गीत
जीवन
- डॉ. वर्षा सिंह
हंसी-खुशी, दुख-आंसू तब तक
जब तक भी यह जीवन है ।।
फिर अनंत तक का सफर अनवरत
टूटा हर एक बंधन है ।।
तिरस्कार, उपहास, मान के
सारे किस्से बेमानी
गागर सागर में डूबी तो
मिलता पानी से पानी
भुला हक़ीक़त मानव का मन
करता रहता नर्तन है ।।
साथ समय के नाम-ख्याति सब
भुला दिए जाते हैं
नई-नई घटनाएं लेकर
दिवस-वर्ष आते हैं
इस दुनिया की फ़ितरत सबको
भाता जो भी नूतन है ।।
आपस में संग्राम किस लिए
राग-द्वेष सब व्यर्थ यहां
हर पल धुंधले होते दर्पण
खो देते हैं अर्थ है यहां
जब तक "वर्षा" की रिमझिम है
तब तक भादों,सावन है ।।
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