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गुरुवार, जून 14, 2018

साहित्य वर्षा - 15 डॉ. अखिल जैन : असीम संभावनाओं के युवा कवि  - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरे कॉलम "साहित्य वर्षा" की पंद्रहवीं  कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के युवा कवि डॉ. अखिल जैन पर मेरा आलेख । ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा - 15         
      डॉ. अखिल जैन : असीम संभावनाओं के युवा कवि
               - डॉ. वर्षा सिंह

       drvarshasingh1@gmail.com

सागर के साहित्याकाश में कई युवा रचनाकार अपनी लेखनी से अपनी प्रतिभा की ज्योति बिखेर रहे हैं। इन्हीं में एक युवा साहित्यकार हैं डॉ. अखिल जैन। 09 अक्टूबर 1982 को जन्मे डॉ. अखिल जैन पैथोलॉजी में स्नातक तथा समाज शास्त्र स्नातकोत्तर एवं एम एस डब्ल्यू हैं। बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज, सागर में लैब टेक्नोलॉजिस्ट के पद पर कार्यरत अखिल जैन को विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय भागलपुर द्वारा विधा वाचस्पति मानद डॉक्टरेट एवं विद्यासागर मानद डी लिट् की उपाधि प्राप्त है। डॉ. अखिल जैन सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह जी द्वारा गणतंत्र दिवस के अवसर पर रक्तदान एवं एच आई व्ही जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने हेतु उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। कई सामाजिक संगठन भी उनके सेवाकार्य के लिए उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।
बचपन से ही साहित्य में रुझान होने के कारण साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी कलम चलाते हुए कवि सम्मेलनों के मंचों पर भी उन्होंने अपना विशेष स्थान बनाया है और वे आकाशवाणी, दूरदर्शन के साथ ही देश के अनेक मंचों पर ख्यातिनाम कवियों के साथ काव्यपाठ कर चुके हैं। डॉ. अखिल जैन बताते हैं कि वे विगत तीन वर्षों से व्हाट्सएप जैसे सोशल नेटवर्क पर एक साहित्यिक समूह छंद मुक्त पाठशाला के एडमिन हैं। जिसमें अलग अलग देशों से रचनाकार जुड़े हुए हैं। व्हाट्सएप के इस साहित्यिक समूह के द्वारा ‘भावां की हाला’ नामक काव्य संग्रह  डॉ. जैन के संपादन में निकाला गया जो कि व्हाट्सएप के इतिहास में प्रथम अनूठा प्रयास था। व्हाट्सएप से जुड़े  साहित्यकारों द्वारा इस संग्रह का स्वागत किए जाने से उत्साहित हो कर इसी समूह के द्वारा दूसरा काव्य संग्रह उनके द्वारा संपादित किया गया। जिसका नाम था - ‘शब्दों का प्याला’। उनकी स्वयं की कविताओं का एक संग्रह ‘शब्दों के पंख’ प्रकाशनाधीन है।
अपनी रचनाधर्मिता के बारे में डॉ. अखिल जैन का कहना है कि -‘‘शब्दों को कलम की तूलिका से पेपर के कैनवास पर घुमाते, नचाते और मन के भाव के रंग में डुबाते हुए कविता का सृजन होता गया और मैं एक साधारण से इन्सान से कलमकार कब बन गया ये तो मित्रों की प्रशंसा के बाद पता चला। ये तो माँ शारदे का आशीर्वाद ही है कि नैसर्गिक और रचनात्मक छवियों की छत्र-छाया में, कभी उमंग, कभी उल्लास, कभी भावों के भंवर की उलझती लहरों से खिन्न मन ने कलम को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और रचनाओं की श्रृंखला बना डाली । मेरी दृष्टि में लिखो भले ही कम मगर ऐसा लिखो कि पढ़ने वाले सभी की खुशियां दुख दर्द सभी कविता के भीतर समाये हुए हो। तभी लेखन का, सृजन का सार है।’’ वे अपने लेखन की सफलता एवं ख्याति का श्रेय उस वातावरण को देते हैं जो उन्हें अपने पिता डॉ. आनन्द जैन एवं माता श्रीमती पुष्पा जैन के आशीष, स्नेह और सहयोग से प्राप्त हुआ।
अखिल जैन की कविताओं में एक बहुरंगी दुनिया दिखाई पड़ती है जिसमें खुशी है, दुख है, चिन्तन है, चिन्ता है और एक युवा उत्साह है। मंचीय कविताओं से परे शेष काव्य में वह गाम्भीर्य है जो साबित करता है कि कवि को जीवन के सभी उतार-चढ़ाव से सरोकार है। अपने चारों ओर की विषम परिस्थितियों का विश्लेषण करने की क्षमता कवि में है तथा वह अपनी इस क्षमता को बड़ी बारीकी से अपनी कविताओं में पिरोता जाता है। अपनों के द्वारा छले जाने पर कई ज़िन्दगियां इस त्रासदी से किस तरह गुज़रती हैं। इस कटु यथार्थ को अखिल जैन की कविता ‘वेश्या’ में देखा जा सकता है। अखिल की कविता छीजती मनुष्यता और दरकती संवेदनशीलता की पड़ताल करती है-
शर्म आई थी मुझे उस दिन बहुत
जब स्कूल के शिक्षक ने
कक्षा में खिलवाड़ की थी
मेरे अंगो से...
शर्म आई थी उस दिन जब
पड़ोस के चाचा ने
जो मुझे बिटिया कहते थे
नशे में जकड़ा था मुझे...

अखिल जैन की  कविताओं में समय का एक बेहद तीखा बोध भी है जो उनके कवित्व के प्रति संभावना जगाता है। मानवीय सरोकारों के निरंतर फैलते हुए क्षितिज को रेखांकित करते हुए बिम्ब उनकी कविताओं की ओर सहज ध्यान आकर्षित करते हैं। ‘गुल्लक’ शीर्षक कविता में यह बिम्ब-वैशिष्ट्य देखा जा सकता है-
आओ एक गुल्लक लायें
उस गुल्लक में हम
डालते रहेंगे कुछ स्मृतियां
कुछ पुराने पत्रों के टेढ़े मेढ़े आखर
मुरझाये गुलाबों की
सुखी पंखुरियों का फीका रंग
और कुछ आदान
प्रदान किये उपहारों के
सुनहले रैपर....
काले बालों के कुछ टुकड़े
और किसी सागर के तट की माटी
जहां दोनों
उंगलियों से लिखते थे
एक दूजे का नाम...
प्रेम की चवन्नी, विश्वास की अठन्नी
और हमारे रिश्ते के
सिक्कों से भर जाएगी गुल्लक....

कविता का यह उसूल होता है कि कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कह दिया जाए और वह भी इस प्रकार से कि उसे पढ़ने वाले का सौंदर्यबोध भी न टूटने पाए। ‘डाकिया’ शीर्षक कविता में कहन का यह सौंदर्य कुछ इस तरह उभर कर आया है -
उम्मीदों के पेपर पर
गुंजाईश बहुत है -
मेरे दिल के छोटे से कोने में
संधारण की जगह
सख्त है
किन्तु अपेक्षा की खूंटी पर
लटके वर्षो से
तुम्हारे नाम के सैकड़ों
खत....

कविता की बहुआयामी दृष्टि ने जीवन की वास्तविकता को सदैव प्रस्तुत किया है। रचनाकार अपने अनुभवों द्वारा जीवन के उद्देश्यों को काव्य रूप देकर संप्रेषणीय आधार प्रदान करता है और यह संप्रेषण काव्यगत सृजनात्मक विचारशीलता से सिद्ध होता है। परंपरागत प्रतीकों के स्थान पर अखिल जैन ने अपने अनुभव को मुखर करने वाले उदाहरण प्रस्तुत किए हैं जिससे उनकी कविता में एक नया सौंदर्य का बोध प्रतिध्वनित होता है। उदाहरण के लिए ‘हाशिया’ कविता का यह अंश देखिए -
बचपन में सिखाते थे मास्टर
लिखते वक्त अपनी पुस्तिका में
छोड़कर रखना हाशिया...
बायें तरफ सदा ही
आदत रही है ये ....
उसी आदत ने सिखाया
मुझे छोड़ कर जोड़ना...

अखिल छंदमुक्त रचनाओं के साथ ही ग़ज़ल जैसी छंदबद्ध रचनाएं भी लिखते हैं। ये बानगी देखें-
गीत  कोई  भी  हो,  एहसास से  गाया मैने
जो मुझे  जैसा  मिला, दिल से  लगाया मैने
जितनी नफ़रत से उज़ाडा था तुमने दिल मेरा,
उतनी  चाहत से  तुम्हे  दिल में सजाया मैने
अखिल जैन की कविताओं से गुजरने के बाद यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि सागर की युवा साहित्यिक पीढ़ी में वे असीम सम्भावनाओं के कवि हैं। आशा है कि वे इसी तरह साहित्य को सामाजिक सरोकारों से जोड़े रखेंगे और अपने काव्यधर्म के प्रति इसी तरह ईमानदार बने रहेंगे।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 12.06.2018)
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मंगलवार, जून 05, 2018

साहित्य वर्षा - 14 वरिष्ठ साहित्यसेवी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरे कॉलम "साहित्य वर्षा" की चौदहवीं  कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर की वरिष्ठ  साहित्यकार एवं कवयित्री डॉ. (श्रीमती) विद्यावती "मालविका" , जो मेरी माताश्री भी हैं , पर मेरा आलेख । ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....
साहित्य वर्षा - 14      
     
वरिष्ठ साहित्यसेवी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’
  - डॉ. वर्षा सिंह
  
               डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ सागर नगर की एक ऐसी साहित्यकार हैं जिनका साहित्य-सृजन अनेक विधाओं, यथा- कहानी, एकांकी, नाटक एवं विविध विषयों पर शोध प्रबंध से ले कर कविता और गीत तक विस्तृत है। लेखन के साथ ही चित्रकारी के द्वारा भी उन्होंने अपनी मनोभिव्यक्ति प्रस्तुत की है। सन् 1928 की 13 मार्च को उज्जैन में जन्मीं डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ ने अपने जीवन के लगभग 6 दशक बुन्देलखण्ड में व्यतीत किए हैं, जिसमें 30 वर्ष से अधिक समय से वे मकरोनिया, सागर में निवासरत हैं। डॉ. ‘मालविका’ को अपने पिता संत ठाकुर श्यामचरण सिंह एवं माता श्रीमती अमोला देवी से साहित्यिक संस्कार मिले। पिता संत श्यामचरण सिंह एक उत्कृष्ट साहित्यकार एवं गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अस्पृश्यता उन्मूलन एवं नशाबंदी में उल्लेखनीय योगदान दिया था। डॉ. विद्यावती अपने पिता के विचारों से अत्यंत प्रभावित रहीं और उन्होंने 12-13 वर्ष की आयु से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। बौद्ध धर्म एवं प्रणामी सम्प्रदाय पर उन्होने विशेष अध्ययन एवं लेखन किया।
       डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा। दो बेटियों के जन्म के कुछ समय बाद ही उन्हें वैधव्य का असीम दुख सहन करना पड़ा, किन्तु वे अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं हुईं। ससुराल पक्ष से कोई सहायता न मिलने पर उन्होंने शिक्षिका के रूप में आत्मनिर्भरतापूर्वक अपने वृद्ध पिता को सहारा दिया और अपने अनुज कमल सिंह को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाया जो कि आदिम जाति कल्याण विभाग मघ्यप्रदेश शासन के हायर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। डॉ. विद्यावती ने अपने बलबूते पर अपनी दोनों पुत्रियों वर्षा सिंह और शरद सिंह का लालन-पालन कर उन्हें उच्च शिक्षित किया। उन्होंने व्याख्याता के रूप में मध्यप्रदेश शासन के शिक्षा विभाग में उज्जैन, रीवा एवं पन्ना आदि स्थानों में अपनी सेवाऐं दीं और सन् 1988 में सेवानिवृत्त हुईं। वे शासकीय सेवा के साथ ही लेखन एवं शोध कार्यां में सदैव संलग्न रहीं। स्वाध्याय से हिन्दी में एम.ए. करने के उपरांत सन् 1966 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पीएच.डी. में उनके शोध निर्देशक (गाइड) हिन्दी तथा बौद्ध दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान राहुल सांकृत्यायन एवं पाली भाषा तथा बौद्ध दर्शन के अध्येता डॉ. भिक्षु धर्मरक्षित थे। उनका यह शोध प्रबंध आज भी युवा शोधकर्ताओं के लिए दिशानिर्देशक का काम करता है। इनकी अब तक अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं जिनमें प्रमुख हैं - कामना, पूर्णिमा, बुद्ध अर्चना (कविता संग्रह) श्रद्धा के फूल, नारी हृदय (कहानी संग्रह), आदर्श बौद्ध महिलाएं, भगवान बुद्ध (जीवनी) बौद्ध कलाकृतियां (पुरातत्व), सौंदर्य और साधिकाएं (निवंध संग्रह), अर्चना (एकांकी संग्रह), मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव, महामति प्राणनाथ-एक युगान्तरकारी व्यक्तित्व (शोध ग्रंथ) आदि। ‘‘आदर्श बौद्ध महिलाएं’’ पुस्तक का बर्मी एवं नेपाली भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुआ। 


       डॉ. ‘मालविका’ को हिन्दी साहित्य सेवा के लिए अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए। जिनमें उल्लेखनीय हैं- सन् 1957 में स्वतंत्रता संग्राम शताब्दी सम्मान समारोह में मध्यप्रदेश शासन का साहित्य सृजन सम्मान, सन् 1958 में उत्तरप्रदेश शासन का कथा लेखन सम्मान, सन् 1959 में उत्तरप्रदेश शासन का जीवनी लेखन सम्मान, सन् 1964 में मध्यप्रदेश शासन का कथा साहित्य सम्मान, सन् 1966 में मध्यप्रदेश शासन का मीरा पुरस्कार प्रदान किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी डॉ. विद्यावती ने अपना लेखन सतत् जारी रखा। उनके इस साहित्य के प्रति सर्मपण को देखते हुए उन्हें सन् 1998 में महारानी लक्ष्मीबाई शास. उ.मा. कन्या विद्यालय क्रमांक-एक, सागर द्वारा ‘‘वरिष्ठ साहित्यसेवी सम्मान’’, सन् 2000 में भारतीय स्टेट बैंक सिविल लाइनस् शाखा सागर द्वारा ‘‘साहित्यसेवी सम्मान’’, वर्ष 2007 में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन सागर द्वारा ‘‘सुंदरबाई पन्नालाल रांधेलिया स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मान’’ एवं सन् 2016 में हिन्दी दिवस पर श्यामलम् संस्था सागर द्वारा ‘‘आचार्य भगीरथ मिश्र हिन्दी साहित्य सम्मान’’ से सम्मानित किया गया। उल्लेखनीय है कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों में डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का ससम्मान उल्लेख किया गया है, यथा :- मध्यभारत का इतिहास (चतुर्थ खंड), बुद्ध की देन, हिन्दी की महिला साहित्यकार , आधुनिक हिन्दी कवयित्रियों के प्रेमगीत, मध्यप्रदेश के साहित्यकार, रेत में कुछ चिन्ह, डॉ. ब्रजभूषण सिंह ‘आदर्श’ सम्मान ग्रंथ आदि। उनकी कुछ पुस्तकें इंटरनेट पर भी पढ़ी जा सकती हैं। नाट्यशोध संस्थान, कोलकता में उनका एकांकी संग्रह ‘‘’अर्चना’ संदर्भ ग्रंथ के रूप में पढ़ाया जाता है। इसी प्रकार नव नालंदा महाविहार, नालंदा, सम विश्वविद्यालय, बिहार के एम.ए. हिन्दी पाठ्यक्रम के चौथे प्रश्नपत्र बौद्ध धर्म- दर्शन और हिन्दी साहित्य के अंतर्गत ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ ग्रंथ पढ़ाया जाता है।
      बुन्देलखण्ड पर विशेष लेखन कार्य करते हुए डॉ. विद्यावती ने ‘‘दैनिक भास्कर’’ के सागर संस्करण में वर्ष 1997-98 में सागर संभाग की कवयित्रियां शीर्षक धारावाहिक लेखमाला तथा वर्ष 1998-99 में बुंदेली शहीद महिलाओं पर आधारित ‘‘कलम आज उनकी जय बोल’’ शीर्षक धारावाहिक लेखमाला लिखी। इसके साथ ही दैनिक ‘‘आचरण’’ सागर में बुन्देली इतिहास, साहित्य, संस्कृति एवं वैभव से संबंधित अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं। आकाशवाणी के इंदौर, उज्जैन, भोपाल एवं छतरपुर केन्द्रों से उनके रेडियो नाटकों का धारावाहिक प्रसारण किया जाता रहा है। उनकी कविताओं का नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन होता रहा है। अपने बुजुर्गों से मिली साहित्य सृजन की इस परम्परा को डॉ. विद्यावती ने न केवल अपनाया अपितु अपनी दोनों पुत्रियों को भी साहित्यिक संस्कार दिए। उनकी बड़ी पुत्री (यानी मैं) डॉ. वर्षा सिंह हिन्दी गजल में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं तथा छोटी पुत्री डॉ. (सुश्री) शरद सिंह उपन्यास एवं कथा लेखन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर चुकी हैं।
       डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ की कविताओं में मानवीय संवेगों की कोमल भावनाओं से ले कर वर्तमान की विषमताओं का चित्रण मिलता है। किसानों की पीड़ा और सूखे के संकट को बड़े ही सहज भाव से उन्होंने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है-
अब तो नभ में आओ बादल, धरती को नहला दो
प्यासी आंखें सूख चली है, बूंदों से सहला दो।
सूख रही है खेती, कृषक उदासे हैं
बंजर जीवन में, स्वप्न जरा से हैं
रिमझिम के स्वर से ,अब तो बहला दो।
हमने त्रुटियां की हैं, काटे पेड़ निरंतर
हमने ही तो मौसम में, लाया है अंतर
तुम दयालु हो, गलती तो झुठला दो।
ग्लोबल वार्मिंग और जल संरक्षण पर उनकी ये पंक्तियां देखिए-
     तप रही धरती से, मानव
     क्यों नहीं है सीख लेता ।
     सूखती नदियां, कुओं को
     काश ! संरक्षण तो देता ।
उनके कविता संग्रह ‘कामना’ में प्रकृति को बड़े ही सुंदर ढंग से वर्णित करती यह कविता प्रसाद-शैली का समरण कराती है-
          समयचक्र  चलता  रहता है....
          नीरव नीले अंबर में, सखि,  शुभ्र चंद्र मुस्काता है
          सरिताओं के चंचल जल में नव-नव खेल रचाता है
          फिर भी रजनी का आंसू
          ओस बना पड़ता रहता है.....
     वर्तमान में शांति विहार कालोनी, मकरोनिया में निवासरत् डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ 90 वर्ष की आयु में भी सतत् अध्ययन और लेखन कार्य कर रही हैं।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 05.06.2018)
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गुरुवार, मई 31, 2018

साहित्य वर्षा - 13 : संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी तेरहवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ  साहित्यकार प्रो. कांतिकुमार जैन के संस्मरण लेखन पर मेरा आलेख ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....
साहित्य वर्षा - 13           
 संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन
     - डॉ. वर्षा सिंह                                                                                   
 drvarshasingh1@gmail.com

सागर की उर्वर भूमि ने हिन्दी साहित्य को विभिन्न विधाओं के उद्भट विद्वान दिये हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, ललित निबन्ध आदि के क्रम में संस्मरण लेखन को एक प्यी पहचान देने का श्रेय सागर के साहित्यकार को ही है , जिनका नाम है प्रो. कांति कुमार जैन। 09 सितम्बर 1932 को सागर के देवरीकलां में जन्में कांति कुमार जैन ने तत्कालीन कोरिया स्टेट (छत्तीसगढ़) के बैकुंठपुर से सन् 1948 में मैट्रिक उत्तीर्ण किया। मैट्रिक में हिन्दी में विशेष योग्यता के लिये उन्हें कोरिया दरबार की ओर से स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा के लिये वे पुनः सागर आ गये। सागर विश्वविद्यालय के प्रतिभावान छात्रों में स्थान बनाते हुए उन्होंने सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं तथा स्वर्ण पदक प्राप्त किया। प्रा.े कांति कुमार जैन को अध्ययन- अध्यापन से आरम्भ से ही लगाव रहा। सन् 1956 से मध्यप्रदेश के अनेक महाविद्यालयों में शिक्षण कार्य करने के उपरांत सन् 1978 से 1992 तक डॉ, हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में माखनलाल चतुर्वेदी पीठ पर हिन्दी प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। प्रो. कांति कुमार जैन सागर विश्वविद्यालय की बुंदेली पीठ से प्रकाशित होने वाली बुंदेली लोकसंस्कृति पर आधारित पत्रिका ‘ईसुरी’ का कुशल सम्पादन करते हुए इसकी ख्याति को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
प्रो. कांति कुमार जैन ने कई महत्वपूर्ण शोधात्मक पुस्तकें लिखीं। जिनमें ‘छत्तीसगढ़ी बोली : व्याकरण और कोश’, ‘नई कविता’, ‘भारतेंदु पूर्व हिन्दी गद्य’, ‘कबीरदास’, ‘इक्कीसवीं शताब्दी की हिन्दी’ तथा ‘छायावाद की मैदानी और पहाड़ी शैलियां’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। ललित एवं आलोचनात्मक निबन्धों के साथ ही जब संस्मरण लेखन में सक्रिय हुए तब उनकी विशिष्ट शैली ने हिन्दी साहित्य जगत में मानों एक नयी धारा चला दी। सन् 2002 में उनकी पहली संस्मरण पुस्तक ‘लौट कर आना नहीं होगा’ प्रकाशित हुई। मुक्तिबोध और परसाई के घनिष्ठ मित्रों में रहे प्रो. कांति कुमार जैन ने एक संस्मरण पुस्तक लिखी ‘तुम्हारा परसाई’ जो सन् 2004 में प्रकाशित हुई । इसके बाद सन् 2006 में ‘जो कहूंगा सच कहूंगा’, सन् 2007 में ‘अब तो बात फैल गई’ और सन् 2011 में ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ प्रकाशित हुई।
संस्मरण हिन्दी में अपेक्षाकृत नयी विधा है जिसका आरम्भ द्विवेदी युग से माना जाता है। परंतु इस विधा का असली विकास छायावादी युग में हुआ। इस काल में सरस्वती, सुधा, माधुरी, विशाल भारत आदि पत्रिकाओं में संस्मरण प्रकाशित हुए। संस्मरण को साहित्यिक निबन्ध की एक प्रवृत्ति भी माना गया है। साहित्य से इतर लोगों में अकसर आत्मकथा और संस्मरण को लेकर मतिभ्रम होने लगता है। किन्तु संस्मरण और आत्मकथा के दृष्टिकोण में मौलिक अन्तर है। आत्मकथा के लेखक का मुख्य उद्देश्य अपनी जीवनकथा का वर्णन करना होता है। इसमें कथा का प्रमुख पात्र स्वयं लेखक होता है। संस्मरण लेखक का दृष्टिकोण भिन्न रहता है। संस्मरण में लेखक जो कुछ स्वयं देखता है और स्वयं अनुभव करता है उसी का चित्रण करता है। लेखक की स्वयं की अनुभूतियां तथा संवेदनायें संस्मरण का ताना-बाना बुनती हैं। संस्मरण लेखक एक निबन्धकार की भांति अपने स्मृतियों को गद्य के रूप में बांधता है और एक इतिहासकार के रूप में तत्संबंधित काल को प्रदर्शित करता है। कहने का आशय है कि संस्मरण निबंध और इतिहास का साहित्यिक मिश्रण होता है और जिसका मूल संबंध संस्मरण लेखक की स्मृतियों से होता है। वह अपने चारों ओर के जीवन का वर्णन करता है।
जैसा कि समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ के बारे में लिखती हैं-‘‘कांति कुमार जैन की संस्मरण पुस्तक ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ एक अलग कालखण्ड में ले जाती है। जहां पहुंचने पर कई बातें चमत्कृत कर देती हैं। कभी लगता है जैसे हम किसी परियों की कहानी से गुज़र रहे हों तो कभी, जीवन के कटु और खुरदुरे यथार्थ की चुभन महसूस होने लगती है लेकिन इन सबके साथ बचपन की भोली दृष्टि अपनी पूरी मासूमियत के साथ पग-पग साथ चलती है और कहीं-कहीं किशोरावस्था की दस्तक वाली यादें भी छलक कर बाहर आ जाती हैं। ......‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ कांति कुमार जैन के सात वर्ष से सोलह वर्ष की आयु की स्मृतियों का लेखाजोखा मात्र नहीं है, यह संस्मरण-पुस्तक तत्कालीन समाज, राजनीति, आर्थिक व्यवस्थाओं और मानवीय चेष्टाओं का एक ऐसा दस्तावेज़ बनाती है जिसमें बालमन, किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था की दृष्टि, विचारों और विश्लेषणों का अद्भुत मिश्रण है। यूं भी हिन्दी साहित्य में आधुनिक संस्मरण विधा को नई स्थापना देने का श्रेय कांति कुमार जैन के संस्मरण लेखन खाते में है। कथ्य तो विशेष है ही, साथ ही, कांति कुमार जैन की सहज वर्णनात्मक कला ने पुस्तक के कलेवर को इतना प्रवाहमय बना दिया है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इसे पूरा करके ही पाठक इसे एक ओर रख सकेगा, बिलकुल टाईम मशीन में बैठ कर किसी अलग कालखण्ड की यात्रा पूरी करने जैसी अनुभूति के साथ।
लेखन क्षेत्र में सतत् सक्रिय रहने वाले प्रो. कांति कुमार जैन ने अपने मि़त्र मुक्तिबोध से जुड़ी स्मृतियों को सहेजते हुए ‘महागुरू मुक्तिबोध : जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से संस्मरण पुस्तक लिखी, जो सन् 2014 में प्रकाशित हुई। इसी क्रम में सन् 2015 में कोरिया के राजा पर ’एक था राजा’ प्रकाशित हुई, जिसकी भूमिका में  प्रो. कांति कुमार जैन ने लिखा है- ‘एक था राजा में कोरिया के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के प्रादर्श प्रभाव और प्रशासन के नख चित्रात्मक संस्मरण। ये संस्मरण पूरे या सांगोपांग प्रकृति के नहीं हैं। बल्कि 65-70 वर्ष बाद भी जो व्यक्ति, स्थान, घटनायें या प्रसंग मेरी स्मृति में हिलते रह गये हैं, उनका कहीं हल्का, कहीं विस्तृत उल्लेख। प्रायः हल्का ही। यह सामग्री मैंने कुछ अपनी स्मृति से जुटाई है , कुछ जनश्रुतियों से, अधिकांश राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के चौथे पुत्र डॉ रामचंद्र सिंहदेव के सौजन्य से।’
प्रो. कांति कुमार जैन का एक बहुत ही रोचक संस्मरण है- ‘पप्पू खवास का कुनबा’ वे अपने संस्मरण लेखन में जिस प्रकार चुटेले शब्दों का सहज भाव से प्रयोग करते हैं उससे उनक ेलेखन में सदैव ताजा टटकेपन का बोध होता है। अपने संस्मरण लेखन के कारण कई बार उन्हें संकटों का भी सामना करना पड़ा, विरोध भी झेलना पड़ा, किन्तु उन्होंने अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया। वर्तमान हिन्दी साहित्य जगत में प्रो. कांति कुमार जैन संस्मरण लेखन के पुरोधा एवं ‘संस्मरणाचार्य’ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके हैं।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 29.05.2018)
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शुक्रवार, मई 18, 2018

साहित्य वर्षा - 11 ‘विजयपथ’ के कवि ललित मोहन  - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी ग्यारहवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ  कवि डॉ. ललित मोहन द्वारा लिखी गयी देशभक्ति की कविताओं पर मेरा आलेख ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा - 11
             
      ‘विजयपथ’ के कवि ललित मोहन
                              डॉ. वर्षा सिंह
                                                 drvarshasingh1@gmail.com

अपने देश और मातृभूमि के प्रति सम्मान रखना, स्वाभिमान प्रकट करना और उसके प्रति वफ़ादार रहना, देशभक्ति की भावना का सूचक है। ’शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा’ - पंडित जगदम्बा प्रसाद मिश्र की इस कालजायी कविता के ये शब्द हमें उन दिनों में आज़ादी की महत्ता एवं उसे प्राप्त करने के लिए चुकाई जाने वाली कीमत का अहसास कराते हैं जब देशभक्तों ने अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी अपने देश को परतंत्रता से मुक्त कराने के लिए। वह दौर था जब देश का हर बच्चा बूढ़ा और जवान देश प्रेम की भावना से सराबोर था। देश स्वतंत्र हुआ। देश के चतुर्मुखी विकास ने हमें ग्लोबलाईजेशन तक पहुंचा दिया। ग्लोबलाईजेशन के इस दौर में अनुभव किया जाने लगा कि युवा पीढ़ी इस कदर अपना कैरियर बनाने में व्यस्त होती जा रही है कि वह अपने देशभक्तों की कुर्बानी की ओजपूर्ण कहानियां और भारतीय सैनिकों की बलिदान की ओर से विरत होती जा रही है। इसी कटु यथार्थ को ध्यान में रखते हुए देश की स्वतंत्रता की 70 वीं वर्षगांठ पर ’आजादी-70 : याद करो कुर्बानी’ नाम से स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में 15 दिनों का उत्सव मनाया गया था ताकि देश के युवाओं में देशभक्ति की भावना जागृत हो सके। आने वाली पीढ़ी में मातृभूमि के प्रति लगाव पैदा कर सकें। दूसरी ओर साहित्य अपनी भूमिका पूर्ववत् निभाता रहा। साहित्य में देशप्रेम को यथावत स्थान मिलता रहा। ऐसे अनेकों गीत हैं जो देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत हैं। देश के बच्चों एवं युवाओं में इस भावना के अलख को जगाए रखने में देश भक्ति से भरे गीत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता। देशभक्ति का रागात्मक स्वरुप, देश के प्रति प्रेम, भक्ति-भावना, स्वर्णिम अतीत का गौरव गान यह सब गीतों में मुखर होता रहा है। लेकिन देश भक्ति गीतों का वह आवेग कम ही देखने को मिलता है जो देशभक्ति गीत संग्रह ‘विजय पथ’ में निबद्ध है।
22 दिसम्बर 1958 को सागर, मध्यप्रदेश में जन्मे ललित मोहन बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के साथ ही संचार एवं पत्रकारिता में विशिष्ट अध्ययन किया। उन्होंने संगीत प्रभाकर भी किया। जहां तक आजीविका का प्रश्न है तो वे राज्य शासन सेवा के प्रौढ़ शिक्षा विभाग में पर्यवेक्षक पद पर रहे। इसके बाद आकाशवाणी में बुंदेली कम्पीयर एवं उद्घोषक का कार्य किया। इसके बाद सन् 1986 में डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में ललित कला एवं प्रदशर्नकारी कला विभाग में व्याख्याता के पद पर पदस्थ हुए। यू.पी.एस.सी. द्वारा चयनित होने पर सन् 1992 से 1994 तक आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिकारी का दायित्व सम्हाला। तदोपरांत पुनः डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में ललित कला एवं प्रदशर्नकारी कला विभाग में अपनी सेवाएं देने लगे।
डॉ. ललित मोहन ने साहित्य सेवा के साथ ही अनेक महत्वपूर्ण अभियानों में सहभागिता की तथा सम्मान भी प्राप्त किये। जैसे सन् 1979 में भोपाल से मुंबई साइकिल अभियान, सन् 1980 में पहलगाम से अमरनाथ पदयात्रा, सन् 1981 में माऊंट आबू में ट्रेकिंग, सन् 1988 में सागर से कन्याकुमारी स्कूटर अभियान, सन् 1991 में सागर से इम्फाल कार यात्रा आदि महत्वपूर्ण हैं। सन् 1998 में उनका प्रथम काव्य संग्रह ‘अनंत पथ’ प्रकाशित हुआ। इससे पूर्व स्थानीय समाचार पत्र साप्ताहिक जनप्रयोग में ललित मोहन का लिखा बुंदेली धारावाहिक ‘कक्का मठोले’ काफी चर्चित रहा।
वर्तमान में डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर के ललित कला एवं प्रदर्शनकारी कला तथा पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष ललित मोहन का दूसरे गीत संग्रह ‘विजय पथ’ का प्रथम संस्करण सन् 1999 में प्रकाशित हुआ। वीर जवानों को समर्पित स्वदेश गीतों के इस संग्रह के प्रकाशक थे तत्कालीन संसद सदस्य, सागर लोकसभा वीरेन्द्र कुमार, जो वर्तमान में भारत सरकार के केन्द्रीय मंत्री हैं। ‘विजय पथ’ में देश भक्ति की भावना के साथ ही उन सैनिकों के देश प्रेम को स्वर दिया गया है जो कठिन परिस्थितियों में सीमाओं पर डटे रह कर देश की रक्षा करते हैं। यह उदाहरण देखें-
ताकत वतन की सेनानी
तप कर लोहा बनते हैं
युद्ध शांति विपदाओं में
देश कर रक्षा करते हैं
सियाचिन और कारगिल की बर्फीली पहाड़ियों में जहां तापमान शून्य से 30 डिग्री से भी नीचे चला जाता है वहां भी जिस जज़्बे के साथ भारतीय सैनिक अपना कर्तव्य निर्वहन करते रहते हैं, उसे ललित मोहन ने इन पंक्तियों में बड़ी सुन्दरता के साथ पिरोया है-
गोली चलती धांय धांय
हवा मचलती सांय सांय
ठंडी ठंडी हिम घाटी
ताकत है अपनी माटी
आगे कदम बढ़ायेंगे
देश्मन से टकरायेंगे
सम्मुख गोली खायेंगे
विजय ध्वजा फहरायेंगे
कवि ने अपनी कविता के माध्यम से उन विदेशी शक्तियों को ललकारा है जो सीमाओं का अतिक्रमण करते रहते हैं तथा देश की शांति भंग करने का प्रयास करते रहते हैं-
मत देखो कश्मीर कारगिल
सरहद पार के रहने वालो
बंद करो ये ताका झांकी
अपना ही घर देखो भाला
...............................................
समय अभी है सावधान हो
पग प्यारे पीछे लौटा लो
इस धरती पर अटल शक्ति है
धरा गगन का प्रलय बचा लो
भौगोलिक रूप से भी विविधता में एकता वाले भारत की भूमि प्राकृतिक सौंदर्य की भी धनी है। इस तथ्य को ललित मोहन ने अपनी कविता ‘पावस धरा’ में बड़े सुन्दर ढंग से व्याख्यायित किया है -
निर्मल कलकल सरिता जल
झरनों की लय में मधुर छंद
ष्यामल बादल का भीगा तन
माटी से आती सोंधी गंध
ये धरती जग में न्यारी है
पावस धरा हमारी है
भूमि हिन्द की प्यारी है
कवि ने भारत के जन-जन के मन में स्थापित धार्मिक एकता एवं समभाव का स्मरण कराते हुए लिखा है -
राम का है धाम यहां
रोजा अजान रमजान
नानक ईशु की धरती
है भारत देश महान
उल्लेखनीय है कि ललित मोहन द्वारा रचित देश भक्ति गीत संग्रह ‘विजय पथ’ के लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक संस्करणों का निःशुल्क वितरण किया जा चुका है। इसी तारतम्य में भारतीय सेना के सम्मान में देश भक्ति गीतों के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से ‘विजय पथ’ की सत्रह हजार प्रतियों का निःशुल्क वितरण अपने आप में एक कीर्तिमान है। इस संग्रह के गीत आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी प्रसारित होते रहते हैं। सैनिकों के शौर्य के जयगान से परिपूर्ण ‘विजय पथ’ देशभक्ति रचनाओं के क्रम में एक मील का पत्थर है।

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(साप्ताहिक सागर झील दि. 15.05.2018)
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सोमवार, मई 14, 2018

साहित्य वर्षा - 10 ‘गीता’ के पद्यानुवाद के कवि डॉ. मनीष झा - डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय मित्रों, 

       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी दसवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ  साहित्यकार डॉ. मनीष झा द्वारा किये गए गीता के पद्यानुवाद पर मेरा आलेख ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा - 10

  ‘गीता’ के पद्यानुवाद के कवि डॉ. मनीष झा

   - डॉ. वर्षा सिंह


जब किसी रचना का एक-एक शब्द व्याख्यायित हो कर अंतस में समा जाए और फिर एक नवीन मौलिकाता के साथ यानी नए चोले में मुखरित हो तो वह सच्चा अनुवादकार्य होता है। इसे दूयरे शब्दों में कहा जाए तो अनुवाद कार्य अपने आप में चुनौती भरा कार्य है। इसे करते हुए मूल सामग्री के मर्म से भली-भांति तादात्म्य स्थापित होना आवश्यक हो जाता है। मूल सामग्री के मर्म को  आत्मसात किए बिना यदि अनुवाद कार्य किया जाता है तो वह भाषान्तरण, लिप्यांतरण अथवा शब्दांतरण तो हो सकता है किन्तु अनुवाद नहीं हो सकता है। उस पर पद्यानुवाद का कार्य तो और अधिक धैर्य, ज्ञान, सतर्कता और समर्पण की मांग करता है। पद्यानुवाद करने वाले के लिए यह अत्यावश्यक हो जाता है कि वह मूल सामग्री के मर्म को आत्मसात करे और साथ ही उसे इतना प्रचुर शब्द ज्ञान हो कि वह मूल के मर्म को काव्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करने के लिए सही शब्द का चयन कर सके। जिससे मूल सामग्री अपने पूरे प्रभाव के साथ पद्यानुवाद में ढल सके। डॉ. मनीष चंद्र झा ने ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का पद्यानुवाद ‘गीतगीता’ के रूप में करते हुए पद्यानुवाद के सभी मानकों पर खरे उतरे हैं। उन्होंने पद्यानुवाद में भी कठिन मार्ग को चुना। डॉ. झा ने ‘गीता’ के श्लोकों को मुक्तछंद में नहीं बल्कि छंदबद्ध करते हुए दोहे और चौपाइयों में उतारा है। छंद अपने आप में विशेष श्रम मांगते हैं और यह श्रम डॉ. झा ने किया है।

26 सितम्बर 1969 में भागलपुर (बिहार) के ग्राम भ्रमरपुर में जन्मे डॉ. मनीष चंद्र झा ने मध्यप्रदेश के जबलपुर मेडिकल कॉलेज से एम.बी. बी. एस. तथा एम.एस. (अस्थिरोग) की उपाधि प्राप्त करने के बाद चिकित्साकार्य के लिए सागर नगर को अपने कार्यस्थल के रूप में चुना। उल्लेखनीय है कि उनकी जीवनसंगिनी डॉ. आराधना झा भी अस्थिरोग विशेषज्ञ हैं। सागर नगर के चिकित्सा क्षेत्र में झा दंपत्ति एक प्रतिष्ठित नाम हैं। चिकित्सा के साथ ही डॉ. मनीष चंद्र झा की साहित्य में भी अपार रूचि है और इसी रूचि के परिणाम स्वरूप उनकी प्रथम कृति ‘गीतगीता’ के रूप में पाठकों के सामने आई।           

‘श्रीभगवद्गीता’ भारतीय विचार दर्शन एवं जीवन दर्शन की अनुपम कृति है। यह ‘महाभारत’ महाकाव्य का अंश होते हुए भी अपने आप में सम्पूर्णता लिए हुए है। यह महाभारत के भीष्मपर्व में निहित है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर व्यक्ति के सामने आती हैं। यह व्यक्ति को उसके कर्त्तव्यों से परिचित कराती है, साथ ही अच्छे और बुरे में अन्तर करना भी सिखाती है। 

‘श्रीभगवद्गीता’ की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्ध है। जब कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने आ खड़ी हुईं और युद्ध आरंभ करने के लिए मात्र एक हुंकार की देरी थी, तभी अर्जुन की दृष्टि सामने खड़े योद्धाओं पर पड़ी। उसके सामने उसके सभी कौरव भाई, मामा, चाचा आदि रिश्तेदार खड़े थे। उन सबसे बढ़ कर भीष्म पितामह जिनका अर्जुन बहुत सम्मान करता था, वे भी उस पंक्ति में खड़े थे जिन पर अर्जुन को अपने बाणों से वर्षा करनी थी। अर्जुन यह सोच कर स्तब्ध रह गया कि मैं अपने भाइयों, अपने संबंधियों पर कैसे बाण चला सकता हूं? नहीं, यह मुझसे नहीं होगा। यह विचार आते ही उसने श्री कृष्ण से कहा कि मैं यह युद्ध नहीं लडूंगा। मुझसे अपने भाइयों, अपने पितामह जैसे संबंधियों पर शस्त्र नहीं चलाया जा सकेगा। उस घड़ी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि युद्ध लड़ने के रूप में जो कार्य तुम करने जा रहे हो वह धर्म सम्मत है। बुराई का नाश कभी अधर्म हो ही नहीं सकता है। ये जो तुम्हारे सामने खड़े हैं, वे तुम्हारे संबंधी नहीं वरन् अधर्म के अनुयायी हैं अतः इनका नाश करना तुम्हारा धर्म है। यही बात समझाते हुए श्रीकृष्ण ने जो ज्ञान अर्जुन को दिया वही गीता का ज्ञान कहलाया। महर्षि वेदव्यास ने इस ज्ञान को ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ के रूप में ‘‘महाभारत’’ महाकाव्य में समाहित किया है। 

‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का महत्व आज भी प्रसंगिक है। आज के उपभोक्तावादी युग में व्यक्ति कोई भी काम करने से पहले उसके अच्छे परिणाम पाने की कामना करने लगता है और इस चक्कर में वह अपना संयम गवां बैठता है। ऐसे में अच्छे परिणाम नहीं मिलते हैं और वह हताश हो कर ग़लत क़दम उठाने लगता है। अतः आज के वातावरण में ‘गीता’ का यह सुप्रसिद्ध श्लोक मार्गदर्शक का काम करता है- 

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।


इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो पूर्ण निष्ठा से साथ व्यक्ति कर्म नहीं कर सकेगा। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकर अपना काम करते रहो।

इस श्लोक का बहुत ही सुंदर पद्यानुवाद डॉ. मनीष चंद्र झा ने इन शब्दों में किया है-

कहि प्रभु फल तजि कामनाए कर्म करे निष्काम।

संयासी  योगी   वही,  नहिं  अक्रिय  विश्राम।।


इसी तरह वर्तमान जीवन में दिखावा इतना अधिक बढ़ गया है कि मन की शांति ही चली गई है। यह भी मिल जाए, वह भी मिल जाए की लालसा व्यक्ति को निरन्तर भटकाती रहती है। आज युवा पीढ़ी कर्मशील मनुष्य नहीं बल्कि ‘पैकेज़’ में क़ैद दास बनते जा रहे हैं क्यों कि उन्हें पैकेज़ की चार अंकों की राशि दिखाई देती है, जीवन की स्थिरता और मन की शांति नहीं। दुख की बात यह है कि उन्हें इस दासत्व के मार्ग में माता-पिता और अभिभावक ही धकेलते हैं। जबकि ऐसा करके वे अपने बुढ़ापे का सहारा भी खो बैठते हैं। इस संबंध में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में कहा गया है -

  विहाय कामान्यः कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृहः।

  निर्ममो निरहंकार स शांति मधि गच्छति।।

अर्थात् मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।


डॉ. मनीष चंद्र झा के शब्दों में इसी भाव को देखिए -

विषयन इन्द्रिन के संयोगा,  जे आरम्भ  सुधा  सम भोगा।

अंत परंतु गरल सम जेकी, वह सुख राजस कहहि विवेकी।। 


धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं कि कुरुक्षेत्र के युद्धीभूमि पर जो भी हो रहा है, वह मुण्े अपनी दिव्यदृष्टि से देख कर बताओ-

कहि राजा  धृतराष्ट्र  हे संजय  कहो यथार्थ।

धर्म  धरा  कुरुक्षेत्र में,  जिन  ठाड़े  समरार्थ।।

मेरे सुत   औ पांडु के,  सैन्य सहित सब वीर।

कौन जतन करि भांति के, दकखि बताओ धीर।।


इस पर संजय अपनी दिव्यदृष्टि से कुरुक्षेत्र का विवरण देना आरम्भ करते हैं-

संजय कहि देखि भरि नैना, व्यूह खड़े पांडव की सेना।

द्रोण निकट दुर्योंधन जाई,  राजा कहे वचन ऐहि नाई।।


ऐसा सरल पद्यानुवाद किसी भी पाठक के मन-मस्तिष्क को प्रभावित कर के ही रहेगा। यह समय भी ‘गीता’ के उपदेशों को अपने जीवन में उतारने का है। आज ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ के महत्व को सभी स्वीकार रहे हैं। बड़े-बड़े मैनेजमेंट गुरु ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में मैनेजमेंट के गुर ग्रहण कर लोगों को बता रहे हैं। मल्टीनेशनल कंपनियां ‘गीता’ के श्लोकों का प्रयोग अपने कर्मचारियों में नई ऊर्जा का संचार करने के लिए कर रही हैं। कर्मचारियसों को ‘गीता’ का ज्ञान देने के लिए मोटिवेशन गुरुओं एवं ‘गीता’ के अध्येताओं को बुलाया जाता है। कहने का आशय यह है कि वर्तमान जीवन में भी ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ की प्रसंगिकता पूर्ववत् बनी हुई है जबकि आज युवाओं में संस्कृत और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का ज्ञान कम हो गया है। सीधा-सीधा उपदेशात्मक ज्ञान भी उन्हें लुभा नहीं पाता है। ऐसे में सरल शब्दों में पद्यानुवाद अत्यंत प्रभावशाली परिणाम दे सकता है। यूं भी पद्य की रागात्मकता देर तक मन-मस्तिष्क में ध्वनित होती रहती है तथा दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ती है। इस संदर्भ में जीवन को सही दिशा देने वाली ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का सरल भाषा में पद्यानुवाद कर डॉ. मनीष चंद्र झा ने अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है। क्योंकि बाज़ार में उपलब्ध अर्थ एवं टीका सहित ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में श्लोकों के गद्य में अर्थ दिए रहते हैं जिनसे श्लोकों का अर्थ तो पता चल जाता है किन्तु श्लोकों के मर्म से रागात्मक जुड़ाव नहीं हो पाता है। डॉ. झा ने ‘गीता’ को सामान्य बोलचाल की भाषा में अनूदित कर सामान्य जन के लिए  ‘गीता’ के मर्म को समझने योग्य बना दिया है। ‘गीतगीता’ दोहे-चौपाइयों में निबद्ध है जिससे इसमें सुंदर लयात्मकता है, गेयता है।

डॉ. मनीष चंद्र झा आकाशवाणी और दूरदर्शन में भी अपनी छंदमुक्त और छंदबद्ध रचनाओं का पाठ कर चुके हैं तथा साहित्यसृजन में सतत् सक्रिय रहते हैं किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘गीतगीता’ उनकी एक अनुपमकृति है और उन्हें सागर के साहित्याकाश में दैदिप्यमान तारे की भांति स्थापित करती है।

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(साप्ताहिक सागर झील दि. 08.05.2018)

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साहित्य वर्षा - 10
  ‘गीता’ के पद्यानुवाद के कवि डॉ. मनीष झा
   - डॉ. वर्षा सिंह

जब किसी रचना का एक-एक शब्द व्याख्यायित हो कर अंतस में समा जाए और फिर एक नवीन मौलिकाता के साथ यानी नए चोले में मुखरित हो तो वह सच्चा अनुवादकार्य होता है। इसे दूयरे शब्दों में कहा जाए तो अनुवाद कार्य अपने आप में चुनौती भरा कार्य है। इसे करते हुए मूल सामग्री के मर्म से भली-भांति तादात्म्य स्थापित होना आवश्यक हो जाता है। मूल सामग्री के मर्म को  आत्मसात किए बिना यदि अनुवाद कार्य किया जाता है तो वह भाषान्तरण, लिप्यांतरण अथवा शब्दांतरण तो हो सकता है किन्तु अनुवाद नहीं हो सकता है। उस पर पद्यानुवाद का कार्य तो और अधिक धैर्य, ज्ञान, सतर्कता और समर्पण की मांग करता है। पद्यानुवाद करने वाले के लिए यह अत्यावश्यक हो जाता है कि वह मूल सामग्री के मर्म को आत्मसात करे और साथ ही उसे इतना प्रचुर शब्द ज्ञान हो कि वह मूल के मर्म को काव्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करने के लिए सही शब्द का चयन कर सके। जिससे मूल सामग्री अपने पूरे प्रभाव के साथ पद्यानुवाद में ढल सके। डॉ. मनीष चंद्र झा ने ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का पद्यानुवाद ‘गीतगीता’ के रूप में करते हुए पद्यानुवाद के सभी मानकों पर खरे उतरे हैं। उन्होंने पद्यानुवाद में भी कठिन मार्ग को चुना। डॉ. झा ने ‘गीता’ के श्लोकों को मुक्तछंद में नहीं बल्कि छंदबद्ध करते हुए दोहे और चौपाइयों में उतारा है। छंद अपने आप में विशेष श्रम मांगते हैं और यह श्रम डॉ. झा ने किया है।
26 सितम्बर 1969 में भागलपुर (बिहार) के ग्राम भ्रमरपुर में जन्मे डॉ. मनीष चंद्र झा ने मध्यप्रदेश के जबलपुर मेडिकल कॉलेज से एम.बी. बी. एस. तथा एम.एस. (अस्थिरोग) की उपाधि प्राप्त करने के बाद चिकित्साकार्य के लिए सागर नगर को अपने कार्यस्थल के रूप में चुना। उल्लेखनीय है कि उनकी जीवनसंगिनी डॉ. आराधना झा भी अस्थिरोग विशेषज्ञ हैं। सागर नगर के चिकित्सा क्षेत्र में झा दंपत्ति एक प्रतिष्ठित नाम हैं। चिकित्सा के साथ ही डॉ. मनीष चंद्र झा की साहित्य में भी अपार रूचि है और इसी रूचि के परिणाम स्वरूप उनकी प्रथम कृति ‘गीतगीता’ के रूप में पाठकों के सामने आई।          
‘श्रीभगवद्गीता’ भारतीय विचार दर्शन एवं जीवन दर्शन की अनुपम कृति है। यह ‘महाभारत’ महाकाव्य का अंश होते हुए भी अपने आप में सम्पूर्णता लिए हुए है। यह महाभारत के भीष्मपर्व में निहित है। इसके 18 अध्यायों के करीब 700 श्लोकों में हर उस समस्या का समाधान है जो कभी ना कभी हर व्यक्ति के सामने आती हैं। यह व्यक्ति को उसके कर्त्तव्यों से परिचित कराती है, साथ ही अच्छे और बुरे में अन्तर करना भी सिखाती है।
‘श्रीभगवद्गीता’ की पृष्ठभूमि महाभारत का युद्ध है। जब कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने आ खड़ी हुईं और युद्ध आरंभ करने के लिए मात्र एक हुंकार की देरी थी, तभी अर्जुन की दृष्टि सामने खड़े योद्धाओं पर पड़ी। उसके सामने उसके सभी कौरव भाई, मामा, चाचा आदि रिश्तेदार खड़े थे। उन सबसे बढ़ कर भीष्म पितामह जिनका अर्जुन बहुत सम्मान करता था, वे भी उस पंक्ति में खड़े थे जिन पर अर्जुन को अपने बाणों से वर्षा करनी थी। अर्जुन यह सोच कर स्तब्ध रह गया कि मैं अपने भाइयों, अपने संबंधियों पर कैसे बाण चला सकता हूं? नहीं, यह मुझसे नहीं होगा। यह विचार आते ही उसने श्री कृष्ण से कहा कि मैं यह युद्ध नहीं लडूंगा। मुझसे अपने भाइयों, अपने पितामह जैसे संबंधियों पर शस्त्र नहीं चलाया जा सकेगा। उस घड़ी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि युद्ध लड़ने के रूप में जो कार्य तुम करने जा रहे हो वह धर्म सम्मत है। बुराई का नाश कभी अधर्म हो ही नहीं सकता है। ये जो तुम्हारे सामने खड़े हैं, वे तुम्हारे संबंधी नहीं वरन् अधर्म के अनुयायी हैं अतः इनका नाश करना तुम्हारा धर्म है। यही बात समझाते हुए श्रीकृष्ण ने जो ज्ञान अर्जुन को दिया वही गीता का ज्ञान कहलाया। महर्षि वेदव्यास ने इस ज्ञान को ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ के रूप में ‘‘महाभारत’’ महाकाव्य में समाहित किया है।
‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का महत्व आज भी प्रसंगिक है। आज के उपभोक्तावादी युग में व्यक्ति कोई भी काम करने से पहले उसके अच्छे परिणाम पाने की कामना करने लगता है और इस चक्कर में वह अपना संयम गवां बैठता है। ऐसे में अच्छे परिणाम नहीं मिलते हैं और वह हताश हो कर ग़लत क़दम उठाने लगता है। अतः आज के वातावरण में ‘गीता’ का यह सुप्रसिद्ध श्लोक मार्गदर्शक का काम करता है-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतु र्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य को बिना फल की इच्छा से अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा व ईमानदारी से करना चाहिए। यदि कर्म करते समय फल की इच्छा मन में होगी तो पूर्ण निष्ठा से साथ व्यक्ति कर्म नहीं कर सकेगा। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। इसलिए बिना किसी फल की इच्छा से मन लगाकर अपना काम करते रहो।
इस श्लोक का बहुत ही सुंदर पद्यानुवाद डॉ. मनीष चंद्र झा ने इन शब्दों में किया है-
कहि प्रभु फल तजि कामनाए कर्म करे निष्काम।
संयासी  योगी   वही,  नहिं  अक्रिय  विश्राम।।

इसी तरह वर्तमान जीवन में दिखावा इतना अधिक बढ़ गया है कि मन की शांति ही चली गई है। यह भी मिल जाए, वह भी मिल जाए की लालसा व्यक्ति को निरन्तर भटकाती रहती है। आज युवा पीढ़ी कर्मशील मनुष्य नहीं बल्कि ‘पैकेज़’ में क़ैद दास बनते जा रहे हैं क्यों कि उन्हें पैकेज़ की चार अंकों की राशि दिखाई देती है, जीवन की स्थिरता और मन की शांति नहीं। दुख की बात यह है कि उन्हें इस दासत्व के मार्ग में माता-पिता और अभिभावक ही धकेलते हैं। जबकि ऐसा करके वे अपने बुढ़ापे का सहारा भी खो बैठते हैं। इस संबंध में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में कहा गया है -
  विहाय कामान्यः कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृहः।
  निर्ममो निरहंकार स शांति मधि गच्छति।।
अर्थात् मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी।

डॉ. मनीष चंद्र झा के शब्दों में इसी भाव को देखिए -
विषयन इन्द्रिन के संयोगा,  जे आरम्भ  सुधा  सम भोगा।
अंत परंतु गरल सम जेकी, वह सुख राजस कहहि विवेकी।।

धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं कि कुरुक्षेत्र के युद्धीभूमि पर जो भी हो रहा है, वह मुण्े अपनी दिव्यदृष्टि से देख कर बताओ-
कहि राजा  धृतराष्ट्र  हे संजय  कहो यथार्थ।
धर्म  धरा  कुरुक्षेत्र में,  जिन  ठाड़े  समरार्थ।।
मेरे सुत   औ पांडु के,  सैन्य सहित सब वीर।
कौन जतन करि भांति के, दकखि बताओ धीर।।

इस पर संजय अपनी दिव्यदृष्टि से कुरुक्षेत्र का विवरण देना आरम्भ करते हैं-
संजय कहि देखि भरि नैना, व्यूह खड़े पांडव की सेना।
द्रोण निकट दुर्योंधन जाई,  राजा कहे वचन ऐहि नाई।।

ऐसा सरल पद्यानुवाद किसी भी पाठक के मन-मस्तिष्क को प्रभावित कर के ही रहेगा। यह समय भी ‘गीता’ के उपदेशों को अपने जीवन में उतारने का है। आज ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ के महत्व को सभी स्वीकार रहे हैं। बड़े-बड़े मैनेजमेंट गुरु ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में मैनेजमेंट के गुर ग्रहण कर लोगों को बता रहे हैं। मल्टीनेशनल कंपनियां ‘गीता’ के श्लोकों का प्रयोग अपने कर्मचारियों में नई ऊर्जा का संचार करने के लिए कर रही हैं। कर्मचारियसों को ‘गीता’ का ज्ञान देने के लिए मोटिवेशन गुरुओं एवं ‘गीता’ के अध्येताओं को बुलाया जाता है। कहने का आशय यह है कि वर्तमान जीवन में भी ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ की प्रसंगिकता पूर्ववत् बनी हुई है जबकि आज युवाओं में संस्कृत और संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का ज्ञान कम हो गया है। सीधा-सीधा उपदेशात्मक ज्ञान भी उन्हें लुभा नहीं पाता है। ऐसे में सरल शब्दों में पद्यानुवाद अत्यंत प्रभावशाली परिणाम दे सकता है। यूं भी पद्य की रागात्मकता देर तक मन-मस्तिष्क में ध्वनित होती रहती है तथा दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ती है। इस संदर्भ में जीवन को सही दिशा देने वाली ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का सरल भाषा में पद्यानुवाद कर डॉ. मनीष चंद्र झा ने अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है। क्योंकि बाज़ार में उपलब्ध अर्थ एवं टीका सहित ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में श्लोकों के गद्य में अर्थ दिए रहते हैं जिनसे श्लोकों का अर्थ तो पता चल जाता है किन्तु श्लोकों के मर्म से रागात्मक जुड़ाव नहीं हो पाता है। डॉ. झा ने ‘गीता’ को सामान्य बोलचाल की भाषा में अनूदित कर सामान्य जन के लिए  ‘गीता’ के मर्म को समझने योग्य बना दिया है। ‘गीतगीता’ दोहे-चौपाइयों में निबद्ध है जिससे इसमें सुंदर लयात्मकता है, गेयता है।
डॉ. मनीष चंद्र झा आकाशवाणी और दूरदर्शन में भी अपनी छंदमुक्त और छंदबद्ध रचनाओं का पाठ कर चुके हैं तथा साहित्यसृजन में सतत् सक्रिय रहते हैं किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘गीतगीता’ उनकी एक अनुपमकृति है और उन्हें सागर के साहित्याकाश में दैदिप्यमान तारे की भांति स्थापित करती है।
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साहित्य वर्षा - 9 शायर अशोक मिजाज़ और उनकी हिन्दी ग़ज़लें - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, 

       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी नवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ शायर अशोक मिज़ाज और उनकी हिन्दी ग़ज़लेंं।....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ..

साहित्य वर्षा - 9

 शायर अशोक मिजाज़ और उनकी हिन्दी ग़ज़लें 

       - डॉ. वर्षा सिंह


            ग़ज़ल लिखी नहीं, कही जाती है। जो दिल में होता है उसे कहते समय बनावट या मिलावट की कृत्रिम कारीगरी नहीं होती। जबकि खालिस दिमागी यानी विशुद्ध वैचारिक लेखन में संवेदनाओं के साथ ही सैद्धांतिक कठोरता रहती है। चूंकि ग़ज़ल का संबंध सीधे दिल से होता है इसलिए वैचारिकता होते हुए भी ग़ज़ल में कथ्य की प्रस्तुति स्वाभाविक प्रवाह और गेयता लिए होती है। भूमंडलीकरण, बाजारवाद, दलित विमर्श, लोक चेतना और स्त्री-विमर्श, हिंदी गजल में नुकीली एकाग्रता के साथ व्यक्त हो रहे हैं। गजल के इस परिदृश्य में कथ्य की सार्थकता, शेर की अभिव्यक्ति में लोच, लय और रवानी के साथ विसंगति का प्रतिवाद है।


23 जनवरी 1957 को सागर में जन्मे, उर्दू ग़ज़ल में अच्छी-खासी दखल रखने वाले शायर अशोक मिज़ाज ने जब हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में क़दम रखा तो ग़ज़ल के छांदासिक निभाव की कोई कठिनाई उनके सामने नहीं थी। आशोक मिज़ाज ने हिन्दी ग़ज़ल के यथार्थवाद को बड़ी खूबसूरती से साधा है। यूं तो अशोक मिज़ाज की सारी ग़ज़लें अनुभूतियों की व्यापकता के बहुरंगी आयामों से भरी-पूरी हैं और संवेदना को गहरे तक दस्तक देने वाली हैं किन्तु कुछ शेर तराशे हुए हीरे के समान अपने अद्भुत चमकदार आकर्षण से अंतःचेतना से एकाकार हो कर अपनी पारदर्शी अमिट छाप छोड़ने में सक्षम हैं। अशोक मिज़ाज की ग़ज़लों का सरोकार आज की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और यहां तक कि पारिवारिक दशाओं से भी है। मिज़ाज कहते हैं कि - 

मेरे  लफ़्जों के   परदे में  मेरा  संसार देखोगे

कभी  तनहाइयों में  जब  मेरे  अश्आर देखोगे

दिखाई कुछ नहीं देगा, समझ में कुछ न आएगा

गुज़रती  रेल की  जब पास से  रफ़्तार देखोगे 


अशोक मिज़ाज एक ग़ज़लकार ही नहीं अपितु ग़ज़ल के शिल्प और कथ्य के प्रति सजग और अध्ययनशील चिंतक भी हैं। शिल्पगत रूप में ग़ज़ल को ठीक उसी रूप में स्वीकार करने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं जिस रूप में ग़ज़ल अरबी, फ़ारसी कर बहरों की रचना-ध्वनि के निश्चित क्रम में अपनी पैदाईश के समय सामने आई थी। शिल्प के मामले में अशोक मिज़ाज जहां एक ओर चौकन्ने रह कर अरबी की प्रचीन बहरों में अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करते हैं, वहीं कथ्य और भाषा के मामले में अर्वाचीन प्रयोगवादिता को स्वीकार करते हुए समकालीन सोच की दस्तावेज़ी ग़ज़लें कहने में अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन करते हैं। उनकी ग़ज़लों में वैयक्तिक प्रबुद्धता साफ़ दिखाई देती है। जैसे यह शेर - 

बदल रहे हैं  यहां  सब रिवाज़  क्या होगा

मुझे ये फ़िक्र है, कल का समाज क्या होगा

दिलो-दिमाग़  के  बीमार  हैं  जहां  देखो

मैं  सोचता हूं  यहां  रामराज  क्या  होगा 


सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संदर्भों के बिम्ब भी इन ग़ज़लों में बखूबी उभर कर आए हैं। तेजी से बदलते परिवेश को ले कर अशोक मिज़ाज की चिन्ता इन शब्दों में मुखर होती है, यह उदाहरण देखें -

फैला हुआ है ज़हरे-सियासत  कहां-कहां

करते  फिरेंगे  आप हिफ़ाज़त  कहां-कहां

मज़हब धरम के नाम पे हमने ये क्या किया

शरमा रही है  आज  रफ़ाक़त  कहां-कहां


समसामयिक मूल्यों के पतन पर गहरी चोट करते इन मिसरों की व्यंजना प्रत्येक व्यक्ति को आत्म मंथन करने को विवश कर सकती है। आज हम जिस परिवेश और यथार्थ में सांसें ले रहे हैं,वह पूरी तरह से कष्टदायी है। एक प्रबुद्ध गजलकार के नाते अशोक मिज़ाज इस पीड़ा को अच्छी तरह समझते हैं और अपनी गजलों में व्यक्त करते हैं। इसीलिए उनके शेर वर्तमान राजनीति के गिरते स्तर पर तीखा कटाक्ष करते हैं। एक बानगी देखिए -

सियासत में  हमारा भी  कुछ ऐसा  हाल है जैसे

किसी  बदनाम औरत से  शराफ़त  हार जाती है

बड़े लोगों के कपड़ों तक कहां कीचड़ पहुंचता है

अगर दौलत हो, ओहदा हो, ज़िल्लत हार जाती है


भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद की भागमभाग में जीवन की सरसता कहीं खोती जा रही है। औद्योगिक नगरों के रूप में असंवेदनशीलता का विस्तृत मरुथल सामने दिखाई देता है। जो शहर अभी आत्मीयता का अर्थ जानते हैं, वे भी तेजी से अपरिचय का लबादा ओढ़ते जा रहे हैं। इस तथ्य को अत्यंत बारीकी से शायर ने कुछ इस तरह बयान किया है -

ये  नगर  भी  कारखानों का  नगर  हो जाएगा

इन दरख़्तों की जगह कुछ चिमनियां रह जाएंगी 


इस प्रकार की ग़ज़लों में मात्र गहन मानवीय सरोकार है। अशोक मिज़ाज के सरोकार समाज और राजनीति पर आ कर ही नहीं ठहर जाते हैं वरन् काव्य की समकालीन दशा के प्रति भी चिन्ता प्रकट करते हैं। उनकी चिन्ता ग़ज़ल जैसी कोमल विधा से खिलवाड़ करने वालों को ले कर भी है। ग़ज़ल जैसी विधा को गंभीरता से न लेने वालों के लिए वे कहते हैं-

कल क्या थी और आज ये क्या हो गई ग़ज़ल

ग़ज़लों की भीड़-भाड़ में  ही  खो गई ग़ज़ल


समकालीनता के निर्वहन के साथ पुरातन और पारम्परिक मूल्यों का परिपोषण का जो स्वरूप अशोक मिजाज की ग़ज़लों में दिखाई देता है वह उनके इन शेरों से बखूबी बयां   होता है जो कि उनके ग़ज़ल संग्रह ‘किसी किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है’ में संग्रहीत हैं-

सारी  तारीफ़   उस   हुनर  की है

‘मीर’ ‘ग़ालिब’ ‘जिगर’ ‘ज़फ़र’ की है

अपनी हस्ती  तो बस  सिफ़र की है

सारी   खूबी   तेरी   नज़र  की है


मन की उड़ान कितनी भी विस्तृत हो लेकिन जीवन की सच्चाइयां उस धरातल पर इंसान को खींच लाती हैं जहां कभी सम्पूर्णता का अहसास नहीं हो पाता है। श्रृंगारिक कल्पनाओं और जीवन के रोजमर्रा के सच के बीच बेहतरीन संतुलन बिठाते हुए अशोक मिजाज कहते हैं - 

बाग़ में  नागफनी  का  भी  शज़र लगता है

खूबसूरत  हो  अगर   ऐब  हुनर  लगता है

कितनी चीज़ों की कमी अब भी नज़र आती है

           जब भी देखूं तो अधूरा-सा ये  घर लगता है


स्व. डॉ. शिव कुमार मिश्र की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है कि ‘‘उनके (अशोक मिज़ाज) अधिकतर शेर देर तक दिलो-दिमाग़ पर दस्तक देते हैं।’’ जब ग़ज़लों में जीवन का समग्र अपने सकल यथार्थ के साथ बड़ी सहजता से प्रस्तुत हो रहा हो तो उनका देर तक मन को आलोड़ित करना स्वाभाविक है। अशोक मिज़ाज की ग़ज़लों में दुख भी है, सुख भी, मोह है, पीड़ा भी है, कल्पना है तो यथार्थ भी है। यथार्थ भी ऐसा कि मानो ग़ज़ल पढ़ने या सुनने वाले की आंखों के आगे दृश्य उभर जाएं -  

रोकती  हैं  रास्ता  जब  लाल-पीली बत्तियां

याद आती  हैं  मुझे  वो  गांव की पगडंडियां

आपका इक फोन नंबर हो तो लिखवा दीजिए

वक़्त ले लेती हैं कितना आती जाती चिट्ठियां 

 

अहद प्रकाश ने अशोक मिज़ाज की ग़ज़लगोई पर टिप्पणी करते हुए बहुत सही लिखा है कि,‘‘हिन्दी भाषा में लिखी इनकी ग़ज़लें हर तरह से प्रशंसनीय और विचारणीय हैं। इनके हर एक शेर में एक नया आसमान खुलता नज़र आता है जिसमें हज़ारहा ज़मीनें समन्दरों के साथ नए दृश्य और नए बिम्ब प्रस्तुत करती नज़र आती हैं। वे इस सदी के स्वच्छ और खरे शाइर हैं।’’ 

अशोक मिज़ाज के संदर्भ में यह बेझिझक कहा जा सकता है कि ग़ज़लकार को समकालीन ग़ज़ल कहने का शऊर हासिल है, उनकी ग़ज़लों में ग़ज़ल का मिज़ाज मौज़ूद है तो अश्आर अपने फ़ॉर्म और तक़नीकी पहलुओं पर खरे उतरते हैं। 

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(साप्ताहिक सागर झील दि. 01.05.2018)

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साहित्य वर्षा - 9
             
शायर अशोक मिजाज़ और उनकी हिन्दी ग़ज़लें
       - डॉ. वर्षा सिंह

ग़ज़ल लिखी नहीं, कही जाती है। जो दिल में होता है उसे कहते समय बनावट या मिलावट की कृत्रिम कारीगरी नहीं होती। जबकि खालिस दिमागी यानी विशुद्ध वैचारिक लेखन में संवेदनाओं के साथ ही सैद्धांतिक कठोरता रहती है। चूंकि ग़ज़ल का संबंध सीधे दिल से होता है इसलिए वैचारिकता होते हुए भी ग़ज़ल में कथ्य की प्रस्तुति स्वाभाविक प्रवाह और गेयता लिए होती है। भूमंडलीकरण, बाजारवाद, दलित विमर्श, लोक चेतना और स्त्री-विमर्श, हिंदी गजल में नुकीली एकाग्रता के साथ व्यक्त हो रहे हैं। गजल के इस परिदृश्य में कथ्य की सार्थकता, शेर की अभिव्यक्ति में लोच, लय और रवानी के साथ विसंगति का प्रतिवाद है।

23 जनवरी 1957 को सागर में जन्मे, उर्दू ग़ज़ल में अच्छी-खासी दखल रखने वाले शायर अशोक मिज़ाज ने जब हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में क़दम रखा तो ग़ज़ल के छांदासिक निभाव की कोई कठिनाई उनके सामने नहीं थी। आशोक मिज़ाज ने हिन्दी ग़ज़ल के यथार्थवाद को बड़ी खूबसूरती से साधा है। यूं तो अशोक मिज़ाज की सारी ग़ज़लें अनुभूतियों की व्यापकता के बहुरंगी आयामों से भरी-पूरी हैं और संवेदना को गहरे तक दस्तक देने वाली हैं किन्तु कुछ शेर तराशे हुए हीरे के समान अपने अद्भुत चमकदार आकर्षण से अंतःचेतना से एकाकार हो कर अपनी पारदर्शी अमिट छाप छोड़ने में सक्षम हैं। अशोक मिज़ाज की ग़ज़लों का सरोकार आज की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और यहां तक कि पारिवारिक दशाओं से भी है। मिज़ाज कहते हैं कि -
मेरे  लफ़्जों के   परदे में  मेरा  संसार देखोगे
कभी  तनहाइयों में  जब  मेरे  अश्आर देखोगे
दिखाई कुछ नहीं देगा, समझ में कुछ न आएगा
गुज़रती  रेल की  जब पास से  रफ़्तार देखोगे

अशोक मिज़ाज एक ग़ज़लकार ही नहीं अपितु ग़ज़ल के शिल्प और कथ्य के प्रति सजग और अध्ययनशील चिंतक भी हैं। शिल्पगत रूप में ग़ज़ल को ठीक उसी रूप में स्वीकार करने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं जिस रूप में ग़ज़ल अरबी, फ़ारसी कर बहरों की रचना-ध्वनि के निश्चित क्रम में अपनी पैदाईश के समय सामने आई थी। शिल्प के मामले में अशोक मिज़ाज जहां एक ओर चौकन्ने रह कर अरबी की प्रचीन बहरों में अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करते हैं, वहीं कथ्य और भाषा के मामले में अर्वाचीन प्रयोगवादिता को स्वीकार करते हुए समकालीन सोच की दस्तावेज़ी ग़ज़लें कहने में अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन करते हैं। उनकी ग़ज़लों में वैयक्तिक प्रबुद्धता साफ़ दिखाई देती है। जैसे यह शेर -
बदल रहे हैं  यहां  सब रिवाज़  क्या होगा
मुझे ये फ़िक्र है, कल का समाज क्या होगा
दिलो-दिमाग़  के  बीमार  हैं  जहां  देखो
मैं  सोचता हूं  यहां  रामराज  क्या  होगा

सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संदर्भों के बिम्ब भी इन ग़ज़लों में बखूबी उभर कर आए हैं। तेजी से बदलते परिवेश को ले कर अशोक मिज़ाज की चिन्ता इन शब्दों में मुखर होती है, यह उदाहरण देखें -
फैला हुआ है ज़हरे-सियासत  कहां-कहां
करते  फिरेंगे  आप हिफ़ाज़त  कहां-कहां
मज़हब धरम के नाम पे हमने ये क्या किया
शरमा रही है  आज  रफ़ाक़त  कहां-कहां

समसामयिक मूल्यों के पतन पर गहरी चोट करते इन मिसरों की व्यंजना प्रत्येक व्यक्ति को आत्म मंथन करने को विवश कर सकती है। आज हम जिस परिवेश और यथार्थ में सांसें ले रहे हैं,वह पूरी तरह से कष्टदायी है। एक प्रबुद्ध गजलकार के नाते अशोक मिज़ाज इस पीड़ा को अच्छी तरह समझते हैं और अपनी गजलों में व्यक्त करते हैं। इसीलिए उनके शेर वर्तमान राजनीति के गिरते स्तर पर तीखा कटाक्ष करते हैं। एक बानगी देखिए -
सियासत में  हमारा भी  कुछ ऐसा  हाल है जैसे
किसी  बदनाम औरत से  शराफ़त  हार जाती है
बड़े लोगों के कपड़ों तक कहां कीचड़ पहुंचता है
अगर दौलत हो, ओहदा हो, ज़िल्लत हार जाती है

भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद की भागमभाग में जीवन की सरसता कहीं खोती जा रही है। औद्योगिक नगरों के रूप में असंवेदनशीलता का विस्तृत मरुथल सामने दिखाई देता है। जो शहर अभी आत्मीयता का अर्थ जानते हैं, वे भी तेजी से अपरिचय का लबादा ओढ़ते जा रहे हैं। इस तथ्य को अत्यंत बारीकी से शायर ने कुछ इस तरह बयान किया है -
ये  नगर  भी  कारखानों का  नगर  हो जाएगा
इन दरख़्तों की जगह कुछ चिमनियां रह जाएंगी

इस प्रकार की ग़ज़लों में मात्र गहन मानवीय सरोकार है। अशोक मिज़ाज के सरोकार समाज और राजनीति पर आ कर ही नहीं ठहर जाते हैं वरन् काव्य की समकालीन दशा के प्रति भी चिन्ता प्रकट करते हैं। उनकी चिन्ता ग़ज़ल जैसी कोमल विधा से खिलवाड़ करने वालों को ले कर भी है। ग़ज़ल जैसी विधा को गंभीरता से न लेने वालों के लिए वे कहते हैं-
कल क्या थी और आज ये क्या हो गई ग़ज़ल
ग़ज़लों की भीड़-भाड़ में  ही  खो गई ग़ज़ल

समकालीनता के निर्वहन के साथ पुरातन और पारम्परिक मूल्यों का परिपोषण का जो स्वरूप अशोक मिजाज की ग़ज़लों में दिखाई देता है वह उनके इन शेरों से बखूबी बयां   होता है जो कि उनके ग़ज़ल संग्रह ‘किसी किसी पे ग़ज़ल मेहरबान होती है’ में संग्रहीत हैं-
सारी  तारीफ़   उस   हुनर  की है
‘मीर’ ‘ग़ालिब’ ‘जिगर’ ‘ज़फ़र’ की है
अपनी हस्ती  तो बस  सिफ़र की है
सारी   खूबी   तेरी   नज़र  की है

मन की उड़ान कितनी भी विस्तृत हो लेकिन जीवन की सच्चाइयां उस धरातल पर इंसान को खींच लाती हैं जहां कभी सम्पूर्णता का अहसास नहीं हो पाता है। श्रृंगारिक कल्पनाओं और जीवन के रोजमर्रा के सच के बीच बेहतरीन संतुलन बिठाते हुए अशोक मिजाज कहते हैं -
बाग़ में  नागफनी  का  भी  शज़र लगता है
खूबसूरत  हो  अगर   ऐब  हुनर  लगता है
कितनी चीज़ों की कमी अब भी नज़र आती है
           जब भी देखूं तो अधूरा-सा ये  घर लगता है

स्व. डॉ. शिव कुमार मिश्र की यह टिप्पणी उल्लेखनीय है कि ‘‘उनके (अशोक मिज़ाज) अधिकतर शेर देर तक दिलो-दिमाग़ पर दस्तक देते हैं।’’ जब ग़ज़लों में जीवन का समग्र अपने सकल यथार्थ के साथ बड़ी सहजता से प्रस्तुत हो रहा हो तो उनका देर तक मन को आलोड़ित करना स्वाभाविक है। अशोक मिज़ाज की ग़ज़लों में दुख भी है, सुख भी, मोह है, पीड़ा भी है, कल्पना है तो यथार्थ भी है। यथार्थ भी ऐसा कि मानो ग़ज़ल पढ़ने या सुनने वाले की आंखों के आगे दृश्य उभर जाएं - 
रोकती  हैं  रास्ता  जब  लाल-पीली बत्तियां
याद आती  हैं  मुझे  वो  गांव की पगडंडियां
आपका इक फोन नंबर हो तो लिखवा दीजिए
वक़्त ले लेती हैं कितना आती जाती चिट्ठियां

अहद प्रकाश ने अशोक मिज़ाज की ग़ज़लगोई पर टिप्पणी करते हुए बहुत सही लिखा है कि,‘‘हिन्दी भाषा में लिखी इनकी ग़ज़लें हर तरह से प्रशंसनीय और विचारणीय हैं। इनके हर एक शेर में एक नया आसमान खुलता नज़र आता है जिसमें हज़ारहा ज़मीनें समन्दरों के साथ नए दृश्य और नए बिम्ब प्रस्तुत करती नज़र आती हैं। वे इस सदी के स्वच्छ और खरे शाइर हैं।’’
अशोक मिज़ाज के संदर्भ में यह बेझिझक कहा जा सकता है कि ग़ज़लकार को समकालीन ग़ज़ल कहने का शऊर हासिल है, उनकी ग़ज़लों में ग़ज़ल का मिज़ाज मौज़ूद है तो अश्आर अपने फ़ॉर्म और तक़नीकी पहलुओं पर खरे उतरते हैं।
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शनिवार, अप्रैल 14, 2018

साहित्य वर्षा-6 डॉ. महेश तिवारी का काव्य-समीक्षा चिंतन - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी छठवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक डॉ महेश तिवारी का काव्य- समीक्षा चिंतन।....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा : 6

डॉ. महेश तिवारी का काव्य-समीक्षा चिंतन
- डॉ. वर्षा सिंह

साठोत्तरी हिन्दी कविता के संदर्भ में कवि धूमिल ने गहराई से चिन्तन-मनन किया कि आखिर कविता क्या है ? कवि कर्म की जिम्मेदारियां और सरोकार अगर कुछ है तो किसके प्रति है? कविता के तत्वों में से किस तत्व के साथ रहना चाहिए? क्योंकि कुछ पाश्चात्य विचारों के समर्थक विद्वानों का मानना था कि भावना का प्रबल आवेग क्षणिक आनन्द की अनुभूति तो करा सकती है और कविता कुछ समय के लिए हमारे तनाव दूर तो कर सकती है ,किन्तु जीवन को सही तरीके से परिभाषित नहीं कर सकती। लेकिन कवि धूमिल ने पाया कि कविता का जीवन से गहरा नाता है और इसीलिए जीवन के कठिन संघर्षों का की व्याख्या भी कविता में की जा सकती है। जीवन के प्रत्येक उतार-चढ़ाव पर कविता लिखी जा सकती है। इसी तरह के विचार डॉ महेश तिवारी के भी हैं। वे कविता को अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम तो मानते ही हैं, साथ ही वे कविता को भावनाओं के प्रस्फुटन के उत्तम धरातल के रूप में भी स्वीकार करते हैं।
वस्तुतः काव्य साहित्य की वह विधा है जो हृदय में रसों का संचार करती है, वह रस शांत, श्रृंगार से ले कर वीभत्स तक हो सकते हैं। काव्य की समीक्षा करना अत्यंत चुनौती भरा काम माना गया है क्योंकि काव्य का संबंध मस्तिष्क की अपेक्षा हृदय से माना गया है। मस्तिष्क तर्कों के आधार पर काम करता है जबकि हृदय तर्कों को के आधार पर काम नहीं करता। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत है कि ‘‘काव्य का आकलन गद्य की तरह नहीं किया जा सकता है। काव्य का आकलन करने के लिए समीक्षक में रसबोध होना आवश्यक है।’’ हिन्दी काव्य की समीक्षाकला की विस्तृत मीमांसा की है समीक्षक डॉ. महेश तिवारी ने। इस विषय पर उनका एक ग्रंथ भी है-‘‘हिन्दी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’’। जिसमें उन्होंने हिन्दी साहित्य के इतिहासबद्ध कालखण्डों में विभक्त काव्य समीक्षा की प्रवृत्तियों को एक पुस्तक के रूप में संजोया है। सन् 1050 में सागर जिले के देवल चौरी ग्राम में जन्में डॉ. महेश तिवारी के दो काव्य संकलन भी प्रकाशित हो चुके हैं। वे अध्यापन, राजनीति, पत्रकारिता और लोकजीवन के अपने अनुभवों को अपने उद्बोधनों में साझा किया करते हैं। काव्य की प्रवृत्तियों के प्रति डॉ. तिवारी की एक गहरी समीक्षात्मक दृष्टि है। उन्होंने भारतेन्दुयुग से छायावादोत्तर युग तक की काव्य प्रवृत्तियों, कविता की आलोचना के विकास, उसके मूल्य परिवर्तन तथा मूल्यचिंतन को बड़ी सूक्ष्मता से जांचा-परखा है।
डॉ. तिवारी का कहना है कि ‘‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के साहित्य को राष्ट्र की नई आकांक्षाओं के साथ जोड़ने का भी प्रयास किया गया है।’’ वे मानते हैं कि ‘‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समीक्षादर्श का मूलतत्व रस और लोकमंगलवाद है।’’ डॉ. महेश तिवारी के पास काव्य की समीक्षा का एक अपना मौलिक पैमाना है। वे कविता को सौंदर्यबोध ओर मनोविज्ञान दोनों से जोड़ कर देखते हैं। वे मानते हैं कि कविता को सपाटपन से बचना चाहिए। कविता का मूल जब रस है तो कविता में एक लयबद्धता भी रहे, भले ही कविता छंदबद्ध हो या अतुकांत हो। काव्य को किस प्रकार की समीक्षा की आवश्यकता है, इस तथ्य की गहराई में उतरते हुए डॉ महेश तिवारी ने भारतेंदु और द्विवेदी युगीन काव्य समीक्षा के गुण-दोष का अकलन करते हुए लिखा है कि -‘‘शास्त्र की रूढ़ियों को महत्व न देते हुए भी महत्वपूर्ण शास्त्रीय स्थापनाओं को आदरणीय द्विवेदी ने खुलेमन से स्वीकार किया है। काव्य के गुण-दोष विवेचन में वे शास्त्रीय मान्यताओं के अधिकाधिक निकट रहे।’’ वहीं, जब डॉ तिवारी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समीक्षादर्श की चर्चा करते हैं तो स्पष्ट करते हैं कि ‘‘कविता के विषय में आचार्य शुक्ल की मूलवर्ती धारणा यही है ि कवह मनुष्य की, मनुष्यता की सबसे बड़ी संरक्षिका है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ जैसे-जैसे मनुष्यता के खो जाने का संकट बढ़ता जा रहा है, कविता की अवश्यकता भी बढ़ती जा रही है। आचार्य शुक्ल ने कविता के भविष्य के प्रति निष्कंप शब्दों में अपनी आस्था व्यक्त की है, जब तक मनुष्ता है कविता भी रहेगी।’’
हिन्दी के स्वच्छंदतावादी कवियों के चिंतन के संबंध में डॉ. महेश तिवारी कहते हैं कि ‘‘यह सही है कि छायावादी कवियों के ये विचार समीक्षा की दृष्टिकोण से बहुत गहरे और तात्विक नहीं है किन्तु इतना अवश्य है कि स्वानुभूति से सम्बद्ध होने के कारण वे एक ऐसी प्रामाणिकता से युक्त हो उठे हैं, जिसे ध्यान में रखना ही होगा।’’ प्रयोगवादी कविताओं के संबंध में डॉ. तिवारी धर्मवीर भारती के इस कथन को उद्धृत करते हैं कि ‘‘प्रयोग और प्रगति में विरोध नहीं है। क्योंकि प्रयोग स्वयं प्रगति के प्रति आस्थावान होता है। प्रयोग उसी स्थिति में प्रगति का विरोधी है जहां प्रगति प्रयोग की सहज गति न बन कर, स्वचालित और आत्मानुभूति पर आधारित न हो कर बाह्यारोपित होती है। प्रगतिवाद की प्रगति ऐसी बाह्यारोपित प्रगति है।सच्ची प्रगति मनुष्य की विकासशील प्रवृत्ति में निहित होती है।’’

‘‘कविता की परख के जो प्रतिमान छायावाद तक विकसित हुए, छायावातोत्तर काव्य समीक्षकों ने अपने समय की कविता के संदर्भ में मूल्यांकन के नए आयाम और नई दिशाएं उद्घाअत कीं। आलोचना में कविता के सर्वांगपूर्ण विश्लेषण की प्रवृत्ति विकसित हुई।’’ यह मानना है समीक्षक डॉ. महेश तिवारी का। डॉ. तिवारी ने पी. एचडी. उपाधि के लिए लिखा गया अपना शोधप्रबंध उपाधि मिलने के बहुत समय बाद प्रकाशित कराया। इस संबंध में वे बताते हैं कि पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों में उलझे रहने के कारण उनका ध्यान इस ओर कभी नहीं गया कि उन्हें अपना शोधग्रंथ प्रकाशित कराना चाहिए। किन्तु उनके गुरू डॉ शिवकुमार मिश्र ने उनसे इच्छा व्यक्त की कि वे डॉ. तिवारी का शोधग्रंथ पुस्तकाकार प्रकाशित रूप में देखना चाहते हैं। अपने गुरू की इच्छा को पूर्ण करने के लिए डॉ तिवारी ने अपने शोधग्रंथ को प्रकाशित कराने का निश्चय किया। इस संबंध में डॉ महेश तिवारी ने अपने शोधप्रबंध के आमुख में लिखा है कि -‘‘जनवरी, 2013 में मैं उनसे (डॉ. शिवकुमार मिश्र से) मिलने के लिए वल्लभ विद्यानगर, आनंद, गुजरात गया तो उस समय भी यह बात चली। इस बार उनकी बात मान कर मैंने सागर पहुंचते ही शोध प्रबंध उनके पास भेज दिया। फिर उन्होंने शोध प्रबंध को पुस्तक का रूप् देने की जिम्मेदारी अपने परम सहयोगी डॉ योगेन्द्र नाथ मिश्र को सौंप दी। परन्तु 21 जून 2013 को विधाता ने उन्हें सदा के लिए हमसे छीन लिया। इस आघात से उबरने के बाद योगेन्द्रनाथ जी ने यह काम शुरू किया। उन्होंने यथावश्यक थोड़ा काट-छांट करके मेरे शोध प्रबंध को पुसतक का रूप दिया।’’ अपने प्रिय गुरू को खोने के बाद डॉ. तिवारी का शोधग्रंथ प्रकाशित हुआ जिस संबंध में उन्हें सदा यह पीड़ा सालती रहती है कि वे पुस्तक के रूप में प्रकाशित अपने शोधग्रंथ को अपने गुरू के चरणों में नहीं रख पाए।

उल्लेखनीय है कि डॉ. महेश तिवारी उस परिवार से संबंध रखते हैं जो देवल चौरी गांव में विगत लगभग 114 वर्षों से रामलीला का आयोजन कर रहा है। यह रामलीला हर साल वसंत पंचमी से शुरू होकर करीब एक सप्ताह तक चलती है। डॉ महेश तिवारी के पूर्वज स्व. छोटे लाल तिवारी ने गांव में रामलीला की शुरुआत की थी। इन्हें पास के पड़रई गांव से इसकी प्ररेणा मिली थी। वे खुद व्यास गादी पर बैठ हारमोनियम बजाते व कार्यक्रम का संपूर्ण संचालन करते थे। रामलीला में शुरू से ही स्थानीय कलाकार काम करते आ रहे है। कार्यक्रम शुरू होने के एक महीने पहले से सभी कलाकार रामलीला के किरदारों का अभिनय करते हैं। दादाजी का स्वर्गवास होने के बाद स्व. ओंकार प्रसाद तिवारी, इसके बाद भगवत शरण और रमेश कुमार और इनके बाद हम सभी परिवार के लोग रामलीला का संचालन कर रहे हैं। इस आयोजन का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि वर्तमान में जनक और परशुराम का अभिनय करने सहित अन्य रामलीला के प्रमुख कार्यों का संचालन करने वाले भारत भूषण तिवारी ने सन् 1990 में सिविल से बीई की थी। इसके बाद कॉलेज में अध्यापन कार्य भी किया। लेकिन उन्हें रामलीला के लिए कॉलेज से पर्याप्त छुट्टी नहीं मिल पाती थी। इसलिए भगवान श्रीराम का नाम लेकर नौकरी ही छोड़ दी और पूरी तरह से रामलीला के आयोजन के प्रति समर्पित हो गए। डॉ. महेश तिवारी अपने गांव की इस परम्परा पर गर्व करते है और मानते हैं कि यदि परम्पराओं का लोकमंगल के लिए पालन किया जाए तो उनकी सार्थकता बनी रहती है।
लोकमांगलिक पारिवारिक परम्पराओं के धनी डॉ. महेश तिवारी सागर नगर के उन समीक्षकों में से एक हैं जो काव्य की समीक्षा को यथार्थ और कल्पना दोनों आधार पर एक साथ आकलन करने को उत्तम विधि मानते हुए युवा समीक्षकों का पथप्रदर्शन करने की क्षमता रखते हैं।
आज जब यह अकसर चिन्ता प्रकट की जाती है कि काव्य की शैलियों में जिस तेजी से परिवर्तन हुए एवं आधुनिकता को कविता ने जिस तत्परता से अंगीकार किया उस गंभीरता से काव्य-समीक्षक सामने नहीं आए। खेमेबाजी ने भी समीक्षा की विधा को बहुत क्षति पहुंचाई और इसीलिए आज समीक्षकों का संकट और अधिक गहरा गया है। ऐसे समय में डॉ महेश तिवारी अपनी मौलिक समीक्षा दृष्टि के साथ सामने आकर एक आश्वस्ति की दिशा दिखाते प्रतीत होते हैं।            
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 10.04.2018)
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