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बुधवार, जनवरी 30, 2019

ग़ज़ल ... परिन्दे घर से निकले हैं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh


परों में बांध कर हिम्मत, परिन्दे घर से निकले हैं।
करेंगे  पार  हर  पर्वत, परिन्दे घर से निकले हैं ।

नहीं है ख़ौफ़ मौसम का, न कोई डर हवाओं का
उड़ानों की लिए चाहत, परिन्दे घर से निकले हैं।

चहकना है इन्हें हर हाल, हों हालात कैसे भी
भले ही मन रहे आहत, परिन्दे घर से निकले हैं।

न कोई वास्ता नफ़रत, सियासत, शानोशौकत से
मुहब्बत की लिए दौलत, परिन्दे घर से निकले हैं।

सुबह से सांझ तक "वर्षा", रहेगी खोज तिनके की
मिले चाहे नहीं राहत ,परिन्दे घर से निकले हैं।



रविवार, जुलाई 29, 2018

धरती पर पानी लिख देना - डॉ. वर्षा सिंह

धरती पर पानी लिख देना
आंचल को धानी लिख देना

चाहत पर बंधन का पहरा
कुछ तो मनमानी लिख देना

बेशक लिखना अमर प्यार को
दुनिया को फानी लिख देना

इंतज़ार में चांद - रात के
दिन की कुर्बानी लिख देना

मौसम को यदि राजा लिखना
"वर्षा" को रानी लिख देना

        ❤ डॉ. वर्षा सिंह