🚩 जय मैया हरसिद्धी रानगिर 🚩
प्रिय मित्रों, मध्यप्रदेश के सागर ज़िले में आदि शक्ति मां जगदम्बा कई रूपों में विराजमान हैं। यहां रहली तहसील में उनका एक रूप है - रानगिर की मां हरसिद्धी देवी। यहां सामान्य तौर पर पूरे साल भक्त देवी के दर्शन करने आते हैं। शारदीय नवरात्र में इस सिद्ध पीठ में भक्तों की भीड़ पूरे नौ दिन लगी रहती है। किन्तु इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण भक्तों की संख्या कम ही है। मेलों का आयोजन भी नहीं किया गया है। 
      सागर से करीब 46 किलोमीटर दूर स्थित प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र रानगिर अपने आप में इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि यहां देहार नदी के किनारे स्थित प्राचीन मंदिर में विराजीं मां हरसिद्धि देवी की मूर्ति दिन में तीन रूप में अपने भक्तों को दर्शन देती हैं। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा कवच के आधार पर स्वयं ब्रह्मा जी ने ऋषियों को नवदुर्गा के नामों का उल्लेख करते हुए कहा है कि-
“प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चंद्रघण्टेति, कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।
पंचमं स्कंदमातेति,षष्ठं कात्यायनीति च ,
सप्तमं कालरात्रीति,महागौरीति चाष्टमम् ।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः।।
    नवीं देवी सिद्धिदात्री भक्तों की मनोकामनाएं सिद्ध करने वाली देवी ही रानगिर में हरसिद्धी के रूप में विराजमान हैं । सुबह के समय कन्या, दोपहर में युवा और शाम के समय प्रौढ़ रुप में माता दर्शन देती हैैं। यह सूर्य, चंद्र, अग्नि शक्ति के प्रकाशमय, तेजोमय व अमृतमय करने का संकेत है। किवदंती है कि देवी भगवती के 52 सिद्ध शक्ति पीठों में से एक रानगिर है। जहां सती की रान गिरी थी। इसलिए इस क्षेत्र को रानगिर कहा जाता है। 

   एक किंवदंती यह भी है कि रानगिर में एक अहीर था जो दुर्गा का परम भक्त था,वह अहीर बहुत बलशाली था तो अपने राज्य की तरफ से युद्ध लड़ने जाता था तो उसकी नन्हीं बेटी जंगल में रोज़ गाय चराने जाती थी जहाँ पर उसे एक कन्या रोज़ भोजन भी कराती थी और चांदी के सिक्के भी देती थी । यह बात बेटी रोज़ अपने पिता को सुनाती थी । एक दिन जब अहीर युद्ध पर जा रहा था तो उसने सोचा चलो रास्ते में देखते चलूं कि आखिर कौन है वह स्त्री जो मेरी पुत्री को रोज भोजन कराती और चाँदी के सिक्के देती है। झुरमुट में छिपकर अहीर ने देखा कि एक दिव्य कन्या बिटिया को भोजन करा रही है तो वह समझ गया कि यह तो साक्षात जगदम्बा हैं । जैसे ही अहीर दर्शन के लिए आगे बढ़ा तो कन्या अदृश्य हो गई और उसके बाद वहां यह अनगढ़ पाषाण प्रतिमा प्रकट हो गई और इसके बाद इसी अहीर ने इस प्रतिमा पर छाया प्रबंध कराया और मंदिर बनवाया तब से प्रतिमा आज भी उसी स्थान पर विराजमान है ।

 एक प्रचलित कथा यह भी है कि- शिवभक्त रावण ने इस पर्वत पर घोर तपस्या के फलस्वरूप इस स्थान का नाम रावणगिरि रखा गया जो कालांतर में संक्षिप्त होकर रानगिर बन गया । एक कथा के अनुसार पुराण-पुरुष भगवान राम ने वनवास के समय इस पर्वत पर अपने चरण रखे और इस पर्वत का नाम रामगिरि पड़ गया जो अपभ्रंश स्वरूप आज का रानगिर बन गया। ऐसा भी संभव प्रतीत होता है क्योंकि इस पर्वत के समीप स्थित एक गाँव आज भी रामपुर के नाम से जाना जाता है ।
 रानगिर देवी मंदिर के निर्माण काल के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते किंतु कहा जाता है कि सन् 1727 ईस्वी में इस पर्वत पर महाराजा छत्रसाल और नवाब बंगस खान और धामोनी के फ़ौज़दार ख़ालिक के बीच युद्ध हुआ था । यद्यपि महाराजा छत्रसाल ने सागर जिला पर अनेक बार आक्रमण किया जिसका विवरण लालकवि ने अपने ग्रंथ छत्रप्रकाश में इस प्रकार किया है –
“वहाँ तै फेरी रानगिर लाई , ख़ालिक चमूं तहौं चलि आई,
उमड़ि रानगिर में रन कीन्हों,ख़ालिक चालि मान मैं दीन्हौं”
नवाब के खिलाफ युद्ध लड़ने में सहायता करने के लिए राजा छत्रसाल स्वयं चल कर होरा गोत्र के यदुवंशी घोषी अहीर राजा कीरत सिंह जूदेव से मदद मांगी ।
इस लड़ाई में महाराजा छत्रसाल और महाराजा कीरत सिंह जूदेव विजय हुई थे जब युद्ध के बाद जब कीरत सिंह जूदेव और महाराजा छत्रसाल वापस लौट रहे थे तो राजा कीरत ने छत्रसाल से कहा कि आपने यदुकुल की कन्या और रानगिर वाली माता के दर्शन की कहानी सुनी होगी क्यों न आज दर्शन कर लेंं। उसके बाद राजा छत्रसाल और राजा कीरत सिंह जूदेव उस स्थान पर पहुंचे जहांं दोनों को देवी माता ने दर्शन दिए और दोनों राजाओं और उनकी पूरी सेना को भोजन करवाया। रानगिर की महिमा से प्रभावित होकर महाराज कीरत सिंह जूदेव और महाराजा छत्रसाल ने मंदिर का निर्माण करवाया था। 
इस धार्मिक स्थल तक जाने के दो मार्ग हैं पहला - सागर शहर से दक्षिण में झांसी-लखनादौन राष्ट्रीयकृत राजमार्ग क्र.-26 पर 24 कि.मी. चलकर तिराहे से पूर्व में 8 कि.मी. पक्का सड़क मार्ग और दूसरा रहली से सागर मार्ग पर 8 कि.मी. चलकर पांच मील से दक्षिण में पक्की सड़क से 12 कि.मी. का रास्ता।
इस मंदिर का निर्माण दुर्ग-शैली में किया गया है ।बाहरी परकोटे से चौकोर बरामदा जोड़ा गया है,  जिसकी छत पर चढ़कर ऊपर ही ऊपर मंदिर की परिक्रमा की जा सकती है ।
चैत्र और क्वांर में नवरात्रि के समय इस स्थान का महत्व द्विगुणित हो जाता है।
🚩 जय मैया हरसिद्धी रानगिर 🚩

जय भगवति देवि नमो वरदे 
जय पापविनाशिनि बहुफलदे। 
जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे 
प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥

जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे 
जय पावकभूषितवक्त्रवरे। 
जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥

जय महिषविमर्दिनि शूलकरे 
जय लोकसमस्तकपापहरे। 
जय देवि पितामहविष्णुनते 
जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥

जय षण्मुखसायुधईशनुते 
जय सागरगामिनि शम्भुनुते।
जय दु:खदरिद्रविनाशकरे 
जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥

जय देवि समस्तशरीरधरे 
जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे। 
जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे 
जय वाञ्छितदायिनि सिद्धिवरे॥5॥

एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:। 
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥

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शुक्रवार, सितंबर 18, 2020

बुंदेली व्यंग्य | अंगना में ठाड़े बड्डे | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, आज मेरा बुंदेली व्यंग्य लेख "पत्रिका" समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏
बुंदेली व्यंग्य
              अंगना में ठाड़े बड्डे
                              - डॉ. वर्षा सिंह

       हमाए एक बड़े भैया जी आंए, जोन से हम बड्डे कहत हैं। भौतई नोनो सुभाव है उनखों। जोन चाए की मदद खों तैयार रैत हैं, मनो ना कहबो तो उन्ने सीखोई नईंया। बरहमेस, दूसरन के लाने अपनो पूरो टेम दे देत हैं। उनकी जेई आदत पे भौजी सो भारी खिजात हैं उन पे। मनो तनक सी डांट- डपट कर के बे सोई बड्डे खों संग देन लगत हैं। अब करें भी का। कोनऊ की मदद करे बिना उनखों जी सोई नईं मानत है। 
      हमाए बड्डे आयोजन करवाबे में भौतई एक्सपर्ट आएं। बे जोन आयोजन कराबे के लाने ‘‘हऔ’’ बोल देत हैं, तो मनो ऊ आयोजन कभऊं फेल तो होई नईं सकत आए। जा कोरोनाकाल के पैलें आयोजन कराबे के लाने उनके ऐंगर भीड़ लगी रैत्ती। काय से के उन्ने ऐसे-ऐसे आयोजन कराए के लोग देखतई रै गए। कोरोनाकाल में उन्ने भीड़-भाड़ बारो आयोजन खों काम बंद कर दौ है। काय से के बे कोरोना गाइडलाइन खों पालन कर रए हैं। बाकी कल बड्डे के संगे भौतई गजब भऔ। भओ जे के कल जब बे दुपैरी खों अपने अंगना में ठाड़े हते, उनके ऐंगर हरीरो सो सलूखा पैरे एक आदमी आओ, औ कहन लगो के हमाए लाने एक आयोजन करा देओ। 

    ‘‘काय को आयोजन?’’- बड्डे ने पूछी।

   ‘‘मोय सम्मान कार्यक्रम कराने है।’’ ऊने बड्डे से कही। फेर बोलो -‘‘अच्छो बड़ो सो आयोजन, जीमें हजार-खांड़ लुगवा-लुगाई जुड़ जाएं सो मनो मजो आ जाए।’’
‘‘अब न जुड़हें हजार-खांड, तुमें ओनलाईन कराने हो सो बोलो’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘जे ओन-फोनलाईन हमें नईं करानें। हमाए लाने तो तीनबत्ती से पूरो कटरा बजारे लों भर दइयो। बो भी रात नौ के बाद, काय से के दिन में तो उते हमाए भक्तन की भीड़ जुड़ई रैत आय। सम्मान करबे खों मजा तो मनो रातई में आहै।’’ हरीरो सलूखा बारे ने कही।

    ‘‘कोन को सम्मान, कैसो सम्मान, हमाई कछ्छू समझ में ने आ रओ। काय से के ई टेम पे भीड़-भाड़़ जोड़बे वारो कौनऊ आयोजन हम नईं करवा रए। औ रात की तो सोचियो भी नई।’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘ऐसो न बोलो भैय्या, तुमाओ बड़ो नाम सुनो है, तुमाए ऐंगर बड़ी आसा ले के आएं हैं।’’ बा गिड़गिड़ात भओ बोलो।

   ‘‘मनो तुम हो कौन? औ कौन को सम्मान करो चात हो?’’ बड्डे खिझात भए बोले।

   ‘‘हओ, सो तुम काए चीनहो हमाए लाने। काय से के तुम तो घरई में पिड़े रैत हो। चलो, हमाई बता देत हैं के हम को आएं। तो सुनो, हम कोरोना आएं। औ हमें उन औरन खों सम्मान करने है जो बिना मास्क लगाए, बिना डिस्टेंसिंग बनाए बजार-हाट में नांए-मांए घूमत रैत हैं। कोनऊ की नईं सुनत हैं। बे हमाए से मिलबे खों उधारे से फिरत हैं। सो हमें भी लग रओ है के हमें अपने ऐसे भक्तन खों सम्मान कारो चइए। काय, ठीक सोची ने हमने?’’ ऊने कही।

   अंगना में ठाड़े बड्डे ने इत्ती सुनी, औ लगा दई दौड़ कमरा के भीतरे। कोरोना हतो सो, अपनो सो मों ले के लौट गओ, बाकी हमाए बड्डे तभई, ओई टेम से उन औरन खों पानी पी-पी के कोस रए हैं जो गाइड- माइड लाईन भुला के कोरोना खों मूड़ पे बिठाए गली-गैल, बजार-हाट में खुल्ला मों लेके नांय-मांय सटत फिरत हैं। सो बड्डे कभऊं कोरोना खों गरियात हैं, सो कभऊं कोरोना भक्तन खों।
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शनिवार, अप्रैल 11, 2020

लॉकडाउन संदर्भित बुंदेली गीत ... बाहर कहूं ने जइयो - डॉ. वर्षा सिंह

 
Dr. Varsha Singh

  टोटल लॉकडाउन के दौरान सागर नगर  में भी कल दिनांक 10.04.2020 को कोरोना वायरस संक्रमण का पहला पॉज़ीटिव केस मिलने संदर्भित समाचार पर बुंदेली बोली में मेरी गीतात्मक अभिव्यक्ति ...

बाहर कहूं ने जइयो
        - डॉ. वर्षा सिंह

घर के भीतर रहियो
बाहर कहूं ने जइयो
कोरोना बैरी हत्यारो
औरन को समझइयो

इते सागरे आओ करोना
कृष्णगंज थो अड्डा
शनीचरी भई क्वारैंटाइन
लगे बजरिया तिगड्डा
हिम्मत राखे रहियो
बाहर कहूं ने जइयो

डिस्टेंसिंग ने राखी देखो
जो परिणाम भओ है
सागर पूरो लॉकडाउन है
मुस्किल में पर गओ है
सम्हर तनक तो जइयो
बाहर कहूं ने जइयो

लॉकडाउन को मतलब समझो
नांय, मांय की छोड़ो
दूरई-दूर निभाओ रिस्ता
जी से नाता जोड़ो
भागमभाग ने करियो
बाहर कहूं ने जइयो

अपनो सागर न्यारो सागर
काज नियम से करियो
दूर राखने हमें करोना
गांठ बांध जा लइयो
"वर्षा"- बिनती सुनियो
बाहर कहूं ने जइयो

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जी हां, मेरी यह ताज़ा बुंदेली रचना आज web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 11.04.2020 में  प्रकाशित हुई है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=28791






गुरुवार, मार्च 05, 2020

क्षत्रिय नव चेतना मंच, सागर : एक यादगार शाम - डॉ. वर्षा सिंह



        अपनों का साथ हमेशा ख़ुशी देता है, नई ऊर्जा देता है... दिनांक 04 मार्च 2020 को एक ऐसा ही अवसर था...क्षत्रिय समाज सागर के अंतर्गत क्षत्रिय नव चेतना मंच, सागर द्वारा डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.जय सिंह के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर में एसोसिएट प्रोफेसर का पदभार ग्रहण करने के अवसर पर उन्हें दी गई विदाई पर आयोजित रात्रिभोज का।
शुक्रिया भाई वीनू राणा जी, शुक्रिया भाई डॉ. शशि कुमार सिंह जी और शुक्रिया भाई लखन ठाकुर जी



























सोमवार, अक्टूबर 01, 2018

Happy International Day of Older Persons !


Dr. Varsha Singh

आज अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर स्थानीय 'पत्रिका' समाचारपत्र ने मेरी माताश्री डॉ. विद्यावती 'मालविका' की क्रियाशीलता के बारे में प्रकाशित किया है। जिसे मैं आप सबसे शेयर कर रही हूं।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏


Patrika News paper dt 01.10.2018 published my about my mother Dr. Vidyawati Malvika, renowned Hindi writer, Poetess & Retired Lecturer.

Happy International Day of Older Persons !

गुरुवार, मई 31, 2018

साहित्य वर्षा - 13 : संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी तेरहवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ  साहित्यकार प्रो. कांतिकुमार जैन के संस्मरण लेखन पर मेरा आलेख ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....
साहित्य वर्षा - 13           
 संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन
     - डॉ. वर्षा सिंह                                                                                   
 drvarshasingh1@gmail.com

सागर की उर्वर भूमि ने हिन्दी साहित्य को विभिन्न विधाओं के उद्भट विद्वान दिये हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, ललित निबन्ध आदि के क्रम में संस्मरण लेखन को एक प्यी पहचान देने का श्रेय सागर के साहित्यकार को ही है , जिनका नाम है प्रो. कांति कुमार जैन। 09 सितम्बर 1932 को सागर के देवरीकलां में जन्में कांति कुमार जैन ने तत्कालीन कोरिया स्टेट (छत्तीसगढ़) के बैकुंठपुर से सन् 1948 में मैट्रिक उत्तीर्ण किया। मैट्रिक में हिन्दी में विशेष योग्यता के लिये उन्हें कोरिया दरबार की ओर से स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा के लिये वे पुनः सागर आ गये। सागर विश्वविद्यालय के प्रतिभावान छात्रों में स्थान बनाते हुए उन्होंने सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं तथा स्वर्ण पदक प्राप्त किया। प्रा.े कांति कुमार जैन को अध्ययन- अध्यापन से आरम्भ से ही लगाव रहा। सन् 1956 से मध्यप्रदेश के अनेक महाविद्यालयों में शिक्षण कार्य करने के उपरांत सन् 1978 से 1992 तक डॉ, हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में माखनलाल चतुर्वेदी पीठ पर हिन्दी प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। प्रो. कांति कुमार जैन सागर विश्वविद्यालय की बुंदेली पीठ से प्रकाशित होने वाली बुंदेली लोकसंस्कृति पर आधारित पत्रिका ‘ईसुरी’ का कुशल सम्पादन करते हुए इसकी ख्याति को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
प्रो. कांति कुमार जैन ने कई महत्वपूर्ण शोधात्मक पुस्तकें लिखीं। जिनमें ‘छत्तीसगढ़ी बोली : व्याकरण और कोश’, ‘नई कविता’, ‘भारतेंदु पूर्व हिन्दी गद्य’, ‘कबीरदास’, ‘इक्कीसवीं शताब्दी की हिन्दी’ तथा ‘छायावाद की मैदानी और पहाड़ी शैलियां’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। ललित एवं आलोचनात्मक निबन्धों के साथ ही जब संस्मरण लेखन में सक्रिय हुए तब उनकी विशिष्ट शैली ने हिन्दी साहित्य जगत में मानों एक नयी धारा चला दी। सन् 2002 में उनकी पहली संस्मरण पुस्तक ‘लौट कर आना नहीं होगा’ प्रकाशित हुई। मुक्तिबोध और परसाई के घनिष्ठ मित्रों में रहे प्रो. कांति कुमार जैन ने एक संस्मरण पुस्तक लिखी ‘तुम्हारा परसाई’ जो सन् 2004 में प्रकाशित हुई । इसके बाद सन् 2006 में ‘जो कहूंगा सच कहूंगा’, सन् 2007 में ‘अब तो बात फैल गई’ और सन् 2011 में ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ प्रकाशित हुई।
संस्मरण हिन्दी में अपेक्षाकृत नयी विधा है जिसका आरम्भ द्विवेदी युग से माना जाता है। परंतु इस विधा का असली विकास छायावादी युग में हुआ। इस काल में सरस्वती, सुधा, माधुरी, विशाल भारत आदि पत्रिकाओं में संस्मरण प्रकाशित हुए। संस्मरण को साहित्यिक निबन्ध की एक प्रवृत्ति भी माना गया है। साहित्य से इतर लोगों में अकसर आत्मकथा और संस्मरण को लेकर मतिभ्रम होने लगता है। किन्तु संस्मरण और आत्मकथा के दृष्टिकोण में मौलिक अन्तर है। आत्मकथा के लेखक का मुख्य उद्देश्य अपनी जीवनकथा का वर्णन करना होता है। इसमें कथा का प्रमुख पात्र स्वयं लेखक होता है। संस्मरण लेखक का दृष्टिकोण भिन्न रहता है। संस्मरण में लेखक जो कुछ स्वयं देखता है और स्वयं अनुभव करता है उसी का चित्रण करता है। लेखक की स्वयं की अनुभूतियां तथा संवेदनायें संस्मरण का ताना-बाना बुनती हैं। संस्मरण लेखक एक निबन्धकार की भांति अपने स्मृतियों को गद्य के रूप में बांधता है और एक इतिहासकार के रूप में तत्संबंधित काल को प्रदर्शित करता है। कहने का आशय है कि संस्मरण निबंध और इतिहास का साहित्यिक मिश्रण होता है और जिसका मूल संबंध संस्मरण लेखक की स्मृतियों से होता है। वह अपने चारों ओर के जीवन का वर्णन करता है।
जैसा कि समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ के बारे में लिखती हैं-‘‘कांति कुमार जैन की संस्मरण पुस्तक ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ एक अलग कालखण्ड में ले जाती है। जहां पहुंचने पर कई बातें चमत्कृत कर देती हैं। कभी लगता है जैसे हम किसी परियों की कहानी से गुज़र रहे हों तो कभी, जीवन के कटु और खुरदुरे यथार्थ की चुभन महसूस होने लगती है लेकिन इन सबके साथ बचपन की भोली दृष्टि अपनी पूरी मासूमियत के साथ पग-पग साथ चलती है और कहीं-कहीं किशोरावस्था की दस्तक वाली यादें भी छलक कर बाहर आ जाती हैं। ......‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ कांति कुमार जैन के सात वर्ष से सोलह वर्ष की आयु की स्मृतियों का लेखाजोखा मात्र नहीं है, यह संस्मरण-पुस्तक तत्कालीन समाज, राजनीति, आर्थिक व्यवस्थाओं और मानवीय चेष्टाओं का एक ऐसा दस्तावेज़ बनाती है जिसमें बालमन, किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था की दृष्टि, विचारों और विश्लेषणों का अद्भुत मिश्रण है। यूं भी हिन्दी साहित्य में आधुनिक संस्मरण विधा को नई स्थापना देने का श्रेय कांति कुमार जैन के संस्मरण लेखन खाते में है। कथ्य तो विशेष है ही, साथ ही, कांति कुमार जैन की सहज वर्णनात्मक कला ने पुस्तक के कलेवर को इतना प्रवाहमय बना दिया है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इसे पूरा करके ही पाठक इसे एक ओर रख सकेगा, बिलकुल टाईम मशीन में बैठ कर किसी अलग कालखण्ड की यात्रा पूरी करने जैसी अनुभूति के साथ।
लेखन क्षेत्र में सतत् सक्रिय रहने वाले प्रो. कांति कुमार जैन ने अपने मि़त्र मुक्तिबोध से जुड़ी स्मृतियों को सहेजते हुए ‘महागुरू मुक्तिबोध : जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से संस्मरण पुस्तक लिखी, जो सन् 2014 में प्रकाशित हुई। इसी क्रम में सन् 2015 में कोरिया के राजा पर ’एक था राजा’ प्रकाशित हुई, जिसकी भूमिका में  प्रो. कांति कुमार जैन ने लिखा है- ‘एक था राजा में कोरिया के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के प्रादर्श प्रभाव और प्रशासन के नख चित्रात्मक संस्मरण। ये संस्मरण पूरे या सांगोपांग प्रकृति के नहीं हैं। बल्कि 65-70 वर्ष बाद भी जो व्यक्ति, स्थान, घटनायें या प्रसंग मेरी स्मृति में हिलते रह गये हैं, उनका कहीं हल्का, कहीं विस्तृत उल्लेख। प्रायः हल्का ही। यह सामग्री मैंने कुछ अपनी स्मृति से जुटाई है , कुछ जनश्रुतियों से, अधिकांश राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के चौथे पुत्र डॉ रामचंद्र सिंहदेव के सौजन्य से।’
प्रो. कांति कुमार जैन का एक बहुत ही रोचक संस्मरण है- ‘पप्पू खवास का कुनबा’ वे अपने संस्मरण लेखन में जिस प्रकार चुटेले शब्दों का सहज भाव से प्रयोग करते हैं उससे उनक ेलेखन में सदैव ताजा टटकेपन का बोध होता है। अपने संस्मरण लेखन के कारण कई बार उन्हें संकटों का भी सामना करना पड़ा, विरोध भी झेलना पड़ा, किन्तु उन्होंने अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया। वर्तमान हिन्दी साहित्य जगत में प्रो. कांति कुमार जैन संस्मरण लेखन के पुरोधा एवं ‘संस्मरणाचार्य’ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके हैं।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 29.05.2018)
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सोमवार, मई 28, 2018

माटी मेरे सागर की - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       आज 28 मई 2018 को " सागर दिनकर " में प्रकाशित मेरी रचना जो मेरे शहर सागर को समर्पित है... आप भी पढ़िए और Share कीजिए ❤
हार्दिक धन्यवाद #सागरदिनकर 🙏

माटी मेरे सागर की
                    - डॉ. वर्षा सिंह

मां के आंचल जैसी प्यारी ,  माटी मेरे सागर की ।।
सारे जग से अद्भुत न्यारी,  माटी मेरे सागर की ।।

भूमि यही वो जहां ‘’गौर’’ ने, दान दिया था शिक्षा का
पाठ पढ़ाया  था  हम सबको,  संस्कार की  कक्षा का
विद्या की यह है फुलवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी..................

विद्यासागर जैसे  ऋषि-मुनि की   पावनता  पाती है
धर्म, ज्ञान की, स्वाभिमान की अनुपम उज्जवल थाती है
श्रद्धा, क्षमा, त्याग की क्यारी,  माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.............

‘वर्णी जी’  की तपो भूमि यह, यही भूमि ‘पद्माकर’ की
‘कालीचरण’ शहीद यशस्वी, महिमा  अद्भुत सागर की
सारा जग इस पर बलिहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.................

नौरादेही   में   संरक्षित   वन   जीवों  का डेरा है
मैया  हरसिद्धी  का  मंदिर, रानगिरी  का  फेरा  है
आबचंद की गुफा दुलारी,  माटी मेरे  सागर  की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........

राहतगढ़  की छटा अनूठी ,झर-झर झरती जलधारा
गढ़पहरा,  धामौनी  बिखरा ,  बुंदेली   वैभव  सारा
राजघाट, रमना चितहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी................

एरण पुराधाम विष्णु का , सूर्यदेव हैं रहली में
देव बिहारी जी के हाथों सारा जग है मुरली में
पीली कोठी अजब सवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी....................

मेरा सागर मुझको प्यारा, यहीं हुए लाखा बंजारा
श्रम से अपने झील बना कर, संचित कर दी जल की धारा
‘वर्षा’-बूंदों की किलकारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........
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शुक्रवार, जनवरी 12, 2018

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को राज्य स्तरीय रामेश्वर गुरु पत्रकारिता पुरस्कार

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को मिलेगा
राज्य स्तरीय रामेश्वर गुरु पत्रकारिता पुरस्कार
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह , लेखिका एवं सम्पादिका

माधवराव सप्रे स्मृति समाचार संग्रहालय एवं शोध संस्थान भोपाल द्वारा उत्कृष्ट पत्रिका सम्पादन के लिए दिया जाने वाला इस वर्ष का " रामेश्वर गुरू पत्रकारिता पुरस्कार " लेखिका, कवयित्री, साहित्यकार एवं ‘‘सामयिक सरस्वती‘‘ की कार्यकारी संपादक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह  को प्रदान किया जाएगा। भोपाल में आयोजित संस्थान की बैठक में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को यह पुरस्कार देने का निर्णय लिया गया है। सप्रे संग्रहालय का राज्यस्तरीय पुरस्कार समारोह 12 जनवरी को भोपाल में आयोजित किया जाएगा। समारोह में सुश्री सिंह को यह पुरस्कार मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. सीतासरण शर्मा प्रदान करेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति प्रो. (डॉ.) प्रमोद वर्मा । सप्रे संग्रहालय एवं शोध संस्था द्वारा लेखन, साहित्यिक पत्रिका के सम्पादन तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान देने वाली विभूतियों को विगत अनेक वर्षों से सम्मानित करता आ रहा है।
राज्य स्तरीय रामेश्वर गुरू पत्रकारिता सम्मान पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वरिष्ठ लेखिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह द्वारा  लिखित विभिन्न विषयों पर लगभग पचास पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने शोषित, पीड़ित स्त्रियों के पक्ष में अपने लेखन के द्वारा हमेशा आवाज़ उठाई है।  बुन्देलखण्ड की बेड़िया स्त्रियों पर केन्द्रित उनकी पुस्तक ‘पिछले पन्ने की औरतें’, महिला बीड़ी श्रमिकों पर केन्द्रित ‘पत्तों में कैद औरतें’ तथा स्त्री विमर्श पुस्तक ‘औरत तीन तस्वीरें’ मनोरमा ईयर बुक में शामिल की जा चुकी हैं। लिव इन रिलेशन पर उनके उपन्यास 'कस्बाई सिमोन' को राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनका एक और उपन्यास "पचकौड़ी" राजनैतिक और पत्रकारिता जगत की पर्तों का बारीकी से विश्लेषण करने वाला पठनीय एवं लोकप्रिय उपन्यास है।
खजुराहो की मूर्तिकला विषय में पीएचडी , सागर की प्रतिष्ठित साहित्यकार, कथालेखिका एवं उपन्यासकार डॉ शरद सिंह वर्तमान में मध्यप्रदेश के सागर नगर में निवास करते हुए स्वतंत्र लेखन के कार्य के साथ नई दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका "सामयिक सरस्वती" में कार्यकारी सम्पादक का दायित्व निभा रहीं हैं एवं पत्र-पत्रिकाओं सहित सोशल मीडिया पर वे लगातार अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं। वे मानती हैं कि अधिकारों का ज्ञान और साहस ही स्त्रियों को शोषण-मुक्त जीवन दे सकता है। सागर से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "सागर दिनकर" में उनका नियमित कॉलम "चर्चा प्लस" अनेक समसामयिक मुद्दों पर विश्लेषणात्मक लेखन के लिए प्रबुद्ध पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। इससे पूर्व डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह सागर से ही प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में अनेक वर्षों तक "बतकाव" शीर्षक का नियमित कॉलम लेखन कर चुकी हैं।
Dr. (Miss) Sharad Singh , Author & Editor

शनिवार, सितंबर 16, 2017

पाठक मंच गोष्ठी, डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय , सागर दि. 15.09.2017

प्रिय मित्रों,
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी सभागार, हिन्दी विभाग , डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय , सागर में दिनांक 15.09.2017 को पाठक मंच द्वारा आयोजित वरिष्ठ कथाकार मृदुला सिन्हा की किताब " ढाई बीघा ज़मीन" की समीक्षा गोष्ठी की कुछ तस्वीरें आप सब से शेयर कर रही हूं।

Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar , Hindi Department , Dr. Hari Singh Gour Central University , Sagar
15.09.2017