बुधवार, नवंबर 15, 2017

‘सामयिक सरस्वती’ पत्रिका में मेरी छः ग़ज़लें - डॉ वर्षा सिंह

Ghazals of Dr Varsha Singh in  Samayik Saraswati Oct.-Dec 2017

Ghazals of Dr Varsha Singh in  Samayik Saraswati Oct.-Dec 2017
हिन्दी साहित्य जगत् की लोकप्रिय एवं महत्वपूर्ण पत्रिका ‘‘सामयिक सरस्वती’’ के अक्टूबर-दिसम्बर 2017 अंक में मेरी छः ग़ज़लें प्रकाशित हुई हैं।
मैं आभारी हूं ‘‘सामयिक सरस्वती’’ के संपादक महेश भारद्वाज जी की जिन्होंने मेरी ग़ज़लों को अपनी पत्रिका में स्थान दिया।

शुक्रवार, नवंबर 10, 2017

En Evening with Coffee

Dr Varsha Singh

आया दिन उजियाला


Ghazal by Dr Varsha Singh

बीती रात जुन्हाई वाली
आया दिन उजियाला
करना है जो आज करो, कल
किसने देखा- भाला
      - डॉ. वर्षा सिंह

जागी आंखों वाला सपना


दोस्ती

ज़िन्दगी जीना सज़ा है इन दिनों
कुछ नहीं अपना पता है इन दिनों
दोस्ती उनसे हुई तो ये हुआ
पूछते सब क्या हुआ है इन दिनों
         - डॉ. वर्षा सिंह

सूर्य हुआ फिर उदित

सूर्य हुआ फिर उदित
प्रकृति हो गई मुदित
        कि रोशनी फैल गई
             जगी उम्मीद नई
          नहीं रहती कायम हरदम
              अंधेरे की काली छाया
           बदलती रहती है प्रतिपल
         समय की गतिशाली काया
हो कब कैसे क्या - क्या
नहीं किसी को विदित
      ☀- डॉ. वर्षा सिंह

गुरुवार, नवंबर 02, 2017

परछाई

अंधेरों में बसी रहती
है तन्हाई ही तन्हाई
उजालों की कथाओं में
है परछाई ही परछाई
कहां जायें, कहें किससे
समझ में कुछ नहीं आता,
बड़ी मुश्किल हुई 'वर्षा'
नहीं कोई भी सुनवाई
       - डॉ. वर्षा सिंह