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शुक्रवार, जून 05, 2020

विश्व पर्यावरण दिवस पर दस दोहे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
मेरे प्रिय ब्लॉग मित्रों, विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🌿🌳🌏💖💛🍀🌴
कृपया पढ़िए वेब मैगज़ीन "युवाप्रवर्तक" में आज दि. 05.06.2020 को प्रकाशित मेरे दस दोहे पर्यावरण पर ...
http://yuvapravartak.com/?p=34353

विश्व पर्यावरण दिवस पर दस दोहे
 
     -  डॉ. वर्षा सिंह

मत भूलो अनलॉक में, लॉकडाउन के लाभ।
स्वच्छ हुआ पर्यावरण, धरा हुई हरिताभ ।।

हम यदि रहें सचेत तो, रहे प्रदूषण दूर।
हमें सुनाई दे सदा, नदियों का संतूर।।

हर्रा, नीम, करंज में, औषधि है भरपूर।
इनके लाभों से सभी, अवगत रहें जरूर।।

पेड़ कटेंगे रोज़ तो, कहां बनेंगे नीड़।
कलरव ना सुन पाएगी, तब ये मानव भीड़।।

मौसम में बदलाव का, मानव जिम्मेदार।
जंगल को छोटा किया, किया शहर विस्तार।।

धुंआ, धूल और गंदगी के समझें नुकसान।
अच्छी आदत डाल के, करें सुरक्षित जान।।

निरा स्वार्थ में डूब कर, जग को रहे बिसार।
जब जग ही मिट जाएगा, व्यर्थ सकल व्यापार।।

धरती तपती जा रही, पिघल रहे हिम शैल।
यह संकट हम रोक लें, और न जाए फैल।।

समय अभी भी शेष है, जो हम जाएं चेत।
वरना कृत्रिम खाद से, सूने होंगे खेत ।।

पर्यावरण सुधार का, प्रण कर लें हम आज।
"वर्षा", जाड़ा, गर्मियां, बदलेंगी अंदाज़।।

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विश्व पर्यावरण दिवस ... दस दोहे - डॉ. वर्षा सिंह


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बुधवार, जून 05, 2019

विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष बुंदेली गीत.... अपनी बुंदेली धरती- डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       विश्व पर्यावरण दिवस पर मेरे बुंदेली गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 04 जून 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=15420

बुंदेली गीत
         - डॉ. वर्षा सिंह

बिन पानी के कूड़ा- माटी
हो गईं सबरी कुइयां
मारे -मारे फिरत ढोर हैं
प्यासी फिर रईं गइयां
गरमी की जे मार परी है
सूखे ताल- तलइया।।

सूरज तप रऔ ऐसोे जैसे
भट्ठी इतई सुलग रई
भीतर- बाहर, सबई तरफ जे
लू की लपटें लग रईं
कौन गैल पकरें अब गुइयाँ
मिलत कहूं ने छइयां ।।

बांध रये सब आशा अपनी
मानसून के लाने
जब से झाड़- पेड़ सब कट गए
बदरा गए रिसाने
पूछ रये अब “वर्षा” से सब
बरसत काये नइयां ।।

ईमें सोई गलती अपनई है
नाम कोन खों धरिये
मनयाई मानुस ने कर लई
को कासे अब कईये
अब ने जे गलती दुहरायें
कसम उठा लो भइया ।।

ताल- तलैया गहरे कर लो
पौधे नए लगा लो
रहबो चइये साफ कुंआ सब
ऐसो नियम बना लो
जे अपनी बुंदेली धरती
बनहे सोनचिरइया ।।
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#बुंदेलीवर्षा

बुंदेली गीत - डॉ. वर्षा सिंह