गुरुवार, जून 14, 2018

साहित्य वर्षा - 15 डॉ. अखिल जैन : असीम संभावनाओं के युवा कवि  - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरे कॉलम "साहित्य वर्षा" की पंद्रहवीं  कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के युवा कवि डॉ. अखिल जैन पर मेरा आलेख । ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा - 15         
      डॉ. अखिल जैन : असीम संभावनाओं के युवा कवि
               - डॉ. वर्षा सिंह

       drvarshasingh1@gmail.com

सागर के साहित्याकाश में कई युवा रचनाकार अपनी लेखनी से अपनी प्रतिभा की ज्योति बिखेर रहे हैं। इन्हीं में एक युवा साहित्यकार हैं डॉ. अखिल जैन। 09 अक्टूबर 1982 को जन्मे डॉ. अखिल जैन पैथोलॉजी में स्नातक तथा समाज शास्त्र स्नातकोत्तर एवं एम एस डब्ल्यू हैं। बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज, सागर में लैब टेक्नोलॉजिस्ट के पद पर कार्यरत अखिल जैन को विक्रमशिला हिंदी विश्वविद्यालय भागलपुर द्वारा विधा वाचस्पति मानद डॉक्टरेट एवं विद्यासागर मानद डी लिट् की उपाधि प्राप्त है। डॉ. अखिल जैन सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह जी द्वारा गणतंत्र दिवस के अवसर पर रक्तदान एवं एच आई व्ही जागरूकता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने हेतु उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। कई सामाजिक संगठन भी उनके सेवाकार्य के लिए उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।
बचपन से ही साहित्य में रुझान होने के कारण साहित्य की विभिन्न विधाओं में अपनी कलम चलाते हुए कवि सम्मेलनों के मंचों पर भी उन्होंने अपना विशेष स्थान बनाया है और वे आकाशवाणी, दूरदर्शन के साथ ही देश के अनेक मंचों पर ख्यातिनाम कवियों के साथ काव्यपाठ कर चुके हैं। डॉ. अखिल जैन बताते हैं कि वे विगत तीन वर्षों से व्हाट्सएप जैसे सोशल नेटवर्क पर एक साहित्यिक समूह छंद मुक्त पाठशाला के एडमिन हैं। जिसमें अलग अलग देशों से रचनाकार जुड़े हुए हैं। व्हाट्सएप के इस साहित्यिक समूह के द्वारा ‘भावां की हाला’ नामक काव्य संग्रह  डॉ. जैन के संपादन में निकाला गया जो कि व्हाट्सएप के इतिहास में प्रथम अनूठा प्रयास था। व्हाट्सएप से जुड़े  साहित्यकारों द्वारा इस संग्रह का स्वागत किए जाने से उत्साहित हो कर इसी समूह के द्वारा दूसरा काव्य संग्रह उनके द्वारा संपादित किया गया। जिसका नाम था - ‘शब्दों का प्याला’। उनकी स्वयं की कविताओं का एक संग्रह ‘शब्दों के पंख’ प्रकाशनाधीन है।
अपनी रचनाधर्मिता के बारे में डॉ. अखिल जैन का कहना है कि -‘‘शब्दों को कलम की तूलिका से पेपर के कैनवास पर घुमाते, नचाते और मन के भाव के रंग में डुबाते हुए कविता का सृजन होता गया और मैं एक साधारण से इन्सान से कलमकार कब बन गया ये तो मित्रों की प्रशंसा के बाद पता चला। ये तो माँ शारदे का आशीर्वाद ही है कि नैसर्गिक और रचनात्मक छवियों की छत्र-छाया में, कभी उमंग, कभी उल्लास, कभी भावों के भंवर की उलझती लहरों से खिन्न मन ने कलम को ही अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया और रचनाओं की श्रृंखला बना डाली । मेरी दृष्टि में लिखो भले ही कम मगर ऐसा लिखो कि पढ़ने वाले सभी की खुशियां दुख दर्द सभी कविता के भीतर समाये हुए हो। तभी लेखन का, सृजन का सार है।’’ वे अपने लेखन की सफलता एवं ख्याति का श्रेय उस वातावरण को देते हैं जो उन्हें अपने पिता डॉ. आनन्द जैन एवं माता श्रीमती पुष्पा जैन के आशीष, स्नेह और सहयोग से प्राप्त हुआ।
अखिल जैन की कविताओं में एक बहुरंगी दुनिया दिखाई पड़ती है जिसमें खुशी है, दुख है, चिन्तन है, चिन्ता है और एक युवा उत्साह है। मंचीय कविताओं से परे शेष काव्य में वह गाम्भीर्य है जो साबित करता है कि कवि को जीवन के सभी उतार-चढ़ाव से सरोकार है। अपने चारों ओर की विषम परिस्थितियों का विश्लेषण करने की क्षमता कवि में है तथा वह अपनी इस क्षमता को बड़ी बारीकी से अपनी कविताओं में पिरोता जाता है। अपनों के द्वारा छले जाने पर कई ज़िन्दगियां इस त्रासदी से किस तरह गुज़रती हैं। इस कटु यथार्थ को अखिल जैन की कविता ‘वेश्या’ में देखा जा सकता है। अखिल की कविता छीजती मनुष्यता और दरकती संवेदनशीलता की पड़ताल करती है-
शर्म आई थी मुझे उस दिन बहुत
जब स्कूल के शिक्षक ने
कक्षा में खिलवाड़ की थी
मेरे अंगो से...
शर्म आई थी उस दिन जब
पड़ोस के चाचा ने
जो मुझे बिटिया कहते थे
नशे में जकड़ा था मुझे...

अखिल जैन की  कविताओं में समय का एक बेहद तीखा बोध भी है जो उनके कवित्व के प्रति संभावना जगाता है। मानवीय सरोकारों के निरंतर फैलते हुए क्षितिज को रेखांकित करते हुए बिम्ब उनकी कविताओं की ओर सहज ध्यान आकर्षित करते हैं। ‘गुल्लक’ शीर्षक कविता में यह बिम्ब-वैशिष्ट्य देखा जा सकता है-
आओ एक गुल्लक लायें
उस गुल्लक में हम
डालते रहेंगे कुछ स्मृतियां
कुछ पुराने पत्रों के टेढ़े मेढ़े आखर
मुरझाये गुलाबों की
सुखी पंखुरियों का फीका रंग
और कुछ आदान
प्रदान किये उपहारों के
सुनहले रैपर....
काले बालों के कुछ टुकड़े
और किसी सागर के तट की माटी
जहां दोनों
उंगलियों से लिखते थे
एक दूजे का नाम...
प्रेम की चवन्नी, विश्वास की अठन्नी
और हमारे रिश्ते के
सिक्कों से भर जाएगी गुल्लक....

कविता का यह उसूल होता है कि कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक कह दिया जाए और वह भी इस प्रकार से कि उसे पढ़ने वाले का सौंदर्यबोध भी न टूटने पाए। ‘डाकिया’ शीर्षक कविता में कहन का यह सौंदर्य कुछ इस तरह उभर कर आया है -
उम्मीदों के पेपर पर
गुंजाईश बहुत है -
मेरे दिल के छोटे से कोने में
संधारण की जगह
सख्त है
किन्तु अपेक्षा की खूंटी पर
लटके वर्षो से
तुम्हारे नाम के सैकड़ों
खत....

कविता की बहुआयामी दृष्टि ने जीवन की वास्तविकता को सदैव प्रस्तुत किया है। रचनाकार अपने अनुभवों द्वारा जीवन के उद्देश्यों को काव्य रूप देकर संप्रेषणीय आधार प्रदान करता है और यह संप्रेषण काव्यगत सृजनात्मक विचारशीलता से सिद्ध होता है। परंपरागत प्रतीकों के स्थान पर अखिल जैन ने अपने अनुभव को मुखर करने वाले उदाहरण प्रस्तुत किए हैं जिससे उनकी कविता में एक नया सौंदर्य का बोध प्रतिध्वनित होता है। उदाहरण के लिए ‘हाशिया’ कविता का यह अंश देखिए -
बचपन में सिखाते थे मास्टर
लिखते वक्त अपनी पुस्तिका में
छोड़कर रखना हाशिया...
बायें तरफ सदा ही
आदत रही है ये ....
उसी आदत ने सिखाया
मुझे छोड़ कर जोड़ना...

अखिल छंदमुक्त रचनाओं के साथ ही ग़ज़ल जैसी छंदबद्ध रचनाएं भी लिखते हैं। ये बानगी देखें-
गीत  कोई  भी  हो,  एहसास से  गाया मैने
जो मुझे  जैसा  मिला, दिल से  लगाया मैने
जितनी नफ़रत से उज़ाडा था तुमने दिल मेरा,
उतनी  चाहत से  तुम्हे  दिल में सजाया मैने
अखिल जैन की कविताओं से गुजरने के बाद यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि सागर की युवा साहित्यिक पीढ़ी में वे असीम सम्भावनाओं के कवि हैं। आशा है कि वे इसी तरह साहित्य को सामाजिक सरोकारों से जोड़े रखेंगे और अपने काव्यधर्म के प्रति इसी तरह ईमानदार बने रहेंगे।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 12.06.2018)
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सोमवार, जून 11, 2018

आ गए फिर बारिशों के दिन

आ गए फिर बारिशों के दिन

गगन में
दूर तक बादल
हवायें कर रहीं हलचल
उमड़ती ख़्वाहिशों के दिन

धरा पर
बूंद की रिमझिम
नयी फिर छेड़ती सरगम
गए अब गर्दिशों के दिन

हुए इक
ताल और पोखर
गले मिलते परस्पर
भुला कर रंज़िशों के दिन

🌺 - डॉ. वर्षा सिंह

मंगलवार, जून 05, 2018

साहित्य वर्षा - 14 वरिष्ठ साहित्यसेवी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरे कॉलम "साहित्य वर्षा" की चौदहवीं  कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर की वरिष्ठ  साहित्यकार एवं कवयित्री डॉ. (श्रीमती) विद्यावती "मालविका" , जो मेरी माताश्री भी हैं , पर मेरा आलेख । ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा - 14      
     
वरिष्ठ साहित्यसेवी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’
  - डॉ. वर्षा सिंह
  
               डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ सागर नगर की एक ऐसी साहित्यकार हैं जिनका साहित्य-सृजन अनेक विधाओं, यथा- कहानी, एकांकी, नाटक एवं विविध विषयों पर शोध प्रबंध से ले कर कविता और गीत तक विस्तृत है। लेखन के साथ ही चित्रकारी के द्वारा भी उन्होंने अपनी मनोभिव्यक्ति प्रस्तुत की है। सन् 1928 की 13 मार्च को उज्जैन में जन्मीं डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ ने अपने जीवन के लगभग 6 दशक बुन्देलखण्ड में व्यतीत किए हैं, जिसमें 30 वर्ष से अधिक समय से वे मकरोनिया, सागर में निवासरत हैं। डॉ. ‘मालविका’ को अपने पिता संत ठाकुर श्यामचरण सिंह एवं माता श्रीमती अमोला देवी से साहित्यिक संस्कार मिले। पिता संत श्यामचरण सिंह एक उत्कृष्ट साहित्यकार एवं गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अस्पृश्यता उन्मूलन एवं नशाबंदी में उल्लेखनीय योगदान दिया था। डॉ. विद्यावती अपने पिता के विचारों से अत्यंत प्रभावित रहीं और उन्होंने 12-13 वर्ष की आयु से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। बौद्ध धर्म एवं प्रणामी सम्प्रदाय पर उन्होने विशेष अध्ययन एवं लेखन किया।
       डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा। दो बेटियों के जन्म के कुछ समय बाद ही उन्हें वैधव्य का असीम दुख सहन करना पड़ा, किन्तु वे अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं हुईं। ससुराल पक्ष से कोई सहायता न मिलने पर उन्होंने शिक्षिका के रूप में आत्मनिर्भरतापूर्वक अपने वृद्ध पिता को सहारा दिया और अपने अनुज कमल सिंह को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाया जो कि आदिम जाति कल्याण विभाग मघ्यप्रदेश शासन के हायर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। डॉ. विद्यावती ने अपने बलबूते पर अपनी दोनों पुत्रियों वर्षा सिंह और शरद सिंह का लालन-पालन कर उन्हें उच्च शिक्षित किया। उन्होंने व्याख्याता के रूप में मध्यप्रदेश शासन के शिक्षा विभाग में उज्जैन, रीवा एवं पन्ना आदि स्थानों में अपनी सेवाऐं दीं और सन् 1988 में सेवानिवृत्त हुईं। वे शासकीय सेवा के साथ ही लेखन एवं शोध कार्यां में सदैव संलग्न रहीं। स्वाध्याय से हिन्दी में एम.ए. करने के उपरांत सन् 1966 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पीएच.डी. में उनके शोध निर्देशक (गाइड) हिन्दी तथा बौद्ध दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान राहुल सांकृत्यायन एवं पाली भाषा तथा बौद्ध दर्शन के अध्येता डॉ. भिक्षु धर्मरक्षित थे। उनका यह शोध प्रबंध आज भी युवा शोधकर्ताओं के लिए दिशानिर्देशक का काम करता है। इनकी अब तक अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं जिनमें प्रमुख हैं - कामना, पूर्णिमा, बुद्ध अर्चना (कविता संग्रह) श्रद्धा के फूल, नारी हृदय (कहानी संग्रह), आदर्श बौद्ध महिलाएं, भगवान बुद्ध (जीवनी) बौद्ध कलाकृतियां (पुरातत्व), सौंदर्य और साधिकाएं (निवंध संग्रह), अर्चना (एकांकी संग्रह), मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव, महामति प्राणनाथ-एक युगान्तरकारी व्यक्तित्व (शोध ग्रंथ) आदि। ‘‘आदर्श बौद्ध महिलाएं’’ पुस्तक का बर्मी एवं नेपाली भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुआ।
       डॉ. ‘मालविका’ को हिन्दी साहित्य सेवा के लिए अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए। जिनमें उल्लेखनीय हैं- सन् 1957 में स्वतंत्रता संग्राम शताब्दी सम्मान समारोह में मध्यप्रदेश शासन का साहित्य सृजन सम्मान, सन् 1958 में उत्तरप्रदेश शासन का कथा लेखन सम्मान, सन् 1959 में उत्तरप्रदेश शासन का जीवनी लेखन सम्मान, सन् 1964 में मध्यप्रदेश शासन का कथा साहित्य सम्मान, सन् 1966 में मध्यप्रदेश शासन का मीरा पुरस्कार प्रदान किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी डॉ. विद्यावती ने अपना लेखन सतत् जारी रखा। उनके इस साहित्य के प्रति सर्मपण को देखते हुए उन्हें सन् 1998 में महारानी लक्ष्मीबाई शास. उ.मा. कन्या विद्यालय क्रमांक-एक, सागर द्वारा ‘‘वरिष्ठ साहित्यसेवी सम्मान’’, सन् 2000 में भारतीय स्टेट बैंक सिविल लाइनस् शाखा सागर द्वारा ‘‘साहित्यसेवी सम्मान’’, वर्ष 2007 में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन सागर द्वारा ‘‘सुंदरबाई पन्नालाल रांधेलिया स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मान’’ एवं सन् 2016 में हिन्दी दिवस पर श्यामलम् संस्था सागर द्वारा ‘‘आचार्य भगीरथ मिश्र हिन्दी साहित्य सम्मान’’ से सम्मानित किया गया। उल्लेखनीय है कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों में डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का ससम्मान उल्लेख किया गया है, यथा :- मध्यभारत का इतिहास (चतुर्थ खंड), बुद्ध की देन, हिन्दी की महिला साहित्यकार , आधुनिक हिन्दी कवयित्रियों के प्रेमगीत, मध्यप्रदेश के साहित्यकार, रेत में कुछ चिन्ह, डॉ. ब्रजभूषण सिंह ‘आदर्श’ सम्मान ग्रंथ आदि। उनकी कुछ पुस्तकें इंटरनेट पर भी पढ़ी जा सकती हैं। नाट्यशोध संस्थान, कोलकता में उनका एकांकी संग्रह ‘‘’अर्चना’ संदर्भ ग्रंथ के रूप में पढ़ाया जाता है। इसी प्रकार नव नालंदा महाविहार, नालंदा, सम विश्वविद्यालय, बिहार के एम.ए. हिन्दी पाठ्यक्रम के चौथे प्रश्नपत्र बौद्ध धर्म- दर्शन और हिन्दी साहित्य के अंतर्गत ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ ग्रंथ पढ़ाया जाता है।
      बुन्देलखण्ड पर विशेष लेखन कार्य करते हुए डॉ. विद्यावती ने ‘‘दैनिक भास्कर’’ के सागर संस्करण में वर्ष 1997-98 में सागर संभाग की कवयित्रियां शीर्षक धारावाहिक लेखमाला तथा वर्ष 1998-99 में बुंदेली शहीद महिलाओं पर आधारित ‘‘कलम आज उनकी जय बोल’’ शीर्षक धारावाहिक लेखमाला लिखी। इसके साथ ही दैनिक ‘‘आचरण’’ सागर में बुन्देली इतिहास, साहित्य, संस्कृति एवं वैभव से संबंधित अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं। आकाशवाणी के इंदौर, उज्जैन, भोपाल एवं छतरपुर केन्द्रों से उनके रेडियो नाटकों का धारावाहिक प्रसारण किया जाता रहा है। उनकी कविताओं का नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन होता रहा है। अपने बुजुर्गों से मिली साहित्य सृजन की इस परम्परा को डॉ. विद्यावती ने न केवल अपनाया अपितु अपनी दोनों पुत्रियों को भी साहित्यिक संस्कार दिए। उनकी बड़ी पुत्री (यानी मैं) डॉ. वर्षा सिंह हिन्दी गजल में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं तथा छोटी पुत्री डॉ. (सुश्री) शरद सिंह उपन्यास एवं कथा लेखन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर चुकी हैं।
       डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ की कविताओं में मानवीय संवेगों की कोमल भावनाओं से ले कर वर्तमान की विषमताओं का चित्रण मिलता है। किसानों की पीड़ा और सूखे के संकट को बड़े ही सहज भाव से उन्होंने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है-
अब तो नभ में आओ बादल, धरती को नहला दो
प्यासी आंखें सूख चली है, बूंदों से सहला दो।
सूख रही है खेती, कृषक उदासे हैं
बंजर जीवन में, स्वप्न जरा से हैं
रिमझिम के स्वर से ,अब तो बहला दो।
हमने त्रुटियां की हैं, काटे पेड़ निरंतर
हमने ही तो मौसम में, लाया है अंतर
तुम दयालु हो, गलती तो झुठला दो।
ग्लोबल वार्मिंग और जल संरक्षण पर उनकी ये पंक्तियां देखिए-
     तप रही धरती से, मानव
     क्यों नहीं है सीख लेता ।
     सूखती नदियां, कुओं को
     काश ! संरक्षण तो देता ।
उनके कविता संग्रह ‘कामना’ में प्रकृति को बड़े ही सुंदर ढंग से वर्णित करती यह कविता प्रसाद-शैली का समरण कराती है-
          समयचक्र  चलता  रहता है....
          नीरव नीले अंबर में, सखि,  शुभ्र चंद्र मुस्काता है
          सरिताओं के चंचल जल में नव-नव खेल रचाता है
          फिर भी रजनी का आंसू
          ओस बना पड़ता रहता है.....
     वर्तमान में शांति विहार कालोनी, मकरोनिया में निवासरत् डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ 90 वर्ष की आयु में भी सतत् अध्ययन और लेखन कार्य कर रही हैं।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 05.06.2018)
#साप्ताहिक_सागर_झील #साहित्य_वर्षा #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #MyColumn #Varsha_Singh #Sahitya_Varsha #Sagar #Sagar_Jheel #Weekly

Happy World Environment Day

प्रिय मित्रों,
       आज आप सबने विश्व पर्यावरण दिवस अपने - अपने तरीक़े से मनाया ही होगा। तो चलिये, इस विश्व पर्यावरण दिवस की संध्या में प्रस्तुत है मेरा एक बुंदेली गीत....
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      जे अपनी बुंदेली धरती बनहे सोनचिरैया
      ========================
बिन पानी के कूड़ा- माटी
हो गईं सबरी कुइयां
मारे -मारे फिरत ढोर हैं
प्यासी फिर रईं गइयां
गरमी की जे मार परी है
सूखे ताल- तलैया।।   बिन पानी के.....

सूरज तप रऔ ऐसोे जैसे
भट्ठी इतई सुलग रई
भीतर- बाहर, सबई तरफ जे
लू की लपटें लग रईं
कौन गैल पकरें अब गुइयाँ
मिलत कहूं ने छइयां ।।   बिन पानी के...

बांध रये सब आशा अपनी
मानसून के लाने
जब से झाड़- पेड़ सब कट गए
बदरा गए रिसाने
पूछ रये अब “वर्षा” से सब
बरसत काये नइयां ।।    बिन पानी के....

ईमें सोई गलती अपनई है
नाम कोन खों धरिये
मनयाई मानुस ने कर लई
को कासे अब कईये
अब ने जे गलती दुहरायें
कसम उठा लो भइया ।।    बिन पानी के....

ताल- तलैया गहरे कर लो
पौधे नए लगा लो
रहबो चइये साफ कुंआ सब
ऐसो नियम बना लो
जे अपनी बुंदेली धरती
बनहे सोनचिरैया ।।   बिन पानी के....
      -डॉ. वर्षा सिंह

#बुंदेलीबोल
#पर्यावरणदिवस

गुरुवार, मई 31, 2018

साहित्य वर्षा - 13 : संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी तेरहवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ  साहित्यकार प्रो. कांतिकुमार जैन के संस्मरण लेखन पर मेरा आलेख ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....
साहित्य वर्षा - 13           
 संस्मरण लेखन पुरोधा प्रो. कांति कुमार जैन
     - डॉ. वर्षा सिंह                                                                                   
 drvarshasingh1@gmail.com

सागर की उर्वर भूमि ने हिन्दी साहित्य को विभिन्न विधाओं के उद्भट विद्वान दिये हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, ललित निबन्ध आदि के क्रम में संस्मरण लेखन को एक प्यी पहचान देने का श्रेय सागर के साहित्यकार को ही है , जिनका नाम है प्रो. कांति कुमार जैन। 09 सितम्बर 1932 को सागर के देवरीकलां में जन्में कांति कुमार जैन ने तत्कालीन कोरिया स्टेट (छत्तीसगढ़) के बैकुंठपुर से सन् 1948 में मैट्रिक उत्तीर्ण किया। मैट्रिक में हिन्दी में विशेष योग्यता के लिये उन्हें कोरिया दरबार की ओर से स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद उच्च शिक्षा के लिये वे पुनः सागर आ गये। सागर विश्वविद्यालय के प्रतिभावान छात्रों में स्थान बनाते हुए उन्होंने सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं तथा स्वर्ण पदक प्राप्त किया। प्रा.े कांति कुमार जैन को अध्ययन- अध्यापन से आरम्भ से ही लगाव रहा। सन् 1956 से मध्यप्रदेश के अनेक महाविद्यालयों में शिक्षण कार्य करने के उपरांत सन् 1978 से 1992 तक डॉ, हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में माखनलाल चतुर्वेदी पीठ पर हिन्दी प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष रहे। प्रो. कांति कुमार जैन सागर विश्वविद्यालय की बुंदेली पीठ से प्रकाशित होने वाली बुंदेली लोकसंस्कृति पर आधारित पत्रिका ‘ईसुरी’ का कुशल सम्पादन करते हुए इसकी ख्याति को अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया।
प्रो. कांति कुमार जैन ने कई महत्वपूर्ण शोधात्मक पुस्तकें लिखीं। जिनमें ‘छत्तीसगढ़ी बोली : व्याकरण और कोश’, ‘नई कविता’, ‘भारतेंदु पूर्व हिन्दी गद्य’, ‘कबीरदास’, ‘इक्कीसवीं शताब्दी की हिन्दी’ तथा ‘छायावाद की मैदानी और पहाड़ी शैलियां’ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। ललित एवं आलोचनात्मक निबन्धों के साथ ही जब संस्मरण लेखन में सक्रिय हुए तब उनकी विशिष्ट शैली ने हिन्दी साहित्य जगत में मानों एक नयी धारा चला दी। सन् 2002 में उनकी पहली संस्मरण पुस्तक ‘लौट कर आना नहीं होगा’ प्रकाशित हुई। मुक्तिबोध और परसाई के घनिष्ठ मित्रों में रहे प्रो. कांति कुमार जैन ने एक संस्मरण पुस्तक लिखी ‘तुम्हारा परसाई’ जो सन् 2004 में प्रकाशित हुई । इसके बाद सन् 2006 में ‘जो कहूंगा सच कहूंगा’, सन् 2007 में ‘अब तो बात फैल गई’ और सन् 2011 में ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ प्रकाशित हुई।
संस्मरण हिन्दी में अपेक्षाकृत नयी विधा है जिसका आरम्भ द्विवेदी युग से माना जाता है। परंतु इस विधा का असली विकास छायावादी युग में हुआ। इस काल में सरस्वती, सुधा, माधुरी, विशाल भारत आदि पत्रिकाओं में संस्मरण प्रकाशित हुए। संस्मरण को साहित्यिक निबन्ध की एक प्रवृत्ति भी माना गया है। साहित्य से इतर लोगों में अकसर आत्मकथा और संस्मरण को लेकर मतिभ्रम होने लगता है। किन्तु संस्मरण और आत्मकथा के दृष्टिकोण में मौलिक अन्तर है। आत्मकथा के लेखक का मुख्य उद्देश्य अपनी जीवनकथा का वर्णन करना होता है। इसमें कथा का प्रमुख पात्र स्वयं लेखक होता है। संस्मरण लेखक का दृष्टिकोण भिन्न रहता है। संस्मरण में लेखक जो कुछ स्वयं देखता है और स्वयं अनुभव करता है उसी का चित्रण करता है। लेखक की स्वयं की अनुभूतियां तथा संवेदनायें संस्मरण का ताना-बाना बुनती हैं। संस्मरण लेखक एक निबन्धकार की भांति अपने स्मृतियों को गद्य के रूप में बांधता है और एक इतिहासकार के रूप में तत्संबंधित काल को प्रदर्शित करता है। कहने का आशय है कि संस्मरण निबंध और इतिहास का साहित्यिक मिश्रण होता है और जिसका मूल संबंध संस्मरण लेखक की स्मृतियों से होता है। वह अपने चारों ओर के जीवन का वर्णन करता है।
जैसा कि समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ के बारे में लिखती हैं-‘‘कांति कुमार जैन की संस्मरण पुस्तक ‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ एक अलग कालखण्ड में ले जाती है। जहां पहुंचने पर कई बातें चमत्कृत कर देती हैं। कभी लगता है जैसे हम किसी परियों की कहानी से गुज़र रहे हों तो कभी, जीवन के कटु और खुरदुरे यथार्थ की चुभन महसूस होने लगती है लेकिन इन सबके साथ बचपन की भोली दृष्टि अपनी पूरी मासूमियत के साथ पग-पग साथ चलती है और कहीं-कहीं किशोरावस्था की दस्तक वाली यादें भी छलक कर बाहर आ जाती हैं। ......‘बैकुण्ठपुर में बचपन’ कांति कुमार जैन के सात वर्ष से सोलह वर्ष की आयु की स्मृतियों का लेखाजोखा मात्र नहीं है, यह संस्मरण-पुस्तक तत्कालीन समाज, राजनीति, आर्थिक व्यवस्थाओं और मानवीय चेष्टाओं का एक ऐसा दस्तावेज़ बनाती है जिसमें बालमन, किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था की दृष्टि, विचारों और विश्लेषणों का अद्भुत मिश्रण है। यूं भी हिन्दी साहित्य में आधुनिक संस्मरण विधा को नई स्थापना देने का श्रेय कांति कुमार जैन के संस्मरण लेखन खाते में है। कथ्य तो विशेष है ही, साथ ही, कांति कुमार जैन की सहज वर्णनात्मक कला ने पुस्तक के कलेवर को इतना प्रवाहमय बना दिया है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद इसे पूरा करके ही पाठक इसे एक ओर रख सकेगा, बिलकुल टाईम मशीन में बैठ कर किसी अलग कालखण्ड की यात्रा पूरी करने जैसी अनुभूति के साथ।
लेखन क्षेत्र में सतत् सक्रिय रहने वाले प्रो. कांति कुमार जैन ने अपने मि़त्र मुक्तिबोध से जुड़ी स्मृतियों को सहेजते हुए ‘महागुरू मुक्तिबोध : जुम्मा टैंक की सीढ़ियों पर’ नाम से संस्मरण पुस्तक लिखी, जो सन् 2014 में प्रकाशित हुई। इसी क्रम में सन् 2015 में कोरिया के राजा पर ’एक था राजा’ प्रकाशित हुई, जिसकी भूमिका में  प्रो. कांति कुमार जैन ने लिखा है- ‘एक था राजा में कोरिया के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के प्रादर्श प्रभाव और प्रशासन के नख चित्रात्मक संस्मरण। ये संस्मरण पूरे या सांगोपांग प्रकृति के नहीं हैं। बल्कि 65-70 वर्ष बाद भी जो व्यक्ति, स्थान, घटनायें या प्रसंग मेरी स्मृति में हिलते रह गये हैं, उनका कहीं हल्का, कहीं विस्तृत उल्लेख। प्रायः हल्का ही। यह सामग्री मैंने कुछ अपनी स्मृति से जुटाई है , कुछ जनश्रुतियों से, अधिकांश राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव के चौथे पुत्र डॉ रामचंद्र सिंहदेव के सौजन्य से।’
प्रो. कांति कुमार जैन का एक बहुत ही रोचक संस्मरण है- ‘पप्पू खवास का कुनबा’ वे अपने संस्मरण लेखन में जिस प्रकार चुटेले शब्दों का सहज भाव से प्रयोग करते हैं उससे उनक ेलेखन में सदैव ताजा टटकेपन का बोध होता है। अपने संस्मरण लेखन के कारण कई बार उन्हें संकटों का भी सामना करना पड़ा, विरोध भी झेलना पड़ा, किन्तु उन्होंने अपनी लेखनी को रुकने नहीं दिया। वर्तमान हिन्दी साहित्य जगत में प्रो. कांति कुमार जैन संस्मरण लेखन के पुरोधा एवं ‘संस्मरणाचार्य’ के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके हैं।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 29.05.2018)
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सोमवार, मई 28, 2018

माटी मेरे सागर की - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       आज 28 मई 2018 को " सागर दिनकर " में प्रकाशित मेरी रचना जो मेरे शहर सागर को समर्पित है... आप भी पढ़िए और Share कीजिए ❤
हार्दिक धन्यवाद #सागरदिनकर 🙏

माटी मेरे सागर की
                    - डॉ. वर्षा सिंह

मां के आंचल जैसी प्यारी ,  माटी मेरे सागर की ।।
सारे जग से अद्भुत न्यारी,  माटी मेरे सागर की ।।

भूमि यही वो जहां ‘’गौर’’ ने, दान दिया था शिक्षा का
पाठ पढ़ाया  था  हम सबको,  संस्कार की  कक्षा का
विद्या की यह है फुलवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी..................

विद्यासागर जैसे  ऋषि-मुनि की   पावनता  पाती है
धर्म, ज्ञान की, स्वाभिमान की अनुपम उज्जवल थाती है
श्रद्धा, क्षमा, त्याग की क्यारी,  माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.............

‘वर्णी जी’  की तपो भूमि यह, यही भूमि ‘पद्माकर’ की
‘कालीचरण’ शहीद यशस्वी, महिमा  अद्भुत सागर की
सारा जग इस पर बलिहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.................

नौरादेही   में   संरक्षित   वन   जीवों  का डेरा है
मैया  हरसिद्धी  का  मंदिर, रानगिरी  का  फेरा  है
आबचंद की गुफा दुलारी,  माटी मेरे  सागर  की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........

राहतगढ़  की छटा अनूठी ,झर-झर झरती जलधारा
गढ़पहरा,  धामौनी  बिखरा ,  बुंदेली   वैभव  सारा
राजघाट, रमना चितहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी................

एरण पुराधाम विष्णु का , सूर्यदेव हैं रहली में
देव बिहारी जी के हाथों सारा जग है मुरली में
पीली कोठी अजब सवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी....................

मेरा सागर मुझको प्यारा, यहीं हुए लाखा बंजारा
श्रम से अपने झील बना कर, संचित कर दी जल की धारा
‘वर्षा’-बूंदों की किलकारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........
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बुधवार, मई 23, 2018

साहित्य वर्षा - 12 मानववादी दृष्टि के धनी डॉ. आर.डी. मिश्र - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी बारहवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ  साहित्यकार डॉ. आर. डी. मिश्र की मानववादी दृष्टि पर मेरा आलेख ....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा - 12
            
      मानववादी दृष्टि के धनी डॉ. आर.डी. मिश्र
              - डॉ. वर्षा सिंह

मानववाद आज एक ज्वलंत विषय है। इस विषय पर बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं एवं गहन चर्चाएं होती हैं। कई बार इस बिन्दु पर मतभेद भी उभर आते हैं कि मानववाद क्या है ? इस पर भी चिंतन किया जाता है कि मानववाद का स्वरूप कैसा होना चाहिए और इसे समाज में कैसे स्थापित रखा जाए। भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में कुछ विद्वान यह मानते हैं कि मानववाद पश्चिम से आयी अवधारणा है। वे तर्क देते हैं कि भारतीय संस्कृति ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ पर आधारित है। मानववाद शब्द भले ही पश्चिम से आया हो किन्तु यह मानवीय मूल्यों एवं संवेदनाओं का एक प्रचलित नाम है। उदार व्यक्ति संवेदनाओं के प्रति द्रवित होता है तो क्रूर व्यक्ति दुराग्रह से भर कर अट्टहास करने लगता है। एक मानवीय मूल्य को बचाना चाहता है तो दूसरा मिटाना चाहता है। इस प्रकार अच्छाई और बुराई दोनों ही मानव के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं और इन्हीं का लेखा -जोखा मानववाद को रचता है।
हिन्दी साहित्य की मूल चेतना ही मानववादी है क्योंकि इसमें मानवजीवन के प्रत्येक बिन्दु को र्प्याप्त बारीकी से परखा और विश्लेषित किया गया है। हिन्दी के आधुनिक युग के साहित्यकारों में ‘‘महाप्राण ’’ कहे जाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपने साहित्य में मानव के सर्जक स्वरूप और उसकी विद्रूपताओं दोनों को सामने रखा है। समीक्षक एवं आलोचक डॉ. आर. डी. मिश्र ने निराला के गद्य साहित्य में मानववाद का सूक्ष्मता से अनुशीलन किया है। इस विषय पर उनकी दो पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं- ‘‘निराला काव्य की मानवीय चेतना ’’ और ’’मानववादः दृष्टि और धारणा’’। इनके अतिरिक्त डॉ. मिश्र की दो और उल्लेखनीय कृतियां हैं, पहली ‘‘उत्तरशती का सांस्कृतिक विघटन’’ और दूसरी ‘‘साहित्य और संस्कृतिः व्यक्तिबोध से युगबोध’’।
11 अक्टूबर 1935 को सागर में जन्में डॉ. रमेश दत्त मिश्र जिन्हें सभी डॉ. आर.डी. मिश्र के नाम से पुकारते हैं, प्रखर मानववादी द्ष्टिकोण के धनी हैं। डॉ. मिश्र की उच्च शिक्षा सागर विश्वविद्यालय में हुई। निराला के साहित्य पर शोधकार्य करने के साथ ही साहित्य एवं संस्कृति के विविध आयामों का गहन अध्ययन किया। सन् 1960 में रामकृष्ण मिशन, नागपुर में स्वामी यतीश्वरानंद महाराज से विधिवत् दीक्षा ग्रहण करने के बाद डॉ. मिश्र वहीं पर युगचेता सन्यासी स्वामी आत्मानंद के सम्पर्क में आए। तदोपरांत रायपुर आश्रम में उनके सानिंध्य में रह कर स्वामी विवेकानंद के नव्य वेदांत की चिंतना और ठाकुर रामकृष्णदेव की अनुभूतिप्रवणता को समझने का प्रयास किया। मध्यप्रदेश के विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में अनेक छोटे-बड़े स्थानों में रहते हुए डॉ. मिश्र अंततः अपने गृहनगर सागर में शासकीय महाविद्यालय के प्राचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए।
डॉ. आर.डी. मिश्र एक ओजस्वी वक्ता भी रहे हैं। उनके उद्बोधनों में विवेकानंद के जीवनदर्शन की झलक मिलती रही है। डॉ. मिश्र ने जब निराला के साहित्य की व्याख्या की तो उसमें भी उन्होंने मानववाद को प्रमुखता दी। डॉ. मिश्र के शब्दों में - ‘‘उनका (निराला का) मानव देवत्व की तलाश में नहीं, उसकी ऊर्जा देवत्व को गंतव्य मान कर गतिमान नहीं होती, बल्कि देवत्व का पर्याय बन कर आती है। मानव, मानव के रूप में देवता है, यह सत्य निराला, युग के सम्मुख प्रस्तुत कर देते हैं।‘‘
डॉ. मिश्र के अनुसार निराला के गद्य में वेदांत की अनुप्रेरणा और विवेकानंद की वाणी का प्रभाव ही नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व की विराटता और गहन चेतना भी विद्यमान है। कुछ आलोचक मानते हैं कि काव्य की अपेक्षा गद्य में मूल्य निर्णय की क्षमता अधिक होती है। जबकि निराला के काव्य और गद्य को यदि समान रूप से मूल्य निर्णायक साबित होती हैं। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वे कौन से कारण रहे हांगे जिन्होंने काव्य और गद्य दोनों का सृजन निराला से कराया ? इस प्रश्न का उत्तर डॉ. मिश्र ने इस प्रकार दिया है कि-‘‘निराला के भीतर एक समवेग तत्व निरंतर रहा है।..... जीवन के विविध पक्षों में अवगाहन करने के उपरांत जमीन से जुड़े निराला को जो कुछ मिला वह धरती की सम्वेदना का प्रतिफल ही था, इसी कारण एक अंतर्द्वद्व हमेशा चलता रहा। वे उद्वेलित होते रहे, जीवन की विषमताओं को ले कर उनकी पीड़ा थी उनके मन में। मानव, मानव का शोषण क्यों करता है ? यह सहज प्रश्न और जिज्ञासा उन्हें आकुल करती रही और अंतर्मन में अन्जाने में ही एक चिंतन प्रक्रिया बराबर चलती रही। यह उनके भीतर क्रंतिचेतना की पीठिका और प्रेरक बनी, और यही निष्पत्तियां बन कर उनके व्यक्तित्व को सहज सम्वेदना की दिशा देती रहीं।’’
डॉ. मिश्र ने निराला के गद्य में विद्यमान मानववाद का तीन बिन्दुओं में आकलन किया है- निराला के उपन्यासों में मानववाद, कथा साहित्य में मानववाद और रेखाचित्रों- संस्मरणों में मानववाद। इन तीनों बिन्दुओं के अध्ययन के उपरांत निराला के मानववादी दृष्टिकोण की विराटता, गहनता ओर विस्तार को समझना आसान हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये तीनों बिन्दु निराला के मानस के मानवीय पूर्णत्व से परिचित कराते हैं।
निराला के कथा साहित्य के मूल्यांकन को ले कर डॉ. मिश्र ने अपना असंतोष भी प्रकट किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘उनके (निराला के) कथा साहित्य को केवल खानापूरी के लिए या तो मूल्यांकित कर दिया जाता है अथवा बंधे-बंधाये नियमों और कसौटियों पर उसका परीक्षण करके अपने अध्ययन- मूल्यांकन की औपचारिकता की पूर्ति कर ली जाती है।’’
डॉ. मिश्र मानते हैं कि निराला का कथा साहित्य एक अप्रत्यक्ष उपेक्षा का शिकार रहा और वह प्रेमचंद के कथा साहित्य के प्रभामंडल के पीछे छिपा रह गया। निराला का कथा साहित्य चर्चित अवश्य हुआ किन्तु उचित मूल्यांकन की कमी के चलते अपने जनबोध को भलीभांति उजागर नहीं कर पाया। निराला के रेखाचित्र और संस्मरणों के संदर्भ में डॉ. मिश्र ‘‘कुल्ली भाट’’ और ‘‘बिल्लेसुर बकरीहा ’’ को रेखांकित करते हैं। डॉ. मिश्र ने ‘‘कुल्ली भाट’’ को समानांतर व्यक्ति की चेतना-कथा निरूपित किया है। उनके अनुसार - ‘‘ ‘‘कुल्ली भाट’’ रचना निराला साहित्य की अनन्यतम घटना मानी जाती है।’’  वहीं ‘‘बिल्लेसुर बकरीहा’’ को डॉ. मिश्र ने मनुष्य की महत्वाकांक्षा का प्रस्तुतिकरण माना है जिसमें मानवीय जीवंतता, धरती का यथार्थबोध, मौजमस्ती की मानवीय अनुभूति के साथ-साथ व्यंग्य की अनुभूति भी होती है।
हिन्दी साहित्य में निराला को एक सम्मानित स्थान मिला है किन्तु उनके साहित्य को समग्रता से समझने के लिए जो दृष्टि आवश्यक है वह डॉ. मिश्र अपनी पुस्तकों के माध्यम से उपलब्ध कराते हैं। इसे हिन्दी साहित्य के लिए उनका विशेष अवदान माना जा सकता है।

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(साप्ताहिक सागर झील दि. 22.05.2018)
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