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गुरुवार, जुलाई 30, 2020

हिन्दी काव्य में कथासम्राट प्रेमचंद और उनके कथापात्र - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
कथाकार प्रेमचंद के जन्मदिवस 31 जुलाई पर विशेष:

हिन्दी काव्य में कथासम्राट प्रेमचंद और उनके कथापात्र
- डाॅ. वर्षा सिंह

31 जुलाई 1880 को उत्तरप्रदेश के लमही ग्राम में जन्मे प्रेमचंद ने आधुनिक हिन्दी साहित्य को जिस प्रकार अपने नूतन कथानकों से सूमृद्ध किया, वह अ़िद्वतीय है। जिन दिनों हिन्दी काव्य जगत में  छायावाद की प्रकृति और प्रेम संबंधी कविताएं अपनी कोमल धाराएं बहा रही थीं, उन दिनों जीवन के खुरदरे यथार्थ पर कहानियां लिखने का साहस किया प्रेमचंद ने। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था। आरंभ में वे उर्दू की पत्रिका ‘ज़माना’ में ‘नवाब राय’ के नाम से लिखते थे। प्रथम कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ (1907) के अंगरेज सरकार द्वारा जब्त किए जाने तथा लिखने पर प्रतिबंध लगाने के बाद वे प्रेमचंद के नए नाम से लिखने लगे। सन् 1919 में उनका हिंदी में पहला उपन्यास ‘‘सेवासदन’’ प्रकाशित हुआ। यह अत्यंत लोकप्रिय हुआ। प्रेमचंद ने लगभग तीन सौ कहानियां भी लिखीं जिनमें तत्कालीन भारतीय समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक दशा के दर्शन होते हैं।
Kathakar Premchand
उनका उपन्यास ‘गोदान’ जो कि 1936 में प्रकाशित हुआ था, कृषक जीवन पर लिखी अद्वितीय रचना है। उनकी रचनात्मकता का युग प्रेमचंद युग कहा जाता है। उन्होंने ‘जागरण’ नामक समाचार पत्र तथा ‘हंस’ नामक मासिक साहित्यिक पत्रिका का संपादन किया। वे प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम सभापति रहे। 
प्रेमचंद की कहानियों के पात्र अपनी अमिट छाप के साथ  पाठक के मन-मस्तिष्क पर छा जाते हैं।  होरी, हामिद, धनिया, निर्मला, घीसू जैसे पात्र आमजन जीवन से उठकर आए और प्रेमचंद की कथा-कहानियों में अमरत्व पा गए।
Adam Gondavi
हिन्दी काव्यजगत में भी प्रेमचंद के कथापात्रों का स्मरण करते हुए प्रेमचंद की लेखनी को सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। जैसे अदम गोंडवी कहते हैं-

रोटी के लिए बिक गई धनिया की आबरू
‘लमही’ में प्रेमचंद का  ‘होरी’  उदास है।

गीतकार गुलज़ार ने प्रेमचंद और उनके सृजन पर बहुत गहराई से यह नज़्म कही है-

प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है
लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ बहुत है....

Gulzar
मुंशी जी आप ने कितने दर्द दिए हैं
हम को भी और जिनको आप ने पीस पीस के मारा है
कितने दर्द दिए हैं आप ने हम को मुंशी जी
‘होरी’ को पिसते रहना और एक सदी तक
पोर पोर दिखलाते रहे हो
किस गाय की पूंछ पकड़ के बैकुंठ पार कराना था
सड़क किनारे पत्थर कूटते जान गंवा दी
और सड़क न पार हुई, या तुम ने करवाई नही
‘धनिया’ बच्चे जनती, पालती अपने और पराए भी
ख़ाली गोद रही आख़िर
कहती रही डूबना ही किस्मत में है तो
बोल गढ़ी क्या और गंगा क्या

‘हामिद की दादी’ बैठी चूल्हे पर हाथ जलाती रही
कितनी देर लगाई तुमने एक चिमटा पकड़ाने में
‘घीसू’ ने भी कूजा कूजा उम्र की सारी बोतल पी ली
तलछट चाट के अख़िर उसकी बुद्धि फूटी
नंगे जी सकते हैं तो फिर बिना कफन जलने में क्या है
‘एक सेर इक पाव गंदुम’, दाना दाना सूद चुकाते
सांस की गिनती छूट गई है
तीन तीन पुश्तों को बंधुआ मजदूरी में बांध के तुमने क़लम उठा ली
‘शंकर महतो’ की नस्लें अब तक वो सूद चुकाती हैं.
‘ठाकुर का कुआं’, और ठाकुर के कुएं से एक लोटा पानी
एक लोटे पानी के लिए दिल के सोते सूख गए
‘झोंकू’ के जिस्म में एक बार फिर ‘रायदास’ को मारा तुम ने

वहीं कवि दशरथ मसानिया प्रेमचंद की जीवनी को कविता में पिरोते हुए लिखते हैं -

सन् अट्ठारह सौ अस्सी, लमही सुंदर ग्राम।
Dasharath Masaniya
प्रेमचंद को जनम भयो, हिन्दी साहित काम।।
परमेश्वर पंचन बसें, प्रेमचंद कहि बात।
हल्कू कम्बल बिन मरे, वही पूस की रात।।
सिलिया को भरमाय के, पंडित करता पाप।
धरम ज्ञान की आड़ में, मनमानी चुपचाप।।
बेटी बुधिया मर गई, कफन न पायो अंग।
घीसू माधू झूमते, मधुशाला के संग।।
होरी धनिया मर गए, कर न सके गोदान।
जीवनभर मेहनत करी, प्रेमचंद वरदान।।
मुन्नी तो तरसत रही, आभूषण नहि पाई।
झुनिया गोबर घूमते, बिन शिक्षा के माहि।।
बेटी निर्मला कह रही, कन्या दीजे मेल।
जीवनभर को मरण है, ब्याह होय बेमेल।।
पंच बसे परमात्मा, खाला लिए बुलाय।
शेखा जुम्मन देखते, अलगू करते न्याय।।

प्रेमचंद के कथापात्र वे दलित, शोषित इंसान थे जिन पर प्रेमचंद से
पूर्व इतनी बारीकी से किसी ने कलम नहीं चलाई थी। कथाकार एवं कवयित्री डाॅ शरद सिंह मानती हैं कि ‘‘प्रेमचंद ने समाज का एक समाजशास्त्री की भांति आकलन किया और सुधार के मार्ग सुझाए। उन्होंने समाज में व्याप्त विसंगतियों को अपनी कथासाहित्य के माध्यम से उजागर किया ताकि लोगों का उस ओर ध्यान आकृष्ट हो और समाज सुधार के कदम उठाए जा सकें। उन्होंने विधवा स्त्री से विवाह कर स्वयं इस दिशा में पहल की।’’
प्रेमचंद ने संवेदनाओं एवं भावनाओं को जिस गंभीरता से अपने कथानकों में प्रस्तुत किया है उसे देखते हुए डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने अपनी ग़ज़ल में प्रेमचंद को ‘‘भावनाओं के इक सच्चे कांवरिया’’ कहा है, देखें उनकी पूरी ग़ज़ल -

गोबर, घीसू, माधव, हामिद, होरी एवं धनिया।
प्रेमचंद के जरिए इनसे मिल पाई है दुनिया।

प्रेमचंद ने कथाजगत को वह तबका दिखलाया
जिसका शोषण करते आए सदियों ठाकुर, बनिया।

रात पूस की ठंडी हो कर कैसे जलती आई
कैसे बिना दवा दम तोड़े इक गरीब की मुनिया।

प्रेमचंद ने ‘कफ़न’ कहानी में यथार्थ लिख डाला
दारूखोरों के घर तड़पे एक अभागी तिरिया।

इक मशाल था जिसका लेखन उसको ‘शरद’ नमन है
प्रेमचंद थे भावनाओं के इक सच्चे कांवरिया।

मैं यानी इस ब्लाॅग की लेखिका डॉ वर्षा सिंह ने भी अपनी ग़ज़लों में यथार्थ के चित्रण के लिए प्रेमचंद के कथापात्रों को प्रतीकों के रूप में शामिल किया है। बानगी देखिए- 

मत रो ‘धनिया’ बरबादी पर, ये तो हरदम होता है
Dr Varsha Singh
कर्जा देना, कुर्की करना, धनवानों की चाहत है।

‘वर्षा’ कैसे हो जब बादल घबराए से दिखते हैं
टैक्स लगे ज्यों दुहरा-तिहरा बूंदों की भी सांसत है।

मेरी एक अन्य ग़ज़ल के कुछ शेर देखें-

सच्चाई की काया देखो, कितनी दुबली- पतली है
जब-जब खुदे पहाड़ यहां पर हरदम चुहिया निकली है।

यूं तो हर मुद्दे पर पूछा -‘‘कहो मुसद्दी ! कैसे हो ? ’’
बोल न पाया लेकिन कुछ भी, मुंह पर रख दी उंगली है।

‘बुधिया’ के मरने पर निकले ‘घीसू’- ‘माधव’ के आंसू
वे आंसू भी नकली ही थे, यह आंसू भी नकली है।

08 अक्टूबर 1936 में प्रेमचंद ने जब इस दुनिया से विदा ली तो अनेक
Nazir Banarasi
साहित्यकारों की क़लम से मानों आंसुओं की धार बह निकली थी। प्रेमचंद की कमी को महसूस करते हुए नज़ीर बनारसी ने लिखा है-

बनके टूटे दिलों की सदा प्रेमचन्द।
देश से कर गये है वफा प्रेमचन्द।
जब कि पूरी जवानी प’ था साम्राज
उस जमाने के है रहनुमा प्रेमचन्द।
देखने में शिकस्ता-सा एक साज है
साथ लाखों दुखे दिल की आवाज है।

प्रेमचंद ने हिन्दी साहित्य में कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने अपने एक अलग मुहावरे गढ़े। उनका सृजन कालजयी है। आज भी प्रासंगिक है। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर है।
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रविवार, अप्रैल 19, 2020

नवदुनिया तस्वीर पहेली- पहचानिए तस्वीर - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       प्रिय मित्रों, मेरा नाम आज सही जवाब देने वालों में छपा है। दरअसल "नवदुनिया", सागर संस्करण द्वारा लॉकडाउन के इस कठिन समय को सहज बनाने के उद्देश्य से पाठकों से प्रतिदिन एक रोचक तस्वीर पहेली पूछी जा रही है। इसमें सागर शहर के किसी एक स्थान की तस्वीर प्रकाशित की जाती है और पूछा जाता है कि यह यह किस स्थान पर स्थित है। कल पूछी गई पहेली में मेरा जवाब सही जवाबों में चुना गया है।
तो मुझे दीजिए बधाई... 😊💐
और मैं दे रही हूं नवदुनिया को हार्दिक धन्यवाद ! 😊🙏





रविवार, सितंबर 29, 2019

मैं और मेरे ग़ज़ल संग्रह

यूं तो पिछले अनेक वर्ष से मैं यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह हिंदी गजल लिख रही हूं। अभी तक मेरे 5 गजल संग्रह और हिन्दी ग़ज़ल की आलोचना पर एक पुस्तक प्रकाशित भी हो चुकी है , किंतु आजीविका की व्यस्तता के चलते नये संग्रह के प्रकाशन में व्यवधान आता रहा है। लेकिन लेखन ज़ारी रहा। सोशल मीडिया पर भी सतत रूप से मैं अपनी गजलों देती रही हूं। पत्र- पत्रिकाओं में लिखती, प्रकाशित होती रहती हूं। उम्मीद हूं कि मेरा नया ग़ज़ल संग्रह शीघ्र ही प्रकाशित हो सकेगा। 😊

मेरे प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह  -
सर्वहारा के लिए
                    वक़्त पढ़ रहा है
                    हम जहां पर हैं
                    सच तो ये है
                    दिल बंजारा

     
आलोचना पुस्तक  - हिन्दी ग़ज़ल : दशा और दिशा



ग़ज़ल संग्रह ... सर्वहारा के लिए - डॉ. वर्षा सिंह


ग़ज़ल संग्रह ... वक़्त पढ़ रहा है - डॉ. वर्षा सिंह

ग़ज़ल संग्रह ... हम जहां पर हैं - डॉ. वर्षा सिंह

ग़ज़ल संग्रह ... सच तो ये है - डॉ. वर्षा सिंह

ग़ज़ल संग्रह ... दिल बंजारा - डॉ. वर्षा सिंह
आलोचना... हिन्दी ग़ज़ल : दशा और दिशा



सोमवार, सितंबर 02, 2019

🚩 गणेश चतुर्थी की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं 🚩


🚩आज दिनांक 02 सितम्बर 2019 को गणेश चतुर्थी यानी हिंदू कैलेन्डर के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि है, साथ ही आज से प्रारंभ होगा अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाने वाला दस दिवसीय गणेशोत्सव....
  तो आइए, लोककल्याण की पावन भावना के साथ हम सभी विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, प्रथम पूज्य गणपति बाप्पा बुद्धि एवं समृद्धि के आराध्य देव भगवान श्री गणेश का स्मरण, ध्यान, पूजन, अर्चन करें ...

🚩ॐ गंगणपतये नमो नम:
श्री सिध्धीविनायक नमो नम:
अष्टविनायक नमो नम:
गणपती बाप्पा मोरया 🚩


         🚩भगवान गणेश के बारह नामों का यह पाठ संकटनाशक स्तोत्र के नाम से भी जाना जाता है। इस मंत्र स्तोत्र में भगवान गणेश के बारह नामों का स्मरण किया गया है  - 
🚩 प्रणम्यं शिरसां देवं गौरीपुत्र विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्मायु: कामार्थसिद्धये।।
🚩 प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदतं द्वितीयकंम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।
🚩 लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।।
🚩 नवमं भालचद्रं च दशमं तु विनायकम।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननमं।।
🚩 द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यं पठेन्नर:।
न च विघ्रभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो।।
🚩 विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनं।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम।।
🚩 जपेद्गणपतिस्तोत्रम षड्भिर्मासै: फलं लभेत।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय:।।
🚩 अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्य लिखित्वा य: समर्पयेत।
तस्य विद्याभवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:।। 🚩




शुक्रवार, सितंबर 28, 2018

समय के साथ - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh



समय के साथ
बदल जाते हैं लोग,
भवन,
विचार।
बदल जाता है भवनों का
स्थापत्य।
कल की महलनुमा इमारतें
आज तोड़े जाने का भय झेलती
खड़ी हैं निर्भीकता का लबादा ओढ़े
          - डॉ. वर्षा सिंह


#ilovephotography
#PhotographyByVarshaSingh
#architecture 

गांव के रास्ते - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh










गांव के रास्ते
अक्सर एक सरीखे दिखते हैं
सड़क किनारे खड़ी मोटर साईकिल
गुमठी में बैठे
चाय के इंतजार में देश -दुनिया की राजनीति पर बतियाते फुरसतिया बेरोज़गार
और चाय बिकने की ख़ुशी को महसूस करता अपनी धुन में मगन
धीमे-धीमे कुछ गुनगुनाता दूकानदार

गांव के रास्ते
अक्सर एक सरीखे दिखते हैं
         - डॉ. वर्षा सिंह
Photo by Dr. Varsha Singh

#ilovephotography
#Road
#village
#employment
#photography

रविवार, सितंबर 23, 2018

Congratulations My Sister Dr. (Sushri) Sharad Singh 🌹

सागर गौरव सम्मान डॉ.(सुश्री) शरद सिंह को
 
 विगत  दिनांक 21.09.2018 को सागर शहर की अग्रणी सामाजिक संस्था " विचार " द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय सागर नगर की  प्रतिभाओं के एक भव्य सम्मान समारोह में मेरी बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को इस वर्ष से प्रारम्भ किए गए प्रथम " सागर गौरव सम्मान " से सम्मानित किया गया।




 स्थान था मैजेस्टिक प्लाजा, सागर का सभागार .... और शरद को यह सम्मान प्रदान करने वाले सागर शहर की हस्तियों में प्रमुख व्यक्ति थे...  कला गुरु विष्णु पाठक, योग गुरु विष्णु आर्य, पर्यावरणविद आशारानी मलैया, एकता समिति के संस्थापक रशीद भाई और   समाजसेवी, " विचार " संस्था के संस्थापक एवं बिजनेसमैन कपिल मलैया।

Sagar Gourav Samman 2018


केन्द्र शासन के पंडित गोविंद वल्लभ पुरस्कार ,राज्य स्तरीय रामेश्वर गुरू पत्रकारिता सम्मान पुरस्कार, प्रादेशिक वागीश्वरी सम्मान , विजय वर्मा कथा सम्मान आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह द्वारा  लिखित विभिन्न विषयों पर लगभग पचास पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने शोषित, पीड़ित स्त्रियों के पक्ष में अपने लेखन के द्वारा हमेशा आवाज़ उठाई है। बुन्देलखण्ड की बेड़िया स्त्रियों पर केन्द्रित उनकी पुस्तक ‘पिछले पन्ने की औरतें’, महिला बीड़ी श्रमिकों पर केन्द्रित ‘पत्तों में कैद औरतें’ तथा स्त्री विमर्श पुस्तक ‘औरत तीन तस्वीरें’ मनोरमा ईयर बुक में शामिल की जा चुकी हैं। लिव इन रिलेशन पर उनके उपन्यास 'कस्बाई सिमोन' को राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनका एक और उपन्यास "पचकौड़ी" राजनैतिक और पत्रकारिता जगत की पर्तों का बारीकी से विश्लेषण करने वाला पठनीय एवं लोकप्रिय उपन्यास है।



   खजुराहो की मूर्तिकला विषय में पीएचडी , सागर की प्रतिष्ठित साहित्यकार, कथालेखिका एवं उपन्यासकार डॉ शरद सिंह वर्तमान में मध्यप्रदेश के सागर नगर में निवास करते हुए स्वतंत्र लेखन के कार्य के साथ नई दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका "सामयिक सरस्वती" में कार्यकारी सम्पादक का दायित्व निभा रहीं हैं एवं पत्र-पत्रिकाओं सहित सोशल मीडिया पर वे लगातार अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं।
Dr. (Sushri) Sharad Singh

वे मानती हैं कि अधिकारों का ज्ञान और साहस ही स्त्रियों को शोषण-मुक्त जीवन दे सकता है। सागर से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "सागर दिनकर" में उनका नियमित कॉलम "चर्चा प्लस" अनेक समसामयिक मुद्दों पर विश्लेषणात्मक लेखन के लिए प्रबुद्ध पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। इससे पूर्व डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह सागर से ही प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में अनेक वर्षों तक "बतकाव" शीर्षक का नियमित कॉलम लेखन कर चुकी हैं।


गुरुवार, मई 31, 2018

साहित्य वर्षा - 13 : संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी तेरहवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ  साहित्यकार प्रो. कांतिकुमार जैन के संस्मरण लेखन पर मेरा आलेख ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....
साहित्य वर्षा - 13           
 संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन
     - डॉ. वर्षा सिंह                                                                                   
 drvarshasingh1@gmail.com

सागर की उर्वर भूमि ने हिन्दी साहित्य को विभिन्न विधाओं के उद्भट विद्वान दिये हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, ललित निबन्ध आदि के क्रम में संस्मरण लेखन को एक प्यी पहचान देने का श्रेय सागर के साहित्यकार को ही है , जिनका नाम है प्रो. कांति कुमार जैन। 09 सितम्बर 1932 को सागर के देवरीकलां में जन्में कांति कुमार जैन ने तत्कालीन कोरिया स्टेट (छत्तीसगढ़) के बैकुंठपुर से सन् 1948 में मैट्रिक उत्तीर्ण किया। मैट्रिक में हिन्दी में विशेष योग्यता के लिये उन्हें कोरिया दरबार की ओर से स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा के लिये वे पुनः सागर आ गये। सागर विश्वविद्यालय के प्रतिभावान छात्रों में स्थान बनाते हुए उन्होंने सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं तथा स्वर्ण पदक प्राप्त किया। प्रा.े कांति कुमार जैन को अध्ययन- अध्यापन से आरम्भ से ही लगाव रहा। सन् 1956 से मध्यप्रदेश के अनेक महाविद्यालयों में शिक्षण कार्य करने के उपरांत सन् 1978 से 1992 तक डॉ, हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में माखनलाल चतुर्वेदी पीठ पर हिन्दी प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। प्रो. कांति कुमार जैन सागर विश्वविद्यालय की बुंदेली पीठ से प्रकाशित होने वाली बुंदेली लोकसंस्कृति पर आधारित पत्रिका ‘ईसुरी’ का कुशल सम्पादन करते हुए इसकी ख्याति को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
प्रो. कांति कुमार जैन ने कई महत्वपूर्ण शोधात्मक पुस्तकें लिखीं। जिनमें ‘छत्तीसगढ़ी बोली : व्याकरण और कोश’, ‘नई कविता’, ‘भारतेंदु पूर्व हिन्दी गद्य’, ‘कबीरदास’, ‘इक्कीसवीं शताब्दी की हिन्दी’ तथा ‘छायावाद की मैदानी और पहाड़ी शैलियां’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। ललित एवं आलोचनात्मक निबन्धों के साथ ही जब संस्मरण लेखन में सक्रिय हुए तब उनकी विशिष्ट शैली ने हिन्दी साहित्य जगत में मानों एक नयी धारा चला दी। सन् 2002 में उनकी पहली संस्मरण पुस्तक ‘लौट कर आना नहीं होगा’ प्रकाशित हुई। मुक्तिबोध और परसाई के घनिष्ठ मित्रों में रहे प्रो. कांति कुमार जैन ने एक संस्मरण पुस्तक लिखी ‘तुम्हारा परसाई’ जो सन् 2004 में प्रकाशित हुई । इसके बाद सन् 2006 में ‘जो कहूंगा सच कहूंगा’, सन् 2007 में ‘अब तो बात फैल गई’ और सन् 2011 में ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ प्रकाशित हुई।
संस्मरण हिन्दी में अपेक्षाकृत नयी विधा है जिसका आरम्भ द्विवेदी युग से माना जाता है। परंतु इस विधा का असली विकास छायावादी युग में हुआ। इस काल में सरस्वती, सुधा, माधुरी, विशाल भारत आदि पत्रिकाओं में संस्मरण प्रकाशित हुए। संस्मरण को साहित्यिक निबन्ध की एक प्रवृत्ति भी माना गया है। साहित्य से इतर लोगों में अकसर आत्मकथा और संस्मरण को लेकर मतिभ्रम होने लगता है। किन्तु संस्मरण और आत्मकथा के दृष्टिकोण में मौलिक अन्तर है। आत्मकथा के लेखक का मुख्य उद्देश्य अपनी जीवनकथा का वर्णन करना होता है। इसमें कथा का प्रमुख पात्र स्वयं लेखक होता है। संस्मरण लेखक का दृष्टिकोण भिन्न रहता है। संस्मरण में लेखक जो कुछ स्वयं देखता है और स्वयं अनुभव करता है उसी का चित्रण करता है। लेखक की स्वयं की अनुभूतियां तथा संवेदनायें संस्मरण का ताना-बाना बुनती हैं। संस्मरण लेखक एक निबन्धकार की भांति अपने स्मृतियों को गद्य के रूप में बांधता है और एक इतिहासकार के रूप में तत्संबंधित काल को प्रदर्शित करता है। कहने का आशय है कि संस्मरण निबंध और इतिहास का साहित्यिक मिश्रण होता है और जिसका मूल संबंध संस्मरण लेखक की स्मृतियों से होता है। वह अपने चारों ओर के जीवन का वर्णन करता है।
जैसा कि समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ के बारे में लिखती हैं-‘‘कांति कुमार जैन की संस्मरण पुस्तक ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ एक अलग कालखण्ड में ले जाती है। जहां पहुंचने पर कई बातें चमत्कृत कर देती हैं। कभी लगता है जैसे हम किसी परियों की कहानी से गुज़र रहे हों तो कभी, जीवन के कटु और खुरदुरे यथार्थ की चुभन महसूस होने लगती है लेकिन इन सबके साथ बचपन की भोली दृष्टि अपनी पूरी मासूमियत के साथ पग-पग साथ चलती है और कहीं-कहीं किशोरावस्था की दस्तक वाली यादें भी छलक कर बाहर आ जाती हैं। ......‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ कांति कुमार जैन के सात वर्ष से सोलह वर्ष की आयु की स्मृतियों का लेखाजोखा मात्र नहीं है, यह संस्मरण-पुस्तक तत्कालीन समाज, राजनीति, आर्थिक व्यवस्थाओं और मानवीय चेष्टाओं का एक ऐसा दस्तावेज़ बनाती है जिसमें बालमन, किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था की दृष्टि, विचारों और विश्लेषणों का अद्भुत मिश्रण है। यूं भी हिन्दी साहित्य में आधुनिक संस्मरण विधा को नई स्थापना देने का श्रेय कांति कुमार जैन के संस्मरण लेखन खाते में है। कथ्य तो विशेष है ही, साथ ही, कांति कुमार जैन की सहज वर्णनात्मक कला ने पुस्तक के कलेवर को इतना प्रवाहमय बना दिया है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इसे पूरा करके ही पाठक इसे एक ओर रख सकेगा, बिलकुल टाईम मशीन में बैठ कर किसी अलग कालखण्ड की यात्रा पूरी करने जैसी अनुभूति के साथ।
लेखन क्षेत्र में सतत् सक्रिय रहने वाले प्रो. कांति कुमार जैन ने अपने मि़त्र मुक्तिबोध से जुड़ी स्मृतियों को सहेजते हुए ‘महागुरू मुक्तिबोध : जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से संस्मरण पुस्तक लिखी, जो सन् 2014 में प्रकाशित हुई। इसी क्रम में सन् 2015 में कोरिया के राजा पर ’एक था राजा’ प्रकाशित हुई, जिसकी भूमिका में  प्रो. कांति कुमार जैन ने लिखा है- ‘एक था राजा में कोरिया के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के प्रादर्श प्रभाव और प्रशासन के नख चित्रात्मक संस्मरण। ये संस्मरण पूरे या सांगोपांग प्रकृति के नहीं हैं। बल्कि 65-70 वर्ष बाद भी जो व्यक्ति, स्थान, घटनायें या प्रसंग मेरी स्मृति में हिलते रह गये हैं, उनका कहीं हल्का, कहीं विस्तृत उल्लेख। प्रायः हल्का ही। यह सामग्री मैंने कुछ अपनी स्मृति से जुटाई है , कुछ जनश्रुतियों से, अधिकांश राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के चौथे पुत्र डॉ रामचंद्र सिंहदेव के सौजन्य से।’
प्रो. कांति कुमार जैन का एक बहुत ही रोचक संस्मरण है- ‘पप्पू खवास का कुनबा’ वे अपने संस्मरण लेखन में जिस प्रकार चुटेले शब्दों का सहज भाव से प्रयोग करते हैं उससे उनक ेलेखन में सदैव ताजा टटकेपन का बोध होता है। अपने संस्मरण लेखन के कारण कई बार उन्हें संकटों का भी सामना करना पड़ा, विरोध भी झेलना पड़ा, किन्तु उन्होंने अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया। वर्तमान हिन्दी साहित्य जगत में प्रो. कांति कुमार जैन संस्मरण लेखन के पुरोधा एवं ‘संस्मरणाचार्य’ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके हैं।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 29.05.2018)
#साप्ताहिक_सागर_झील #साहित्य_वर्षा #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #MyColumn #Varsha_Singh #Sahitya_Varsha #Sagar #Sagar_Jheel #Weekly

बुधवार, अगस्त 10, 2016

‘पत्रिका’ समाचार पत्र टाॅक शो ... जेंडर इक्वीलिटी .... डाॅ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
‘पत्रिका’ समाचार पत्र द्वारा एक महत्वपूर्ण ‘टाॅक शो’ आयोजित किया गया जिसमें मैंने और मेरी छोटी बहन डाॅ. शरद सिंह ने भी अपने विचार रखे। मुद्दा था ‘‘जेंडर इक्वीलिटी’’....
 ‘टाॅक शो’ के लिए धन्यवाद ‘‘पत्रिका’!
(10 जुलाई 2016) ...

 http://epaper.patrika.com/c/12387420



Patrika - Talk Show - 10.08.2016 - Varsha Singh
 
Patrika - Talk Show - 10.08.2016 - Varsha Singh


Patrika - Talk Show - 10.08.2016 - Varsha Singh