गुरुवार, अगस्त 15, 2019

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.... आज़ादी के गीत - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरी इस काव्य रचना को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 15 अगस्त 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=17597

आज़ादी के गीत
                  - डॉ. वर्षा सिंह

आज़ादी  के  गीत  हमेशा  गाएंगे ।
अपना प्यारा परचम हम लहराएंगे ।

संघर्षों के बाद मिली जो आज़ादी ,
उसका हम इतिहास सदा दोहरायेंगे ।

बलिदानों की गाथा को आदर्श बना,
नई राह पर  क़दम बढ़ाते  जाएंगे ।

चांद छू लिया, मंगल तक जा पहुंचेंगें,
अंतरिक्ष को  धरती  पर ले लाएंगे ।

एक देश है भारत, रंग हज़ारों हैं ,
रंग एकता का  "वर्षा"  दिखलाएंगे ।


🌱 वृक्षारोपण...🌿 .... डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

        🌱  वृक्षारोपण...🌿 मेरी साड़ी में भी वृक्ष...🌳 है न मज़ेदार बात !🌴 😊












गुरुवार, अगस्त 08, 2019

गीत... सृजन हमारा - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरे गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 08 अगस्त 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
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गीत

सृजन हमारा ....

                 - डॉ. वर्षा सिंह

जीवन का जब छंद नया बन जाएगा
सृजन हमारा तभी रंग ला पायेगा

भाषा केवल संप्रेषण तक ही नहीं रहे
भावों की सरिता बनकर निर्बाध बहे
रूप, बिंब, संदर्भ, अर्थ सब नूतन हों
शब्द-शब्द विस्तारित हो आल्हाद गहे
 विषय वस्तु और कथ्य नया ले आएगा
सृजन हमारा तभी रंग ला पायेगा

सिर्फ कल्पना ही हावी ना हो पाए
सच के नव आयामों से भी सज जाए
स्वयं बढ़े दृढ़ता से मुश्किल राहों पर
विचलन से बचने का गुर भी सिखलाए
प्रासंगिकता लेकर सबको भायेगा
सृजन हमारा तभी रंग ला पाएगा

मनोराग के साथ बुद्धि का संगम हो प्रगतिशीलता का भी उसमें सरगम हो
अनुभव से वैचारिकता को पुष्टि मिले
लेखन मावस नहीं, वरन् वह पूनम हो
जीवन में नव दृष्टि, नयापन लाएगा
सृजन हमारा तभी रंग ला पाएगा

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#गीतवर्षा

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शनिवार, जुलाई 27, 2019

"वर्षा पर वर्षा सिंह के गीत" ... पावस गीत - डॉ. वर्षा सिंह

     
Dr. Varsha Singh
मध्यप्रदेश शासन के जनसंपर्क विभाग की गौरवशाली, प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका "मध्यप्रदेश संदेश" के जुलाई 2019 अंक में मेरे परिचय सहित मेरे 06 पावस गीत "वर्षा पर वर्षा सिंह के गीत" शीर्षक से प्रकाशित हुए हैं। जिन्हें मैं यहां अपने इस ब्लॉग के सुधी पाठकों हेतु प्रस्तुत कर रही हूं।
"मध्यप्रदेश संदेश" सम्पादकीय मण्डल के प्रति आभार !!!







                      पावस गीत - 1

                                   - डॉ. वर्षा सिंह

धरा भीगी हुई, भीगा हुआ नभ आज है।
            बूंद की राग में बजता, रिमझिमी साज है।।

बरसते बादल हैं हर पल
चमकती बिजली भी चंचल
हवाएं करती हैं हलचल
छनकती बारिश की पायल 
घाट से ले कर पर्वत तक, नीर का राज है
            धरा भीगी हुई, भीगा हुआ नभ आज है।

मिट गई सूरज से अनबन
मिल गया पौधों को जीवन
बांध कर पावस का बंधन
भर गया फूलों से उपवन
गूंजती हर्ष में डूबी, नई आवाज़ है
            धरा भीगी हुई, भीगा हुआ नभ आज है।

बदलते   मौसम के तेवर
धुल  गए सूखे के  अक्षर
तृप्ति का जल भीतर-बाहर
भर गए ताल, नदी, पोखर
मेघ, ‘वर्षा’ का ये देखो नया अंदाज़ है
           धरा भीगी हुई, भीगा हुआ नभ आज है।
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पावस गीत - 2

                 - डॉ. वर्षा सिंह

गरमी के झुलसाते दिन तो गए बीत
मौसम ने  गाया है पावस का गीत
                 पावस का गीत, पावस का गीत।

कितना भी सूखे ने  कहर यहां ढाया 
अब तो है कजरारे  बादल की छाया
रिमझिम से सजती है पौधों की काया
इसको ही कहते हैं ऋतुओं की माया
दुनिया ये न्यारी है
परिवर्तन जारी है
दुख के हज़ार दंष
एक खुषी भारी है
रहती हर  हार में छुपी हुई जीत
मौसम ने  गाया है पावस का गीत
                 पावस का गीत, पावस का गीत।

गूंथ रहा मनवा भी सपनों की माला
पुरवा ने लहरा कर  जादू ये डाला
भीगी-सी रागिनी, स्वर में मधुषाला
हृदय के  भावों को छंदों में ढाला
बारिष की लगी झड़ी
सरगम की जुड़ी कड़ी
दिल तो है छोटा-सा
मचल रही  चाह बड़ी
राग है मल्हार और प्यार का संगीत
मौसम ने  गाया है पावस का गीत
                 पावस का गीत, पावस का गीत।


गांव में निराषा के आषा का डेरा
जागी उम्मीदों ने जी भर कर टेरा
रिमझिम फुहारों से खेलता सवेरा
सबका है सबकुछ ही, क्या तेरा-मेरा
बूंद की  अठखेली में
तृप्ति की   पहेली में
लहरों की चहल-पहल
नदी   अलबेली   में
खुषबू बन चहक रही ओर-छोर प्रीत
मौसम ने  गाया है पावस का गीत
                 पावस का गीत, पावस का गीत।

पड़ती हैं  धरती पर पावसी फुहारें
गली-गली बरस  रहीं अमृत की धारें
मेघों से  करती है बिजली  मनुहारें
टूट रहीं जल-थल के बीच की दीवारें
बिखरी हरियाली है
छायी खुषहाली है
फूलों के बंधन में
बंधती हर डाली है
पाया है  ‘वर्षा’ ने  अपना मनमीत
मौसम ने  गाया है पावस का गीत
                 पावस का गीत, पावस का गीत।

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पावस गीत - 3

                 - डॉ. वर्षा सिंह

एक गीत पानी की धारों पर
      पावस में भीगते किनारों पर।

सूरज, न चंदा, न तारे हैं
दिन डूबे 
रात के सहारे हैं
एक गीत मौसमी करारों पर
    अनुबंधित तड़ित के इशारों पर।

झीलें, न झरनें, न पोखर है
पानी का 
स्रोत बना अम्बर है
एक गीत भीगते कगारों पर
     जलपूरित हवा के सवारों पर।

रोदन, न शोक, न सियापे हैं
खुशियों की
गूंजती अलापें हैं
एक गीत पड़ती बौछारों पर
    मन-मन को छेड़ती फुहारों पर।
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पावस गीत - 4

     - डॉ. वर्षा सिंह

हरियाली बारिश के घिर आए दिन
         रात है अंधेरी और 
             बदराए दिन।

खपरैली छत पर जब
बूंद झरे
लगता है जैसे 
आकाश गिरे
       सिहर-सिहर जाएं
           दुबराए दिन।

मन दौड़े खेतों में
मेड़ों में
झूले भी दिखते हैं 
पेड़ों में
        यादें ही यादें 
        दुहराए दिन।

मेंहदी के बूटे भी
हंसते हैं
कुछ सपने आंखों में 
बसते हैं
        जब से फिर आए 
          कजराए दिन।

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पावस गीत - 5

     - डॉ. वर्षा सिंह

सिर चढ़ कर बोल रही 
पावस की प्रीत
जलधारा भूल गई बंधन की रीत।

वन-उपवन डोल रही
रसऋतु की छाया 
सम्मोहित गली-गली 
फूलों की माया 
गूंजता दिशाओं में रिमझिम संगीत 
जलधारा भूल गई  बंधन की रीत।

शिखरों से घाटी तक
हरियाली छाई 
झूमती लताओं ने
सुधबुध बिसराई
काई ने गाया फिर फिसलन का गीत
जलधारा  भूल गई बंधन  की रीत।

जलपाखी लिखते हैं 
प्रणय की ऋचाएं
बादल की ताल पर
बूंद की कलाएं
हारे तटबंध, हुई “वर्षा“ की जीत
जलधारा भूल गई बंधन की रीत।

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पावस गीत - 6

     - डॉ. वर्षा सिंह

साध  सुहागन हुई 
कुमुदिनी फूली बेला ताल 
गोरी हुई निहाल, कुमुदिनी फूली बेला ताल। 

लाल किनारी वाली साड़ी 
गर्दन तक खींचे घूंघट 
देवरानी जू ,भौजी, माई ,
गली, गांव पनघट- पनघट
फैले संबोधन की जाल 
गोरी हुई निहाल, कुमुदिनी फूली बेलाताल। 

रिमझिम रिमझिम वर्षा बरसे
पीहर की यादें ताज़ा
सखी सहेली से अठखेली
मन रानी, मन ही राजा
कैसे मां-बाबू के हाल
गोरी हुई निहाल, कुमुदनी फूली बेलाताल। 

मेहंदी वाले हाथ पसारे 
बैठी ठाकुर जी के दर 
चारदिवारें छप्पर वाली 
यानी उसका अपना घर 
रहे सदा खुशहाल 
गोरी हुई निहाल, कुमुदिनी फूल बेलाताल।

भुनसारे से सांझ हुए तक
काम- काज की बातें हैं
फिर सजना की बाहों में तो
मीठी-मीठी रातें हैं
लगता बड़ा भला ससुराल
गोरी हुई निहाल, कुमुदनी फूली बेलाताल।

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शुक्रवार, जुलाई 26, 2019

गीत... क्या कीजे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

 छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित समाचार पत्र "नवीन क़दम" के बृहस्पतिवारीय साहित्यिक परिशिष्ट दि. 25.07.2019 अंक में मेरा गीत "क्या कीजे" प्रकाशित हुआ है। Please read & share...
Thanks Team "Naveen Kadam"

 गीत
                 क्या कीजे
                        - डॉ. वर्षा सिंह

याद आ गई प्रेम कहानी क्या कीजे
आंखों से छलका है पानी क्या कीजे
क्या कीजे, मन भूल न पाया है कुछ भी
प्यार की मीठी बोली बानी क्या कीजे

कच्चे मन में पक्का सा उत्साह लिए
दिल मिलते बिन दुनिया की परवाह किए
गहरी गहरी सांसे लंबी आह लिए
लिख लिख कर ख़त कितने पन्ने स्याह किए
एक था राजा एक थी रानी क्या कीजे
याद आ गई प्रेम कहानी क्या कीजे

वीराने में गुलशन जैसे मिल जाते
सपनों वाले फूल गुलाबी खिल जाते
अनबोले से होंठ अचानक हिल जाते
घड़ी विदा की आती लम्हे छिल जाते
चुनरी- चोली सब कुछ धानी क्या कीजे
याद आ गई प्रेम कहानी क्या कीजे

व्यर्थ बहाने हुए सभी ने जान लिया
इश्क में डूबे दिलवाले, पहचान लिया
एक ना होने देंगे इनको, ठान लिया
जाति धर्म के बंधन ने शमशान दिया
बात हो गई बहुत पुरानी क्या कीजे
याद आ गई प्रेम कहानी क्या कीजे

काश मोहब्बत के भी अच्छे दिन आएं
इसी जहां में हमराही मंजिल पाएं
दीवारों के सारे झगड़े मिट जाएं
“वर्षा”- बूंदे नई- नई खुशियां लाएं
यही हमेशा हमने ठानी क्या कीजे
याद आ गई प्रेम कहानी क्या कीजे
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#गीतवर्षा
गीत... क्या कीजे - डॉ. वर्षा सिंह


बुधवार, जुलाई 24, 2019

गीत ... शिकायत ज़िन्दगी से है - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       मेरे गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 24 जुलाई 2019 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
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*गीत*

शिकायत ज़िन्दगी से है....

                 - डॉ. वर्षा सिंह

सुबह ताज़ा हवा में झड़ रहे थे फूल पीले से नहीं गुंथ पा रहे थे चोटियों में बाल गीले से

सपन जो रात को देखा खुली आंखों से अक्सर
किसी को हमसफर पाया नई राहों में अक्सर
अजब सी कसमसाहट लग रहे थे बंध ढीले से
नहीं गुंथ पा रहे थे चोटियों में बाल गीले से

शिकायत ज़िन्दगी से है, मगर क्या है न जाने
उदासी की वज़ह क्या है, कोई आए बताने
लिखे थे गीत जिस पर, लग रहे कागज वो सीले से
नहीं गुंथ पा रहे थे चोटियों में बाल गीले से

सवालों की कतारें कम नहीं होती ज़रा भी
 हुई मुश्किल नहीं दिखता जवाबों का सिरा भी
हुए हैं चाहतों के पंख मानो स्याह नीले से

सुबह ताज़ा हवा में झड़ रहे थे फूल पीले से नहीं गुंथ पा रहे थे चोटियों में बाल गीले से
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#गीतवर्षा

गीत... शिकायत ज़िन्दगी से है - डॉ. वर्षा सिंह