घर
-डॉ. वर्षा सिंह
छत न खिड़की से, नहीं दीवार से
घर हमेशा घर बना है प्यार से
घर जहां पर नेह के दीपक जलें
घर वही सुख के जहां मोती मिलें
घर हमेशा है बड़ा संसार से
घर हमेशा घर बना है प्यार से
है थकन मिटती जहां मन-देह की
बारिशें होती जहां स्नेह की
घर नहीं कम है किसी उपहार से
घर हमेशा घर बना है प्यार से
घर की पुख़्ता नींव रिश्तों से बने
मिल के रहने से ये होते हैं घने
हैं सफल जो भी जुड़े घर-बार से
घर हमेशा घर बना है प्यार से
बात कोई भी न हो विद्वेष की
हो अगर तो प्रेम के संदेश की
टूटते घर आपसी तकरार से
घर हमेशा घर बना है प्यार से
जूझते हों जब अकेलेपन से हम
घेरते हैं जब कई अनजान ग़म
जोड़ता घर ही हमें परिवार से
घर हमेशा घर बना है प्यार से
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