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| Anuradha Chauhan |
देशप्रेम हो सबसे ऊपर
तुम देश की शान बनों
तोड़ सकें न कोई तुमको
तुम ऐसी दीवार बनों
हम संतानें भारत माँ की
भारत की पहचान बनों
जात-पात से ऊपर उठकर
मानवता की पहचान बनों
सच्चाई के पथ पर चल
मातृभूमि की शान बनों
कर्मभूमि यह वीरों की
इसका मान बढ़ाना है
विश्व विजयी ओर सबसे प्यारा
तिरंगा हमको फहराना है
भरो हुंँकार जागो युवा
आतंकवाद ने बहुत कुछ छीना
आतंक के घाव मिटाकर
सुख का सूरज ले आना है
याद करो जो शहीद हुए
वो भी किसी की संतान थे
भारत की शान की खातिर
उन्होंने प्राणों का बलिदान दिया
भूलों न इस बलिदान को
आओ मिलकर करें प्रतिज्ञा
मातृभूमि की रक्षा से ऊपर
न हो कोई धर्म दूसरा
देशप्रेमी का युगों-युगों तक
गूंँजता रहता है जग में नाम
गणतंत्र दिवस के अवसर पर
आओ मिलकर शपथ उठाएंँ
जय भारत जय भारती
वंदे मातरम् गूंँजे हर गली
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गणतंत्र दिवस और उदास तिरंगा
- कुसुम कोठारी
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| Kusum Kothari |
तीन रंग का पहने बाना
फहरा रहा जो शान से !
आज क्यों कुछ ग़मगीन !
जिस गर्व से था फ़हरा ,
जो थे उद्देश्य ,
सभी अधूरे , ढ़ह रहे मंसूबे ,
लाखों की बलिवेदी पर
लहराया था तिरंगा !
क्या उन शहीदों का कर्ज चुका पाये?
सोचो हम जो श्वास ले रहे
स्वतंत्रता की वो हवा कहाँ से आई ,
कितनी माँओं ने सपूत खोये ,
कितनी बहनों ने भाई ।
आज स्वार्थ का बेपर्दा होता खेल,
भ्रष्टाचार,आंतक,दुराचार का दुष्कर मेल,
आज चूड़ियाँ छोड़ हाथ में
लेनी है तलवार,
कोई मर्म तक छेद न जाये,
पहले करने होंगें वार,
आजादी का मूल्य पहचान लें
तो ही खुलेंगे मन के तार ,
हर तरह के दुश्मनों का
जीना करदो दुश्वार,
आओ तिरंगे के नीचे हम
आज करें यह प्रण प्राण,
देश धर्म रक्षा हित
सब कुछ हो निस्त्राण ।
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गणतंत्र दिवस
- साधना वैद
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| Sadhana Vaid |
उल्लास लाया
गणतंत्र दिवस
देश गर्वित !
हर्ष प्रसंग
मनोहारी छटायें
राजपथ पे !
विरल दृश्य
संस्कृति औ' सैनिक
मान बढ़ायें !
पावन पल
मनमोहक झाँकी
मुग्ध दर्शक !
वीर जवान
कदम से कदम
मिलाते चलें !
आसमान में
अद्भुत करतब
करें हैरान !
धारे हुए है
हर भारतवासी
वसंती चोला !
गर्व है हमें
गणतंत्र हमारा
विश्व में न्यारा !
संकल्प लेंगे
अपने भारत का
मान रखेंगे !
राष्ट्र पर्व है
छब्बीस जनवरी
मान हमारा !
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बिक रहा हिन्दोस्तां
- गौतम राजरिशी
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| Gautam Rajrishi |
कितने हाथों में यहाँ हैं कितने पत्थर,गौर कर
फिर भी उठ-उठ आ गये हैं कितने ही सर, गौर कर
आसमां तक जा चढ़ा सेंसेक्स अपने देश का
चीथड़े हैं फिर भी बचपन के बदन पर, गौर कर
जो भी पढ़ ले आँखें मेरी, मुझको दीवाना कहे
तू भी तो इनको कभी फुर्सत से पढ़ कर गौर कर
शहर में बढती इमारत पर इमारत देख के
मेरी बस्ती का वो बूढा कांपता 'बर', गौर कर
यार जब-तब घूम आते हैं विदेशों में, मगर
अपनी तो बस है कवायद घर से दफ्तर, गौर कर
उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्तां
है जिन्होंने डाल रक्खा तन पे खद्दर, गौर कर
इक तेरे 'ना' कहने से अब कुछ बदल सकता नही
मैं सिपाही-सा डटा हूँ मोर्चे पर, गौर कर
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जय गणतन्त्र
- अनीता सैनी 'दीप्ति'
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| Anita Saini 'Dipti' |
मिट्टी हिंद की सहर्ष जय गणतन्त्र बोल उठी है
मिटी नहीं कहानी आज़ादी के मतवालों की,
बन पड़ी फिर ठण्डी रेत पर उनकी कई परछाइयाँ,
आज़ादी के लिये जिन्होनें साँसें अपनी गँवायीं थीं
कुछ प्रतिबिम्ब दौड़े पानी की सतह पर आये,
कुछ तैर न पाये तलहटी में समाये,
कुछ यादें ज़ेहन में सोयीं थीं कुछ रोयीं थीं,
कुछ रुठी हुई पीड़ा में अपनी खोयीं थीं,
मिट्टी हिंद की सहर्ष बोल उठी,
मिटी नहीं कहानी वे छायाएँ-मिट पायी थीं।
बँटवारे का दर्द भूलकर,
कुछ लिये हाथों में तिरंगा दौड़ रही थीं,
अधिराज्य से पूर्ण स्वराज का,
सुन्दर स्वप्न नम नयनों में सजोये थीं,
नीरव निश्छल तारे टूटे पूत-से,
टूटी कड़ी अन्तहीन दासता के आँचल की थीं,
लिखी लहू से आज़ादी की
संघर्ष से उपजी वीरों की लिखी कहानी थी,
मिट्टी हिंद की सहर्ष बोल उठी,
मिटी नहीं कहानी वे छायाएँ-मिट पायी थी।
बहकी हवा फिर बोल रही,
बालू की झील में शाँत-सी एक लहर उठी,
नव निर्माण के नवीन ढेर निर्मितकर,
उत्साह जनमानस के हृदय में घोल रही,
एकता अखंडता सद्भाव के सूत्र,
पिरोतीं विकास की अनंत आशाएँ थीं,
धरती नभ समंदर से चन्द्रभानु भी कहता है,
लिख रहा हर भारतवासी,
ख़ून-पसीने से गणतन्त्र की नई इबारत है,
मिट्टी हिंद की सहर्ष बोल उठी है,
मिटी नहीं कहानी वे छायाएँ-मिट पायी थी।
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और अंत में प्रस्तुत है मेरी यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की गणतंत्र दिवस संदर्भित एक ग़ज़ल -
लौ न गणतंत्र की बुझाने पाए
- डॉ. वर्षा सिंह
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| Dr Varsha Singh |
हमने दिल में ये आज ठानी है
एक दुनिया नई बसानी है
जिनके हाथों में क़ैद है क़िस्मत
हर ख़ुशी उनसे छीन लानी है
दिल के सोए हुए चरागों में
इक नई रोशनी जगानी है
दहशतों से भरा हुआ है चमन
एकता की कली खिलानी है
जंगजूओं की महफ़िलों में हमें
प्यार की इक ग़ज़ल सुनानी है
देश आज़ाद रहेगा अपना
इसमें गंगो-जमन का पानी है
लौ न गणतंत्र की बुझाने पाए
ये शहीदों की इक निशानी है
लाख ज़ुल्म-ओ-सितम किए जाएं
अम्न की आरती सजानी है
हिन्द की सरज़मीन जन्नत है
इस पे क़ुर्बान हर जवानी है
तआरुफ़ पूछिए न "वर्षा" का
मेघ और बूंद की कहानी है
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