शनिवार, नवंबर 07, 2020
जीवन | गीत | डॉ. वर्षा सिंह
मंगलवार, अक्टूबर 20, 2020
हरसिद्धी देवी | रानगिर | सागर | नवरात्रि | शुभकामनाएं | डॉ. वर्षा सिंह
शुक्रवार, सितंबर 18, 2020
बुंदेली व्यंग्य | अंगना में ठाड़े बड्डे | डॉ. वर्षा सिंह
शनिवार, अप्रैल 11, 2020
लॉकडाउन संदर्भित बुंदेली गीत ... बाहर कहूं ने जइयो - डॉ. वर्षा सिंह
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| Dr. Varsha Singh |
टोटल लॉकडाउन के दौरान सागर नगर में भी कल दिनांक 10.04.2020 को कोरोना वायरस संक्रमण का पहला पॉज़ीटिव केस मिलने संदर्भित समाचार पर बुंदेली बोली में मेरी गीतात्मक अभिव्यक्ति ...
बाहर कहूं ने जइयो
- डॉ. वर्षा सिंह
घर के भीतर रहियो
बाहर कहूं ने जइयो
कोरोना बैरी हत्यारो
औरन को समझइयो
इते सागरे आओ करोना
कृष्णगंज थो अड्डा
शनीचरी भई क्वारैंटाइन
लगे बजरिया तिगड्डा
हिम्मत राखे रहियो
बाहर कहूं ने जइयो
डिस्टेंसिंग ने राखी देखो
जो परिणाम भओ है
सागर पूरो लॉकडाउन है
मुस्किल में पर गओ है
सम्हर तनक तो जइयो
बाहर कहूं ने जइयो
लॉकडाउन को मतलब समझो
नांय, मांय की छोड़ो
दूरई-दूर निभाओ रिस्ता
जी से नाता जोड़ो
भागमभाग ने करियो
बाहर कहूं ने जइयो
अपनो सागर न्यारो सागर
काज नियम से करियो
दूर राखने हमें करोना
गांठ बांध जा लइयो
"वर्षा"- बिनती सुनियो
बाहर कहूं ने जइयो
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युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=28791
गुरुवार, मार्च 05, 2020
क्षत्रिय नव चेतना मंच, सागर : एक यादगार शाम - डॉ. वर्षा सिंह
अपनों का साथ हमेशा ख़ुशी देता है, नई ऊर्जा देता है... दिनांक 04 मार्च 2020 को एक ऐसा ही अवसर था...क्षत्रिय समाज सागर के अंतर्गत क्षत्रिय नव चेतना मंच, सागर द्वारा डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.जय सिंह के गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर में एसोसिएट प्रोफेसर का पदभार ग्रहण करने के अवसर पर उन्हें दी गई विदाई पर आयोजित रात्रिभोज का।
शुक्रिया भाई वीनू राणा जी, शुक्रिया भाई डॉ. शशि कुमार सिंह जी और शुक्रिया भाई लखन ठाकुर जी
सोमवार, अक्टूबर 01, 2018
Happy International Day of Older Persons !
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| Dr. Varsha Singh |
आज अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर स्थानीय 'पत्रिका' समाचारपत्र ने मेरी माताश्री डॉ. विद्यावती 'मालविका' की क्रियाशीलता के बारे में प्रकाशित किया है। जिसे मैं आप सबसे शेयर कर रही हूं।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏
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| Patrika News paper dt 01.10.2018 published my about my mother Dr. Vidyawati Malvika, renowned Hindi writer, Poetess & Retired Lecturer. |
Happy International Day of Older Persons !
गुरुवार, मई 31, 2018
साहित्य वर्षा - 13 : संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन - डॉ. वर्षा सिंह
स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी तेरहवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. कांतिकुमार जैन के संस्मरण लेखन पर मेरा आलेख .... और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....
साहित्य वर्षा - 13
संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन
- डॉ. वर्षा सिंह
drvarshasingh1@gmail.com
सागर की उर्वर भूमि ने हिन्दी साहित्य को विभिन्न विधाओं के उद्भट विद्वान दिये हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, ललित निबन्ध आदि के क्रम में संस्मरण लेखन को एक प्यी पहचान देने का श्रेय सागर के साहित्यकार को ही है , जिनका नाम है प्रो. कांति कुमार जैन। 09 सितम्बर 1932 को सागर के देवरीकलां में जन्में कांति कुमार जैन ने तत्कालीन कोरिया स्टेट (छत्तीसगढ़) के बैकुंठपुर से सन् 1948 में मैट्रिक उत्तीर्ण किया। मैट्रिक में हिन्दी में विशेष योग्यता के लिये उन्हें कोरिया दरबार की ओर से स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा के लिये वे पुनः सागर आ गये। सागर विश्वविद्यालय के प्रतिभावान छात्रों में स्थान बनाते हुए उन्होंने सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं तथा स्वर्ण पदक प्राप्त किया। प्रा.े कांति कुमार जैन को अध्ययन- अध्यापन से आरम्भ से ही लगाव रहा। सन् 1956 से मध्यप्रदेश के अनेक महाविद्यालयों में शिक्षण कार्य करने के उपरांत सन् 1978 से 1992 तक डॉ, हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में माखनलाल चतुर्वेदी पीठ पर हिन्दी प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। प्रो. कांति कुमार जैन सागर विश्वविद्यालय की बुंदेली पीठ से प्रकाशित होने वाली बुंदेली लोकसंस्कृति पर आधारित पत्रिका ‘ईसुरी’ का कुशल सम्पादन करते हुए इसकी ख्याति को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
प्रो. कांति कुमार जैन ने कई महत्वपूर्ण शोधात्मक पुस्तकें लिखीं। जिनमें ‘छत्तीसगढ़ी बोली : व्याकरण और कोश’, ‘नई कविता’, ‘भारतेंदु पूर्व हिन्दी गद्य’, ‘कबीरदास’, ‘इक्कीसवीं शताब्दी की हिन्दी’ तथा ‘छायावाद की मैदानी और पहाड़ी शैलियां’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। ललित एवं आलोचनात्मक निबन्धों के साथ ही जब संस्मरण लेखन में सक्रिय हुए तब उनकी विशिष्ट शैली ने हिन्दी साहित्य जगत में मानों एक नयी धारा चला दी। सन् 2002 में उनकी पहली संस्मरण पुस्तक ‘लौट कर आना नहीं होगा’ प्रकाशित हुई। मुक्तिबोध और परसाई के घनिष्ठ मित्रों में रहे प्रो. कांति कुमार जैन ने एक संस्मरण पुस्तक लिखी ‘तुम्हारा परसाई’ जो सन् 2004 में प्रकाशित हुई । इसके बाद सन् 2006 में ‘जो कहूंगा सच कहूंगा’, सन् 2007 में ‘अब तो बात फैल गई’ और सन् 2011 में ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ प्रकाशित हुई।
संस्मरण हिन्दी में अपेक्षाकृत नयी विधा है जिसका आरम्भ द्विवेदी युग से माना जाता है। परंतु इस विधा का असली विकास छायावादी युग में हुआ। इस काल में सरस्वती, सुधा, माधुरी, विशाल भारत आदि पत्रिकाओं में संस्मरण प्रकाशित हुए। संस्मरण को साहित्यिक निबन्ध की एक प्रवृत्ति भी माना गया है। साहित्य से इतर लोगों में अकसर आत्मकथा और संस्मरण को लेकर मतिभ्रम होने लगता है। किन्तु संस्मरण और आत्मकथा के दृष्टिकोण में मौलिक अन्तर है। आत्मकथा के लेखक का मुख्य उद्देश्य अपनी जीवनकथा का वर्णन करना होता है। इसमें कथा का प्रमुख पात्र स्वयं लेखक होता है। संस्मरण लेखक का दृष्टिकोण भिन्न रहता है। संस्मरण में लेखक जो कुछ स्वयं देखता है और स्वयं अनुभव करता है उसी का चित्रण करता है। लेखक की स्वयं की अनुभूतियां तथा संवेदनायें संस्मरण का ताना-बाना बुनती हैं। संस्मरण लेखक एक निबन्धकार की भांति अपने स्मृतियों को गद्य के रूप में बांधता है और एक इतिहासकार के रूप में तत्संबंधित काल को प्रदर्शित करता है। कहने का आशय है कि संस्मरण निबंध और इतिहास का साहित्यिक मिश्रण होता है और जिसका मूल संबंध संस्मरण लेखक की स्मृतियों से होता है। वह अपने चारों ओर के जीवन का वर्णन करता है।
जैसा कि समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ के बारे में लिखती हैं-‘‘कांति कुमार जैन की संस्मरण पुस्तक ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ एक अलग कालखण्ड में ले जाती है। जहां पहुंचने पर कई बातें चमत्कृत कर देती हैं। कभी लगता है जैसे हम किसी परियों की कहानी से गुज़र रहे हों तो कभी, जीवन के कटु और खुरदुरे यथार्थ की चुभन महसूस होने लगती है लेकिन इन सबके साथ बचपन की भोली दृष्टि अपनी पूरी मासूमियत के साथ पग-पग साथ चलती है और कहीं-कहीं किशोरावस्था की दस्तक वाली यादें भी छलक कर बाहर आ जाती हैं। ......‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ कांति कुमार जैन के सात वर्ष से सोलह वर्ष की आयु की स्मृतियों का लेखाजोखा मात्र नहीं है, यह संस्मरण-पुस्तक तत्कालीन समाज, राजनीति, आर्थिक व्यवस्थाओं और मानवीय चेष्टाओं का एक ऐसा दस्तावेज़ बनाती है जिसमें बालमन, किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था की दृष्टि, विचारों और विश्लेषणों का अद्भुत मिश्रण है। यूं भी हिन्दी साहित्य में आधुनिक संस्मरण विधा को नई स्थापना देने का श्रेय कांति कुमार जैन के संस्मरण लेखन खाते में है। कथ्य तो विशेष है ही, साथ ही, कांति कुमार जैन की सहज वर्णनात्मक कला ने पुस्तक के कलेवर को इतना प्रवाहमय बना दिया है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इसे पूरा करके ही पाठक इसे एक ओर रख सकेगा, बिलकुल टाईम मशीन में बैठ कर किसी अलग कालखण्ड की यात्रा पूरी करने जैसी अनुभूति के साथ।
लेखन क्षेत्र में सतत् सक्रिय रहने वाले प्रो. कांति कुमार जैन ने अपने मि़त्र मुक्तिबोध से जुड़ी स्मृतियों को सहेजते हुए ‘महागुरू मुक्तिबोध : जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से संस्मरण पुस्तक लिखी, जो सन् 2014 में प्रकाशित हुई। इसी क्रम में सन् 2015 में कोरिया के राजा पर ’एक था राजा’ प्रकाशित हुई, जिसकी भूमिका में प्रो. कांति कुमार जैन ने लिखा है- ‘एक था राजा में कोरिया के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के प्रादर्श प्रभाव और प्रशासन के नख चित्रात्मक संस्मरण। ये संस्मरण पूरे या सांगोपांग प्रकृति के नहीं हैं। बल्कि 65-70 वर्ष बाद भी जो व्यक्ति, स्थान, घटनायें या प्रसंग मेरी स्मृति में हिलते रह गये हैं, उनका कहीं हल्का, कहीं विस्तृत उल्लेख। प्रायः हल्का ही। यह सामग्री मैंने कुछ अपनी स्मृति से जुटाई है , कुछ जनश्रुतियों से, अधिकांश राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के चौथे पुत्र डॉ रामचंद्र सिंहदेव के सौजन्य से।’
प्रो. कांति कुमार जैन का एक बहुत ही रोचक संस्मरण है- ‘पप्पू खवास का कुनबा’ वे अपने संस्मरण लेखन में जिस प्रकार चुटेले शब्दों का सहज भाव से प्रयोग करते हैं उससे उनक ेलेखन में सदैव ताजा टटकेपन का बोध होता है। अपने संस्मरण लेखन के कारण कई बार उन्हें संकटों का भी सामना करना पड़ा, विरोध भी झेलना पड़ा, किन्तु उन्होंने अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया। वर्तमान हिन्दी साहित्य जगत में प्रो. कांति कुमार जैन संस्मरण लेखन के पुरोधा एवं ‘संस्मरणाचार्य’ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके हैं।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 29.05.2018)
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सोमवार, मई 28, 2018
माटी मेरे सागर की - डॉ. वर्षा सिंह
प्रिय मित्रों,
आज 28 मई 2018 को " सागर दिनकर " में प्रकाशित मेरी रचना जो मेरे शहर सागर को समर्पित है... आप भी पढ़िए और Share कीजिए ❤
हार्दिक धन्यवाद #सागरदिनकर 🙏
माटी मेरे सागर की
- डॉ. वर्षा सिंह
मां के आंचल जैसी प्यारी , माटी मेरे सागर की ।।
सारे जग से अद्भुत न्यारी, माटी मेरे सागर की ।।
भूमि यही वो जहां ‘’गौर’’ ने, दान दिया था शिक्षा का
पाठ पढ़ाया था हम सबको, संस्कार की कक्षा का
विद्या की यह है फुलवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी..................
विद्यासागर जैसे ऋषि-मुनि की पावनता पाती है
धर्म, ज्ञान की, स्वाभिमान की अनुपम उज्जवल थाती है
श्रद्धा, क्षमा, त्याग की क्यारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.............
‘वर्णी जी’ की तपो भूमि यह, यही भूमि ‘पद्माकर’ की
‘कालीचरण’ शहीद यशस्वी, महिमा अद्भुत सागर की
सारा जग इस पर बलिहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.................
नौरादेही में संरक्षित वन जीवों का डेरा है
मैया हरसिद्धी का मंदिर, रानगिरी का फेरा है
आबचंद की गुफा दुलारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........
राहतगढ़ की छटा अनूठी ,झर-झर झरती जलधारा
गढ़पहरा, धामौनी बिखरा , बुंदेली वैभव सारा
राजघाट, रमना चितहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी................
एरण पुराधाम विष्णु का , सूर्यदेव हैं रहली में
देव बिहारी जी के हाथों सारा जग है मुरली में
पीली कोठी अजब सवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी....................
मेरा सागर मुझको प्यारा, यहीं हुए लाखा बंजारा
श्रम से अपने झील बना कर, संचित कर दी जल की धारा
‘वर्षा’-बूंदों की किलकारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........
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शुक्रवार, जनवरी 12, 2018
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को राज्य स्तरीय रामेश्वर गुरु पत्रकारिता पुरस्कार
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| डॉ. (सुश्री) शरद सिंह , लेखिका एवं सम्पादिका |
राज्य स्तरीय रामेश्वर गुरू पत्रकारिता सम्मान पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वरिष्ठ लेखिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह द्वारा लिखित विभिन्न विषयों पर लगभग पचास पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने शोषित, पीड़ित स्त्रियों के पक्ष में अपने लेखन के द्वारा हमेशा आवाज़ उठाई है। बुन्देलखण्ड की बेड़िया स्त्रियों पर केन्द्रित उनकी पुस्तक ‘पिछले पन्ने की औरतें’, महिला बीड़ी श्रमिकों पर केन्द्रित ‘पत्तों में कैद औरतें’ तथा स्त्री विमर्श पुस्तक ‘औरत तीन तस्वीरें’ मनोरमा ईयर बुक में शामिल की जा चुकी हैं। लिव इन रिलेशन पर उनके उपन्यास 'कस्बाई सिमोन' को राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनका एक और उपन्यास "पचकौड़ी" राजनैतिक और पत्रकारिता जगत की पर्तों का बारीकी से विश्लेषण करने वाला पठनीय एवं लोकप्रिय उपन्यास है।
खजुराहो की मूर्तिकला विषय में पीएचडी , सागर की प्रतिष्ठित साहित्यकार, कथालेखिका एवं उपन्यासकार डॉ शरद सिंह वर्तमान में मध्यप्रदेश के सागर नगर में निवास करते हुए स्वतंत्र लेखन के कार्य के साथ नई दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका "सामयिक सरस्वती" में कार्यकारी सम्पादक का दायित्व निभा रहीं हैं एवं पत्र-पत्रिकाओं सहित सोशल मीडिया पर वे लगातार अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं। वे मानती हैं कि अधिकारों का ज्ञान और साहस ही स्त्रियों को शोषण-मुक्त जीवन दे सकता है। सागर से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "सागर दिनकर" में उनका नियमित कॉलम "चर्चा प्लस" अनेक समसामयिक मुद्दों पर विश्लेषणात्मक लेखन के लिए प्रबुद्ध पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। इससे पूर्व डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह सागर से ही प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में अनेक वर्षों तक "बतकाव" शीर्षक का नियमित कॉलम लेखन कर चुकी हैं।
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| Dr. (Miss) Sharad Singh , Author & Editor |
शनिवार, सितंबर 16, 2017
पाठक मंच गोष्ठी, डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय , सागर दि. 15.09.2017
प्रिय मित्रों,
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी सभागार, हिन्दी विभाग , डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय , सागर में दिनांक 15.09.2017 को पाठक मंच द्वारा आयोजित वरिष्ठ कथाकार मृदुला सिन्हा की किताब " ढाई बीघा ज़मीन" की समीक्षा गोष्ठी की कुछ तस्वीरें आप सब से शेयर कर रही हूं।
Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar , Hindi Department , Dr. Hari Singh Gour Central University , Sagar
15.09.2017



































