लॉकडाउन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लॉकडाउन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, जून 05, 2020

विश्व पर्यावरण दिवस पर दस दोहे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
मेरे प्रिय ब्लॉग मित्रों, विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🌿🌳🌏💖💛🍀🌴
कृपया पढ़िए वेब मैगज़ीन "युवाप्रवर्तक" में आज दि. 05.06.2020 को प्रकाशित मेरे दस दोहे पर्यावरण पर ...
http://yuvapravartak.com/?p=34353

विश्व पर्यावरण दिवस पर दस दोहे
 
     -  डॉ. वर्षा सिंह

मत भूलो अनलॉक में, लॉकडाउन के लाभ।
स्वच्छ हुआ पर्यावरण, धरा हुई हरिताभ ।।

हम यदि रहें सचेत तो, रहे प्रदूषण दूर।
हमें सुनाई दे सदा, नदियों का संतूर।।

हर्रा, नीम, करंज में, औषधि है भरपूर।
इनके लाभों से सभी, अवगत रहें जरूर।।

पेड़ कटेंगे रोज़ तो, कहां बनेंगे नीड़।
कलरव ना सुन पाएगी, तब ये मानव भीड़।।

मौसम में बदलाव का, मानव जिम्मेदार।
जंगल को छोटा किया, किया शहर विस्तार।।

धुंआ, धूल और गंदगी के समझें नुकसान।
अच्छी आदत डाल के, करें सुरक्षित जान।।

निरा स्वार्थ में डूब कर, जग को रहे बिसार।
जब जग ही मिट जाएगा, व्यर्थ सकल व्यापार।।

धरती तपती जा रही, पिघल रहे हिम शैल।
यह संकट हम रोक लें, और न जाए फैल।।

समय अभी भी शेष है, जो हम जाएं चेत।
वरना कृत्रिम खाद से, सूने होंगे खेत ।।

पर्यावरण सुधार का, प्रण कर लें हम आज।
"वर्षा", जाड़ा, गर्मियां, बदलेंगी अंदाज़।।

             ---------------------

विश्व पर्यावरण दिवस ... दस दोहे - डॉ. वर्षा सिंह


#लॉकडाउन #अनलॉक #कोरोना #विश्व_पर्यावरण_दिवस #युवाप्रवर्तक #दोहा #दोहावर्षा #5जून2020 #WorldEnvironmentDay

शनिवार, मई 16, 2020

लॉकडाउन और मेरा साहित्यिक सृजन - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों, आज दैनिक भास्कर में "लॉकडाउन और मेरा साहित्यिक सृजन" के रूप में मेरी रचनात्मकता के बारे में मुझसे की गई चर्चा प्रकाशित हुई है, जो मेरे उस लेखन पर केंद्रित है जिसे मैं विगत चार-पांच वर्षों से पूरा करना चाह रही थी लेकिन समयाभाव में कर नहीं पा रही थी अब लॉकडाउन की इस अवधि में मिले पर्याप्त समय में मैंने अपनी तीन किताबों का काम पूरा किया है ... मैं धन्यवाद देती हूं दैनिक भास्कर को, जिसने लॉकडाउन के दौरान की मेरी इस उपलब्धि को अपने पाठकों के साथ साझा करने का मुझे अवसर प्रदान किया।
हार्दिक धन्यवाद दैनिक भास्कर 🙏

*लॉकडाउन और मेरा साहित्य सृजन*
     
    - *डाॅ. वर्षा सिंह, वरिष्ठ कवयित्री*

        इंसान यूं तो बहुत कुछ करना चाहता है लेकिन जीवन की बहुतेरी व्यस्तताएं उन्हें करने का मौका ही नहीं देती हैं। विगत 4-5 वर्षों से मैं सागर के वर्तमान साहित्यकारों की रचनाधर्मिता पर जानकारी एकत्र कर रही हूं। जिसमें वरिष्ठ एवं कनिष्ठ दोनों तरह के रचनाकार मेरे इस व्यक्तिगत शोध का विषय रहे हैं। इस शोध के पीछे मेरे मन में यह विचार आया था कि कवि पद्माकर और ज़हूर बख़्श की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान साहित्य सृजन का परिदृश्य लेखबद्ध हो सके। यह सागर की साहित्य परम्परा एवं चिंतन पर शोध करने वाले नवीन शोधार्थियों के लिए एक ज़मीन का काम करेगी। मेरा यह कार्य पूरा होने की कगार पर आ कर समयाभाव के कारण अटका हुआ था। किन्तु कोरोना लॉकडाउन के दौरान मैं इसे अपनी नई शोधात्मक पुस्तक "सागर साहित्य एवं चिन्तन" के रूप में तैयार कर पाई हूं। पुस्तक प्रकाशन व्यवस्थाएं पुनः सुचारू रूप से चलते ही मैं इसे प्रकाशक को सौंप दूंगी। देखा जाए तो कोरोना लॉकडाउन के इस विपरीत समय में एक प्लस प्वाइंट की तरह युवा शोधार्थियों के लिए एक सार्थक पुस्तक तैयार कर सकी हूं जो उन्हें साहित्य के जरिए सागर की वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं को समझने में सहायता करेगा और उनके मन में अपने शहर के प्रति प्रेम उत्पन्न करेगा।

          इसी तरह एक और काम जो मैं पिछले 6-7 साल से करना चाह रही थी लेकिन पर्याप्त समय नहीं मिल पाने के कारण ठीक से नहीं कर पा रही थी, वह भी मैंने लॉकडाउन के दौरान जम कर किया है। दरअसल, मैं हिन्दी ग़ज़लों के साथ ही हमेशा उसी पैमाने पर बुंदेली गीत और ग़ज़ल भी लिखना चाहती रही लेकिन पहले नौकरी की व्यस्तताएं, फिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद सामाजिक व्यस्तताओं ने मेरी इस चाहत में बाधाएं पहुंचाईं लेकिन कोरोना लाॅकडाउन के दौरान सारा समय घर पर ही रहने से मुझे बुंदेली में लिखने का इतना समय मिला कि पिछले दिनों मैंने बुंदेली गीत और ग़ज़ल के दो संग्रह तैयार कर डाले। इन गीत-ग़ज़लों में मैंने बुंदेली संस्कृति, बुंदेलखंड की समस्याओं और यहां के युवाओं के लिए सुझावों को काव्य के रूप में पिरोया है। जी हां, इन्हें भी मैं कोरोना से उपजी स्थितियां सामान्य होने पर प्रकाशक को सौंप दूंगी। इनमें से ग़ज़ल संग्रह का नाम है-‘‘भली कही जू’‘ और गीत संग्रह है-‘ मीठी लगत बुंदेली बानी‘ । बुंदेली साहित्य यूं भी धनी है, फिर भी मुझे लगता है कि बुंदेली में नवीन विधाओं में अधिक से अधिक लिखा जाता चाहिए। इसके साथ ही यदि लोगों को उनके हितों के बारे में उन्हीं की बोली-भाषा साहित्य मिले तो उन्हें अच्छा और मनोरंजक लगता है क्योंकि उसे वे भली-भांति समझ पाते हैं। वैसे मुझे पूरी उम्मींद है कि मेरे ये दोनों संग्रह नवोदित रचनाकारों में भी अपनी बुंदेली के प्रति प्रेम जगा सकेंगे।
 
- - - - - - - -

*मेरी बुंदेली ग़ज़ल*

      - डाॅ. वर्षा सिंह, वरिष्ठ कवयित्री

चुप ना रइयो मंझले कक्का
मन की कइयो मंझले कक्का

घर में सौचालय बनवा ल्यो
खुले ने जइयो मंझले कक्का

मोड़ी खों ने घरे बिठइयो
खूब पढ़इयो मंझले कक्का

मोड़ा पे सो नजर राखियो
फेर ने कइयो मंझले कक्का

ठोकर खा जो गिरत दिखाए
हाथ बढ़इयो मंझले कक्का

मुस्किल आए चाए कैसई
ने घबरईयो मंझले कक्का

ठाकुर बाबा पूजे  "वर्षा"
दीप जलइयो मंझले कक्का
    --------------



#DainikBhaskar
#Lockdown
#लॉकडाउन
#दैनिकभास्कर

दिनांक 16.05.2020

रविवार, मई 03, 2020

लॉकडाउन 3.0 संदर्भित बुंदेली गीत... कोरोना को नाग बिषैलो - डॉ. वर्षा सिंह


 
Dr. Varsha Singh

     लॉकडाउन 3.0 कल यानी 04 मई से दो सप्ताह के लिए शुरू हो रहा है... तो लॉकडाउन के इस तीसरे चरण के संदर्भ में प्रस्तुत है मेरा यह बुंदेली गीत...

कोरोना को नाग बिषैलो
        - डॉ. वर्षा सिंह

इकनी, दुकनी, तिरका तीन।
लॉकडाउन की बज रई बीन।

कोरोना को नाग बिषैलो,
ईको फन ऐसो है फैलो,
कोऊ निकट ने आ-जा पा रऔ
दूरई से सब बोलत 'हैलो',

तारा डार घरे सब बैठे,
घुम-घुमाई लई सब छीन।
लॉकडाउन की बज रई बीन...

सूनी गलियां, सूनी बस्ती
एकई जैसे सांझ-सकारे,
कुल्ल दिना होबे खों आए
घर के भीतर पलका पारे,

टीवी, पेपर, मोबाईल पे
कोरोना के मुदके सीन।
लॉकडाउन की बज रई बीन...

जैसोे बखत कटो है अब लौं
ऊंसई आंगे कट जैैहे जो,
धीरज धरने परहे भारी
कब लौं लॉकडाउन रैहे जो,

"वर्षा" सोस-फिकर नई करने,
रहियो राम - नाम में लीन।
लॉकडाउन की बज रई बीन...

       -----------
     इसे आज दिनांक 03.05.2020 के अंक में प्रकाशित करने हेतु युवाप्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=31267








बुधवार, अप्रैल 22, 2020

🌎 पृथ्वी दिवस यानी Earth Day पर 🌍 शुभकामनाएं 🌏

Dr. Varsha Singh

      आज Earth Day है  🌏
      ... और अपनी इस 'Earth' पर कोरोना वायरस के 'अनर्थ' के बादल छाए हुए हैं। तो आईए हम संकल्प लें कि लॉकडाउन के नियमों का पालन कर हम बचे रहेंगे और पर्यावरण संरक्षण नियमों का पालन कर बचाए रहेंगे अपनी धरती यानी Mother Earth को 😊
अर्थ डे यानी पृथ्वी दिवस एक वार्षिक इवेंट है जिसे दुनियाभर में आज यानी की 22 अप्रैल को पर्यावरण संरक्षण के लिए मनाया जाता है. इसे पहली बार साल 1970 में मनाया गया था. इस साल पृथ्वी दिवस के 50 साल पूरे हो रहे हैं जहां इसका थीम 'क्लाइमेट एक्शन' रखा गया है. पर्यावरण की सुरक्षा के लिए "पृथ्वी दिवस या अर्थ डे" मनाया जाता है. इस आंदोलन को यह नाम जुलियन कोनिग द्वारा सन् 1969 को दिया था. इसके साथ ही इसे सेलिब्रेट करने के लिए अप्रैल की 22 तारीख चुनी गई.
       इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को पृथ्वी और पर्यावरण के संरक्षण हेतु जागरूक करना है। आधुनिक काल में जिस तरह से मृदा अपरदन हो रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रहा है और प्रदूषण फ़ैल रहा है, इनसे पृथ्वी का ह्वास हो रहा है। ऐसी स्थति में पृथ्वी की गुणवत्ता, उर्वरकता और महत्ता को बनाए रखने के लिए हमें पर्यावरण और पृथ्वी को सुरक्षित रखने की जरूरत है। इन महत्वकांक्षी उद्देश्यों को पूरा करने हेतु हर साल 22 अप्रैल पृथ्वी दिवस मनाया जाता है।
 


Earth Day 22 April 2020


          इस वर्ष वर्तमान समय में कोरोना वायरस  के चलते पूरे देश में लॉकडाउन है। हम सभी जानते हैं कि लॉकडाउन का अर्थ है तालाबंदी । लॉकडाउन एक आपातकालीन व्यवस्था है जो किसी आपदा या महामारी के वक्त लागू की जाती है। जिस इलाके में लॉकडाउन किया गया है उस क्षेत्र के लोगों को घरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं होती है। उन्हें सिर्फ दवा और खाने-पीने जैसी जरूरी चीजों की खरीदारी के लिए ही बाहर आने की इजाजत मिलती है, इस दौरान वे बैंक से पैसे निकालने भी जा सकते हैं.जिस तरह किसी संस्थान या फैक्ट्री को बंद किया जाता है और वहां तालाबंदी हो जाती है उसी तरह लॉक डाउन का अर्थ है कि आप अनावश्यक कार्य के लिए सड़कों पर ना निकलें। अगर लॉकडाउन की वजह से किसी तरह की परेशानी हो तो आप संबंधित पुलिस थाने, जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक अथवा अन्य उच्च अधिकारी को फोन कर सकते हैं। लॉकडाउन जनता की सहूलियत और सुरक्षा के लिए किया जाता है.सभी प्राइवेट और कॉन्ट्रेक्ट वाले दफ्तर बंद रहते हैं, सरकारी दफ्तर जो जरूरी श्रेणी में नहीं आते, वो भी बंद रहते हैं।
       लॉकडाउन कोरोना की जंग से जीतने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए भी काफी अहम साबित हो रहा है। इन दिनों हवा एकदम साफ हो गई है, लॉकडाउन खुलने के बाद भी इस समय का अध्ययन भविष्य में प्रदूषण नियंत्रण की राह तैयार करेगा। करीब तीन सप्ताह से चल रहे लॉकडाउन से समूची पृथ्वी पर पर्यावरण में व्यापक स्तर पर बदलाव देखने को मिला है। पेट्रोल और डीजल चालित वाहन बंद होने से हवा की गुणवत्ता ही नहीं सुधरी बल्कि औद्योगिक इकाइयां बंद होने से नदियों के पानी भी काफी साफ दिखाई दे रहा है। हर स्तर के आयोजन बंद होने और जनता के भी घरों में ही रहने के कारण ध्वनि प्रदूषण के स्तर तक में खासी गिरावट दर्ज की गई है। इस बदलाव पर तमाम अध्ययन भी किए जा रहे हैं।
    पृथ्वी दिवस पर यह तथ्य विचारणीय है कि भविष्य में हमें पृथ्वी पर प्रदूषण रोकने की दिशा में सार्थक कार्य करने होंगे।

Earth Day

रविवार, अप्रैल 12, 2020

लॉकडाउन संदर्भित बुंदेली गीत ... समझो भैया, कछू तो समझो - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

           21 दिन वाले लॉकडाउन के 19 वें दिन आज यह कयास लगाया जा रहा है कि लॉकडाउन की अवधि आगे बढ़ाई जा सकती है... इसके कारण की पड़ताल करते हुए मेरी यह बुंदेली रचना पर भी कृपया गौर फरमाएं....

समझो भैया, कछू तो समझो
       - डॉ. वर्षा सिंह

ई परमेसुर घुमाघुमाई
लाकडाउन ईने बढ़वाई
खूबई सबने भीड़ लगाई
तनकउ बात समझ ने आई

हमने कई थी घरई में रहियो
कहूं बाहरे अबै ने जइयो
काज उपद्री कछु ने करियो
दूरी बना-बना के रखियो
तनक ने छोड़ी ढीठ-ढिठाई
तनकउ बात समझ ने आई

मास्क पहरबे में सरमाये
खुद बहके सबको बहकाये
अब देखो, जो भओ नतीजो
कोरोना के फेर में आये
अब काहे खों देत दुहाई
तनकउ बात समझ ने आई

मोदी जी की बात ने मानी
कर लई खूबई जे मनमानी
मम्मा जू शिवराज की बतियां
हंसी-ठिठोली में बिसरानी
मरघट खों अब भई बिदाई
तनकउ बात समझ ने आई

"वर्षा" ने भी समझा लओ है
हाथ जोड़ सबरो कै दओ है
समझो भैया, कछू तो समझो
जी खों टंटा, रोग नओ है
तुमे समझ में काए ने आई
तनकउ बात समझ ने आई

           ---------------------

मेरी यह ताज़ा बुंदेली रचना आज web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 12.04.2020 में  प्रकाशित हुई है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=28886



शनिवार, अप्रैल 11, 2020

लॉकडाउन संदर्भित बुंदेली गीत ... बाहर कहूं ने जइयो - डॉ. वर्षा सिंह

 
Dr. Varsha Singh

  टोटल लॉकडाउन के दौरान सागर नगर  में भी कल दिनांक 10.04.2020 को कोरोना वायरस संक्रमण का पहला पॉज़ीटिव केस मिलने संदर्भित समाचार पर बुंदेली बोली में मेरी गीतात्मक अभिव्यक्ति ...

बाहर कहूं ने जइयो
        - डॉ. वर्षा सिंह

घर के भीतर रहियो
बाहर कहूं ने जइयो
कोरोना बैरी हत्यारो
औरन को समझइयो

इते सागरे आओ करोना
कृष्णगंज थो अड्डा
शनीचरी भई क्वारैंटाइन
लगे बजरिया तिगड्डा
हिम्मत राखे रहियो
बाहर कहूं ने जइयो

डिस्टेंसिंग ने राखी देखो
जो परिणाम भओ है
सागर पूरो लॉकडाउन है
मुस्किल में पर गओ है
सम्हर तनक तो जइयो
बाहर कहूं ने जइयो

लॉकडाउन को मतलब समझो
नांय, मांय की छोड़ो
दूरई-दूर निभाओ रिस्ता
जी से नाता जोड़ो
भागमभाग ने करियो
बाहर कहूं ने जइयो

अपनो सागर न्यारो सागर
काज नियम से करियो
दूर राखने हमें करोना
गांठ बांध जा लइयो
"वर्षा"- बिनती सुनियो
बाहर कहूं ने जइयो

      ---------------------



जी हां, मेरी यह ताज़ा बुंदेली रचना आज web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 11.04.2020 में  प्रकाशित हुई है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=28791






बुधवार, अप्रैल 08, 2020

लॉकडाउन में घर में ही रहें - डॉ. विद्यावती "मालविका".... प्रस्तुति डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       "कोरोना लॉकडाउन और हम" के अंतर्गत web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 08 अप्रैल 2020 में मेरी माता जी डॉ. विद्यावती सिंह "मालविका" के विचार प्रकाशित किए गए हैं।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=28459

डॉ. विद्यावती "मालविका"


लॉकडाउन में घर में ही रहें
    - डॉ. विद्यावती "मालविका"
    वरिष्ठ साहित्यकार, सागर

    मेरे जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए। मुझे अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा लेकिन मैंने अपनी 90 वर्ष की आयु में पहली बार ऐसी तालाबंदी देखी है। ब्रिटिश काल में तो कई बार कर्फ्यू की स्थिति बन जाती थी और इसी प्रकार दंगे फसाद के समय भी कर्फ्यू लगाया जाता था लेकिन लॉकडाउन मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा है, जब मंदिर के पट भी बंद हैं और अस्पतालों में ओपीडी भी बंद कर दी गई है। पहले जब कर्फ्यू लगाया जाता था तो उस कर्फ्यू के नियमों को तोड़ने वालों पर पुलिस के डंडे चलते थे या उन्हें जेल भेज दिया जाता था, लेकिन आज पुलिसकर्मी अपनी जान जोखिम में डाल कर लॉकडाउन के नियमों का पालन करा रहे हैं। यदि हम नियमों का पालन नहीं करेंगे, सोशल डिस्टेंसिंग नहीं बनाएंगे  तो हम अपने स्वास्थ्य से ही नहीं बल्कि अपने परिवार के, अपने पड़ोसियों के, अपने देशवासियों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाएंगे। यह जीवन और मृत्यु का सवाल है अतः हमें इसे गंभीरता से लेना होगा। कोरोना वायरस को किसी भी हाल में और फैलने नहीं देना है।
     मेरी दोनों बेटियां - बड़ी बेटी डॉ. वर्षा सिंह और छोटी बेटी डॉ. शरद सिंह पहले की तरह मेरा बहुत ख़याल रखती हैं। मुझे चिंतामुक्त रखने के लिए कोरोना से संबंधित अपडेट्स बताती रहती हैं। वे दोनों लॉकडाउन का कड़ाई से पालन कर रही हैं। इसे देख कर मेरी चिंता यूं भी कम हो जाती है । इन दिनों मैं दूरदर्शन पर रामायण और महाभारत देख रही हूं। इन्हें फिर से देखना सुखद लग रहा है। हमारी कॉलोनी में शांति रहती है। इसका तो नाम ही है शांति विहार कॉलोनी।
     देश में लॉकडाउन पहली बार किया गया है तो  ऐसा संकट भी तो पहली बार आया है। कोरोना वायरस का असर इतना भीषण है कि पूरा देश, पूरी मानव जाति संकट में आ गई है। इस संकट से उबरने के लिए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू का आह्वान किया था लेकिन दुख है कि लोगों ने उसका ढंग से पालन नहीं किया। जबकि मोदी जी ने हम सभी भारतीय जनता की भलाई के लिए ही जनता कर्फ्यू लगवाया था और अब यह लॉकडाउन लगाया है। कोरोना वायरस संक्रमण को देखते हुए अत्यधिक सतर्कता बरतने की जरूरत है। कोरोना वायरस से सम्बन्धित लक्षण यदि किसी भी व्यक्ति में पाए जाते है तो उसे तुरंत नजदीकी हस्पताल में ले जाएं।
     प्रशासन बहुत ठीक कर रही है। प्रशासन की तरह मेरा भी सबसे अनुरोध है कि प्रतिदिन घर में रह कर पूजा-पाठ करें। घर से बाहर बिलकुल नहीं निकलें। ईश्वर तो कण-कण में विराजमान हैं। उनकी पूजा के लिए मंदिर जाना ज़रूरी नहीं है।  ईश्वर भक्ति से प्रसन्न होता है, जोकि घर में रह कर भी उतनी ही श्रद्धा से की जा सकती है। घर में रहें और प्रार्थना करें कि दुनिया में सभी मनुष्य स्वस्थ-प्रसन्न रहें। यह मानें कि ईश्वर हमारी परीक्षा ले रहा है और हमें इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना ही है।
       --------------------




#युवाप्रवर्तक
#लॉकडाउन #कोरोना

मंगलवार, अप्रैल 07, 2020

🚩श्री हनुमान जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं 🚩- डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

हिन्‍दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र शुक्‍ल पूर्णिमा को श्री हनुमान जयंती मनाई जाती है। तो कोरोना वायरस संक्रमण के कारण लगाए गए लॉकडाउन की इस आपदा की घड़ियों में हम सब संकटमोचन श्री हनुमान जी का नाम लेकर पाठ करें...

🚩हनुमानाष्टक🚩

बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुं लोक भयो अंधियारो ।
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो ॥
देवन आन करि बिनती तब, छांड़ि दियो रबि कष्ट निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो ॥ 1 ॥ 🚩

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि,जात महाप्रभु पंथ निहारो ।
चौंकि महा मुनि शाप दिया तब,चाहिय कौन बिचार बिचारो ॥
के द्विज रूप लिवाय महाप्रभु,सो तुम दास के शोक निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥2॥ 🚩

अंगद के संग लेन गये सिय,खोज कपीस यह बैन उचारो ।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु,बिना सुधि लाय इहाँ पगु धारो ॥
हेरि थके तट सिंधु सबै तब,लाय सिया-सुधि प्राण उबारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥3॥ 🚩

रावन त्रास दई सिय को सब,राक्षसि सों कहि शोक निवारो ।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु,जाय महा रजनीचर मारो ॥
चाहत सीय अशोक सों आगि सु,दै प्रभु मुद्रिका शोक निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥4॥ 🚩

बाण लग्यो उर लछिमन के तब,प्राण तजे सुत रावण मारो ।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत,तबै गिरि द्रोण सु बीर उपारो ॥
आनि सजीवन हाथ दई तब,लछिमन के तुम प्राण उबारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥5॥ 🚩

रावण युद्ध अजान कियो तब,नाग कि फांस सबै सिर डारो ।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल,मोह भयोयह संकट भारो ॥
आनि खगेस तबै हनुमान जु,बंधन काटि सुत्रास निवारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥6॥ 🚩

बंधु समेत जबै अहिरावन,लै रघुनाथ पाताल सिधारो ।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि,देउ सबै मिति मंत्र बिचारो ॥
जाय सहाय भयो तब ही,अहिरावण सैन्य समेत सँहारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥7॥ 🚩

काज किये बड़ देवन के तुम,वीर महाप्रभु देखि बिचारो ।
कौन सो संकट मोर गरीब को,जो तुमसों नहिं जात है टारो ॥
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु,जो कछु संकट होय हमारो ।
को नहिं जानत है जग में कपि,संकटमोचन नाम तिहारो ॥8॥ 🚩

दोहा : 🚩 ॥लाल देह लाली लसे,अरू धरि लाल लंगूर । 🚩
बज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर ॥ 🚩

🚩॥ इति संकटमोचन हनुमानाष्टक सम्पूर्ण ॥🚩

🚩 जय हनुमान 🚩


रविवार, अप्रैल 05, 2020

5 अप्रैल 2020 को रात्रि 9 बजे 9 मिनट दीप जलाने संदर्भित अवसर पर विशेष बुंदेली गीत .... दीपक एक जलइयो -डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

           सबई भारतवासियन खों अपने प्रधानमंत्री मोदी जी के संदेस खों पालन करबे के लाने आज 5 तारिख खों रात 9 बजे 9 मिनट तक घर की सबई बत्ती बुझा के दीपक जलाने है सो बुंदेली बोली में हमाई बी जा बिनती सुन ल्यो...

बुंदेली गीत

   दीपक एक जलइयो
        -डॉ. वर्षा सिंह

दीपक एक जलइयो, ओ भैय्या !
दीपक एक जलइयो ।।

अंधियारो डर-भय को फैलो
कर रऔ मन को हुन्ना मैलो
तनकऊ ने घबरइयो, ओ बिन्ना !
दीपक एक जलइयो ।।

आज इतवारे नौ जब बजहें
सबई मिल के जोत जलैहें
एकजुटता दिखलइयो, ओ गुंइयां !
दीपक एक जलइयो ।।

पास न कोनऊ के तुम जइयो
दूरई- दूर से जै-जै करियो
कोरोना खों हरइयो, ओ कक्का !
दीपक एक जलइयो ।।

को का कै रौ, कान ने दइयो
तालाबंदी सफल बनइयो
बाहर कहुं ने जइयो, ओ भौजी !
दीपक एक जलइयो ।।

मोदीजी की बातें ग्यानी
"वर्षा" ने सब दिल से मानी
समझो उर समझइयो, ओ दद्दा !
दीपक एक जलइयो ।।

    --------------------

लॉकडाउन के इस कठिन समय में हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा आज रात्रि में 9 बजे दीपक, मोमबत्ती आदि का प्रकाश करने हेतु जो आह्वान किया गया है, उस पर केंद्रित मेरा एक बुंदेली गीत आज web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 05.04.2020 में प्रकाशित हुआ है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं 


बुधवार, अप्रैल 01, 2020

लॉकडाउन के अनुभवों से सीख लें - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

लॉकडाउन के अनुभवों से सीख लें
             - डॉ. वर्षा सिंह

     कुछ दिनों से मेरे घर में गौरैया चिड़िया ने नल की पाईपलाईनों के बीच एक घोंसला बनाया हुआ है। लॉकडाउन से पहले अपने कामों की व्यस्तता के कारण इस ओर मेरा ख़ास ध्यान गया ही नहीं था। अब जबकि लॉकडाउन के चलते लगातार चौबीसों घंटे  पिछले एक सप्ताह से मैं अपने घर पर ही  हूं तो सुन रही हूं गौरैया के नन्हें बच्चों की वे आवाजें जो दिन भर पूरे घर में गूंजती रहती हैं।
  हां बहुत सी ऐसी चीजें है जिनका एहसास हम घर से बाहर रहकर कर ही नहीं पाते हैं। यह जरूर है कि लॉकडाउन की स्थिति में हमें लगातार घर में रहने के लिए विवश होना पड़ा है और यह लॉकडाउन भी कोरोना वायरस के संक्रमण की विभीषिका से बचाने के लिए लागू किया गया है किंतु हर एक लाभप्रद बात के पीछे अनेक पॉजिटिव बातें भी निहित होती हैं। यदि घर से बाहर नहीं जा पाने को माइनस प्वाइंट मानें तो लॉकडाउन का प्लस प्वाइंट यह है कि घर में रहकर हम घर में होने वाली उन चीजों को भी अब जान रहे हैं जिन्हें जानने की फुर्सत हमें पहले कभी नहीं मिल पाई है।     
           जहां तक लॉकडाउन की स्थिति में समय व्यतीत करने का प्रश्न है तो महिलाओं के पास कार्यों की कमी कभी नहीं रहती है । सुबह उठने से लेकर रात को बिस्तर पर जाने के बीच कितने छोटे-बड़े काम महिलाओं के जिम्मे सुपुर्द रहते हैं कि उन्हें करते - याद रखते हुए ही पूरा दिन व्यतीत हो जाता है । अब जबकि बाहरी कार्य जैसे कहीं आना-जाना किसी से मिलना-जुलना, अन्य सामाजिक कार्यों की व्यस्तताएं बिल्कुल भी नहीं हैं, किसी किस्म के साहित्यिक आयोजन भी नहीं हो रहे हैं तो मैं घर में रहकर उन कामों की ओर स्वयं को केंद्रित कर रही हूं जिन्हें करने की इच्छा होने के बावजूद मैं कर नहीं पाई थी। इन कामों की सूची में सबसे पहला काम मम्मी यानी मेरी माता जी के पास बैठकर उनकी बातें सुनना भी शामिल है । घर के बड़े बुजुर्ग कई दफा हमें आवाज़ देते हैं, वे अपनी कोई बात कहना चाहते हैं लेकिन समय के अभाव में ठीक उसी वक्त हम उन पर ध्यान नहीं दे पाते हैं, उनका कहा सुन नहीं पाते हैं । बाद में जब हम फुर्सत में हो कर उनकी बात सुनने जाते हैं तब तक वे भूल चुके होते हैं कि वे क्या कहना चाह रहे थे और यहां-वहां की छोटी-मोटी बात होकर रह जाती है। वे अपने मन की बात जस की तस कर ही नहीं पाते । लॉकडाउन के दौरान मैंने महसूस किया कि माता-पिता के प्रति बच्चे अपना दायित्व तभी अच्छी तरह निभा सकते हैं जब किसी एक दिन वे पूरी तरह माता-पिता की सेवा में व्यतीत करें, उनकी बातें सुनें। अब जबकि लॉकडाउन की स्थिति है तो तत्काल ही उनकी वे सभी बातें सुनकर हम उनके मन को संतुष्ट रहे हैं, जिनका एहसास हम घर से बाहर रहकर कर ही नहीं पाते हैं।
      तो मुझे लगता है कि भविष्य में आने वाले दिनों में जब लॉकडाउन की स्थिति समाप्त हो जाएगी और हम पुनः सामान्य जीवन के दैनिक कार्य करने लगेंगे तब उस वक्त इस लॉकडाउन के अनुभवों से सीख ले कर सप्ताह में कोई एक दिन हम ऐसा चुने जिसमें हम अधिक से अधिक समय अपने घर के बुजुर्गों के साथ पूरी तरह समर्पित भाव से व्यतीत करें। इस तरह घर के बुजुर्गों को भी आत्मसुख का अनुभव करा सकते हैं और स्वयं भी आत्मसंतुष्टि पा सकते हैं।
   जहां तक प्रशासन की बात है तो लॉकडाउन में कम से कम मुझे तो इस बात की पूरी तरह संतुष्टि है कि मेरे शहर सागर का प्रशासन बहुत चुस्त है। पूरी तरह समर्पण भाव के साथ हमारी जिले के अधिकारी, पुलिस विभाग और प्रशासन के साथ समाजसेवी, पत्रकार सभी जागरूकता से सेवा कार्यों में लगे हैं। ज़िला प्रशासन का जिम्मा जिला कलेक्टर प्रीति मैथिल नायक के पास है जो एक महिला हो कर पूरी तत्परता के साथ मैदानी निरीक्षण -परीक्षण कर जनता को हर प्रकार की हर संभव सुविधाएं, मदद आदि उपलब्ध कराने के लिए तत्परता से कार्य कर रही हैं। इसी प्रकार पुलिस विभाग में कार्यरत समस्त स्टाफ हर समय लॉकडाउन में अपने घरों में बंद नागरिकों की सुरक्षा-सुविधा के प्रति जागरूकता के साथ अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने कोरोना संक्रमण से सुरक्षित रखने का जो लॉकडाउन का क़दम उठाया है, वह वास्तव में स्तुत्य है। इस तरह का कदम हमारे देश के सुरक्षा के लिए अत्यंत जरुरी है ।
     तो आइए हम सभी मिल जुलकर लॉकडाउन के शेष बचे हुए दिनों में निर्धारित नियमों का पूरी आस्था के साथ पालन करें ताकि हम, हमारा परिवार, समाज, देश और साथ ही संपूर्ण विश्व सुरक्षित रह कोरोना वायरस की इस संक्रमणकारी आपदा से मुक्ति पा सके।
                              -----------

       "कोरोना लॉकडाउन और हम" के अंतर्गत web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 31 मार्च 2020 में मेरे विचार प्रकाशित किए गए हैं।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=27586