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| Dr. Varsha Singh |
आज विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल) पर "नवदुनिया" सागर संस्करण में मेरे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह के विचारों को स्थान मिला है। 📖
हार्दिक आभार "नवदुनिया" 🙏💐
मित्रों, इस विशेष फीचर के कुल तीन सहभागियों में मेरे साथ मेरी बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह एवं डॉ. आशुतोष मिश्रा के विचार भी प्रकाशित हुए हैं।📚
कृपया पढ़ें और प्रतिक्रिया से अवगत करायें 🙏
आप सभी को विश्व पुस्तक दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं 🙏💐 📚📙📔📖
मेरे विचार ...
*किताबें मेरी सबसे अच्छी मित्र*
- डॉ. वर्षा सिंह, वरिष्ठ कवयित्री
लगती भले हों पहेली किताबें ।
बनती हैं हरदम सहेली किताबें।
चाहे ये दुनिया अगर रूठ जाये
नहीं रूठती इक अकेली किताबें।
मेरी ये काव्य पंक्तियां किताबों के प्रति मेरी सहज अभिव्यक्ति है। जी हां, किताबें बचपन से ही मेरी मित्र रही हैं। पहले पंचतंत्र और जातक कथाओं सरीखी किताबें, फिर क्रमशः अनेक कविता, कथा, उपन्यास, एकांकी, नाटक से भरपूर किताबें... ज़िन्दगी का शायद ही कोई दिन ऐसा रहा हो जब मैंने किसी किताब को हाथ नहीं लगाया हो। यानी हर दिन किताबों का साथ।
ढेरों ढेर किताबों में वह किताब जिसके लिए मैं यह कह सकती हूं कि यह हमेशा मेरे दिल के बहुत क़रीब रही और जिसने मेरी ज़िन्दगी को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई... वह है "अज्ञेय" का उपन्यास "अपने-अपने अजनबी"। यह वैयक्तिक यथार्थबोध पर आधारित उपन्यास है। आधुनिक युग में सबसे बड़ी विड़म्बना यह है कि हम साथ होते हुए भी आतंरिक रूप से बहुत अकेले होते हैं। करीब रहकर भी एक-दूसरे को समझ नहीं पाते हैं, एक-दूसरे के लिए अजनबी बने रहते हैं। 80 के दशक में इसे पढ़ने-समझने के बाद मेरा समूचा व्यक्तित्व अंतर्मुखी से बाह्यमुखी हो गया।
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| Happy World Book Day |
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