गुरुवार, मई 03, 2018

साहित्य वर्षा -2‘प्रीत का पाहुन’ और कवि सीरोठिया का छायावादी स्वर - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसमें सागर शहर  के वरिष्ठ कवि डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया के काव्य पर मैंने यह आलेख लिखा है- "प्रीत का पाहुन और कवि सीरोठिया का छायावादी स्वर " । कृपया पढ़िए और मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को जानिए ....
साहित्य वर्षा - 2
            
‘प्रीत का पाहुन’ और कवि सीरोठिया का छायावादी स्वर
                             - डॉ. वर्षा सिंह
                                                                        आदि मानव ने जब पंक्षियों के मधुर कंठों का गायन सुना होगा, नदियों-झरनों के नाद घोष में आत्मा की पुकार अनुभव की होगी, उन्मुक्त प्रकृति के प्रांगण में चांद-तारों की रोशनी में, फूलों की हंसी में सौंदर्य भाव बोध अनुभव किया होगा, उसी समय से गीतों ने आकार पाया होगा। अनेक विद्वान मानते हैं कि गीत काव्य की शायद सबसे पुरानी विधा है। महाकवि निराला ने ‘गीतिका’ की भूमिका में कहा है, ‘गीत-सृष्टि शाश्वत है। समस्त शब्दों का मूल कारण ध्वनिमय ओंकार है। इसी निःशब्द-संगीत से स्वर-सप्तकों की भी सृष्टि हुई। समस्त विश्व, स्वर का पूंजीभूत रूप है।’ 
जीवन के विभिन्न रस-भावों के अनुभव से गीत की उत्पत्ति होती है। यह लयात्मकता शब्द की उड़ान से उत्पन्न होती है। स्वर, पद और ताल से युक्त जो गान होता है वह गीत कहलाता है। गीत, सहित्य की एक लोकप्रिय विधा है। इसमें एक मुखड़ा तथा कुछ अंतरे होते हैं। प्रत्येक अंतरे के बाद मुखड़े को दोहराया जाता है। गीत में एक ही भाव, एक ही विचार एक ही अवस्था का चित्रण होता है।
डॉ. भगवतशरण उपाध्याय ने गीत को परिभाषित करते हुए कहा है- ‘‘गीत कविता की वह विधा है जिसमें स्वानुभूति प्रेरित भावावेश की आर्द्र और कोमल आत्माभिव्यक्ति होती है।’’
इसी सन्दर्भ में केदार नाथ सिंह कहते हैं - ‘‘गीत कविता का एक अत्यन्त निजी स्वर है ग़ीत सहज, सीधा, अकृत्रिम होता है।’’
डॉ. नगेन्द्र के अनुसार- “गीत वास्तव में काव्य का सबसे तरल रूप है।’’
इस प्रकार गीत की मूल विशेषताएं है गीत में कवि की भावना की पूर्ण व व्यापक अभिव्यंजना समाई रहती है। गीत कवि के भावावेश अवस्था से उत्पन्न होता है। गीत एक पद में एक ही भाव की निबद्ध रचना होता है। संगीतात्मकता भी इसका एक विशेषगुण है।
गीत एक ऐसी विधा है जिससे मनुष्य का जुड़ाव अपने जन्म से ही हो जाता है। मां की लोरी के रूप में गीत के शब्द, छंद, स्वर मनुष्य के हृदय में बस जाते हैं। गीत की सबसे बड़ी शक्ति होती है उसकी ध्वन्यात्मकता। गीत हृदय से उत्पन्न होते हैं। संवेदनाओं, अनुभूतियों व भावनाओं के ज्वार जब उमड़ते हैं तो गीत किसी नदी के जल के समान बह निकलते हैं। उनमें भावनाओं की वे सारी तरंगें होती हैं जो गीत को सुनने और पढ़ने वाले के हृदय को रससिक्त कर देती है। जैसे लोरी के लिए हृदय में ममत्व की आवश्यकता होती है उसी प्रकार गीत रचने के लिए प्रत्येक भावना को आत्मसात् कर लेने की क्षमता की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही आवश्यकता होती है अभिव्यक्ति के उस कौशल की जो कठोर से कठोर तथ्य को कोमलता के साथ प्रस्तुत कर सके। डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया में वह कौशल है कि जिससे वे दुनिया के तमाम खुरदुरे अहसास को बड़ी ही कोमलता से अपने गीतों में ढाल देते हैं। यूं भी एक चिकित्सक जब गीत लिखता है तो उसमें संवेदनाओं का एक अलग ही स्वर होता है। एक ऐसा स्वर जिसमें जगत की तमाम कोमल भावनाओं का अनहद नाद समाहित रहता है। व्यक्ति व समाज की भावनाओं, संवेदनाओं व अपेक्षाओं को अपेक्षाकृत अधिक निकट से परखता है, जान पाता है एवं ह्ृदय तल की गहराई से अनुभव कर पाता है। डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया ने अपने जीवन में एक सफल चिकित्सक होने के साथ ही एक सफल गीतकार की भूमिका को भी आत्मसात किया है। यूं तो अब तक उनके चार गीत संग्रह ‘‘साक्षी समय है’’, ‘‘गीतों का मधुबन’’,‘‘सुधियों का आंचल’’ तथा ‘‘रजनीगंधा अपनेपन की’’ प्रकाशित हो चुके हैं। ‘‘प्रीत का पाहुन’’ डॉ. सीरोठिया का पांचवां गीत संग्रह है। 
‘प्रीत का पाहुन’ के गीत मूलतः छायावादी हैं। संयोग एवं वियोग इन गीतों का मूल विषय भाव है। इन गीतों में प्रेम, मिलन, विरह, स्मृतियां, एवं सामाजिक सरोकार का सुंदर समन्वय हैं। प्रस्तुत कृति, जिसमें भावपक्ष तो उत्कृष्ट है ही कलापक्ष भी सफल, सुगठित व श्रेष्ठ है। यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है कि जब गीत विधा नवगीत और मुक्तिका से हो कर अपने मूल स्वरूप को पुनः पाने के लिए जूझ रही है, ‘‘प्रीत का पाहुन’’ जैसी कृति का प्रकाशित होना गीत के संघर्ष के विजय का प्रतीक बन कर उभरता दिखाई देता है। हरिवंश राय ‘बच्चन’, गोपाल दास ‘नीरज’ जैसे गीतकारों ने जिस लयात्मकता और संवाद भाव से गीत लिखे हैं वही भाव डॉ. सिरोठिया के गीतों में दिखाई देता है। डॉ सीरोठिया ने ‘‘आत्म निवेदन’’ में इस बारे में स्वयं लिखा है कि ‘‘गीतों की सफलता और सार्थकता संवाद शैली में होती है।’’ इस संवाद शैली का एक उदाहरण देखिए -
आसमान के चांद-सितारे
  मिटा न पाए जो अंधियारे
    तुमने मन के अंधियारों में
      नेह दीप उजियार दिया है
        तुमने कितना प्यार दिया है।   (पृ. 35)
  
अपनों द्वारा प्रदत्त पीड़ा अधिक कष्टदायी होती है, नैराश्य भी उत्पन्न करती है परन्तु डॉ सीरोठिया के विरहगीतों में भी नैराश्य नहीं है अपितु व्यक्तिगत दुख दुनियावी दुख से एकाकार होता चलता है जैसे ये पंक्तियां देखें -
          मुस्कुराहट के नए मैं गीत लिख कर क्या करूंगा
          बस्तियां जब प्यार की वीरान होती जा रही हैं

इसी गीत के अंतिम बंध की पंक्तियां -’
          पिंडलियों का दर्द जब
            हर सांस भारी हो रहा है
             मंज़िलों के गीत मोहक
              किस तरह मैं गुनगुनाऊं
               कौन सौंपेगा किसे अब
                बोझ दायित्वों का आगे-
                 पीढ़ियां आपस में जब
                  अनजान होती जा रही हैं।   (पृ. 53-54)

डॉ सीरोठिया के गीतों में प्रेम के प्रति समर्पण की विशेष छटा दिखाई देती है। एक ऐसी छटा जिसमें लौकिक प्रेम से आगे बढ़ कर अलौकिक प्रेम ध्वनित होने लगता हैं। जैसे शायर मौजीराम ‘मौजी’ का मशहूर शेर है- 
         दिल के आईने में है तस्वीर-ए-यार
         जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली

प्रेम जब सप्रयास किया जाए तो वह प्रेम नहीं होता, वास्तविक प्रेम स्वतः घटने वाली घटना होती है जिसमें प्रियजन के प्रति समस्त चेष्टाएं स्वतः होती जाती हैं-
        सच कहता हूं अनजाने ही गीत रचे सब
          मैंने तो बस केवल नाम तुम्हारा गाया।
             सदा सत्य, शिव, सुन्दरता का सम्बल जिसमें
             प्यार मुझे वह पावन इक प्रतिमान रहा है,
             मेरे मन का रहा समर्पण इस सीमा तक
             अपने प्रिय का रूप मुझे भगवान रहा है,
             सच कहता हूं अनजाने हो गई प्रार्थना
             मैंने तो सिर मन मंदिर के द्वार झुकाया।  (पृ. 67)

गोपाल सिंह नेपाली ने कवि और वियोग का जो संबंध अपनी इन पंक्तियों में व्यक्त किया है कि - ‘‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजे होंगे गान
                   निकलकर आँखों से चुपाचाप, बही होगी कविता अनजान।’’
- यही भाव डॉ. सीरोठिया के विरह गीतों में एक अलग ही गरिमा के साथ प्रकट होता है। ये दो पंक्तियां देखिए -
         रही तुम्हारे मन में नफ़रत, मेरे मन में प्यार रहा
         यही हमारे रिश्ते का बस, जीवन में आधार रहा।   (पृ. 97)

या फिर इन पंक्तियों को देखिए -
        कोर नयन की बेमौसम जब भर आती है
        आकुल मन को पीड़ा अकसर दुलराती है     (पृ. 107)

डॉ. सीरोठिया ने अपने गीतों में नवीन बिम्बों का बड़े सुंदर ढंग से प्रयोग किया है। यदि कोई अपना सगा-संबंधी किसी बात पर रूठ जाए तो मन विकट दुविधा में पड़ जाता है। किसी तरह उस रूठे हुए संबंधी को मना भी लिया जाए और यदि वह मिलने आ भी जाए तो भी वह उलाहना देने से नहीं चूकता हैं। इसी विडम्बना को कवि ने प्रकृति और सामाजिक संबंधों की परस्पर तुलना करते हुए लिखा है कि- ‘
        रूठे रिश्तेदारों जैसे
          बहुत दिनों में आए बादल
            प्राण जले अंगारों जैसे
              तन-मन सब अकुलाए बादल।  (पृ. 47)

‘‘प्रीत का पाहुन’’ गीत संग्रह भाव-अनुभूतिजन्य गीत-कृति है अतः कलापक्ष को सप्रयास नहीं सजाया गया है अपितु वह कलात्मक गुणों से स्वतः ही शोभायमान है, सशक्त है। भाषा शुद्ध सरल साहित्यिक हिन्दी है। शब्दावली सुगठित सरल सुग्राह्य है। शैली छायावादी होते हुए भी दुरूह नहीं है। आवश्यकतानुसार लक्षणा व व्यंजना का भी बिम्ब प्रधान प्रयोग भी है। जल की तरह निर्मल एवं पारदर्शी भावनाओं को उकेरतीं ये गीत-रचनाएं कवि के रागात्मक आयाम से न केवल परिचय कराती हैं, बल्कि उनकी कहन, उनके शब्द रागात्मकता का सुंदर पाठ भी पढ़ाते हैं। ऐसा पाठ जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है और ऐसी दुनिया के निर्माण में सहायक बनता है जहां मनुष्य के ही नहीं वरन् जड़-चेतन के भी गीत गाये जाते हैं।
कहा जा सकता है कि डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया के गीतों में जीवन को ऊर्जा प्रदान करने वाली स्वतःस्फूर्त चेतना है। लोकधर्मी चेतना से ध्वनित डॉ सीरोठिया के इन गीतों में घनीभूत आत्मसंवेदना का सुंदर समन्वय है। हिंदी गीतों के संवर्द्धन और पुनर्स्थापन के प्रति डॉ सीरोठिया का यह गीत संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
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धन्यवाद सागर झील !!!

(साप्ताहिक सागर झील दि. 27.02.2018)
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साहित्य वर्षा - 8 संज़ीदा सरोकारों के शायर : डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ - डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र " सागर झील " में प्रकाशित मेरा कॉलम " साहित्य वर्षा " । जिसकी आठवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के संज़ीदा सरोकारों के शायर : डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’..... और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा - 8

संज़ीदा सरोकारों के शायर : डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’
  - डॉ. वर्षा सिंह
                                                                             
             सागर नगर में साहित्य की उर्वरा भूमि ने सभी विधाओं को समान रूप से अवसर दिया है। यहां कवि भी हैं, शायर भी हैं, नाटककार भी हैं, निबंधकार, कहानीकार और उपन्यासकार भी हैं। जहां तक ग़ज़लों का सवाल है तो यह सार्वभौमिक रूप से सागर में भी बेहद लोकप्रिय विधा है। सागर में ग़ज़लगोई करने वालों में एक उल्लेखनीय नाम है अनिल जैन ‘अनिल’ का जिन्हें डॉ. अनिल जैन और डॉ. अनिल कुमार जैन के भी नाम से लोग जानते हैं। 27 जून 1956 को सागर में जन्में डॉ. अनिल जैन बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। वे बी.फर्मा हैं, वैद्य विशारद और आयुर्वेद रत्न उपाधि प्राप्त होने के साथ ही पंजीकृत आयुर्वेद चिकित्सक भी हैं। विशेषता यह कि उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से मास्टर ऑफ म्यूजिक की उपाधि भी प्राप्त की है, जो उनके संगीत प्रेम का भी द्योतक है। डॉ. अनिल की अभिनय और फोटोग्राफी में भी बेहद दिलचस्पी है। साहित्य सृजन के क्षेत्र में उन्होंने ग़ज़लों के साथ ही गीत, दोहे, रुबाईयां, लघुकथायें, व्यंग्य लेख और नाटक भी लिखे हैं। ‘जज़्बा’ के नाम से उनका एक ग़ज़ल संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। डॉ. अनिल जैन हिन्दी-उर्दू मजलिस नामक साहित्यिक संस्था के संस्थापक हैं तथा विगत 16 वर्षां से साहित्यिक वार्षिक पत्रिका ‘परिधि’ का संपादन कर रहे हैं।
डॉ. अनिल जैन की ग़ज़लों में आघ्यात्म और भावना का सुन्दर समन्वय मिलता है। उनकी ग़ज़लों में अव्यवस्थाओं के प्रति प्रतिकार की भावना है और एक साफगोईपन है, जैसे ये शेर देखें -
हमको मत समझाओ हम सब जानते हैं।
हम  वही  करते हैं  जो  हम ठानते हैं।
तुम कहो, कुछ भी कहो, कहते रहो तुम
हम तो  बस  अपनी अक़ीदत मानते हैं।

अनुभवों के अनेकों पड़ावों से गुज़रते हुए डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ हर लम्हे की वास्तविकता को अपनी दृष्टि से परखते हैं और फिर उन्हें अपनी ग़ज़लों में पिरोते हैं। डॉ. अनिल की ग़ज़लों में अदायगी की खूबी है तो कहन की वज़नदारी भी। समय की गंभीरता है तो श्रृंगार का कोमलपन भी। वे बड़ी संज़ीदगी से इश्क़ की बात करते हैं-
इश्क़  में  वो  मुक़ाम आया है।
दिल को खोया है दर्द पाया है।
आह, आंसू, उदास शामो-सहर
इश्क़ तोहफ़े में  साथ लाया है।

जहां तक कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति का प्रश्न है तो डॉ. अनिल को इसमें महारत हासिल है। उनकी ग़ज़लें बड़ी सादगी से दिल की बात कह जाती हैं -
हर अदा उसकी भा गई मुझको।
रोग दिल का लगा गई मुझको।
ग़मज़दा देख कर,   हंसाने को
गीत  बुलबुल सुना गई मुझको।

किसी शांत स्वच्छ झील में एक कंकर उछाला जाता है तो पानी में तरंगें उठने लगती हैं। वैसे ही जब कोई बात मन को छू जाती है तो मन में भावनाओं की तरंगे हिलोरे लेने लगती हैं और तभी सृजित होती है इस प्रकार की ग़ज़ल -
इसी उम्मींद में हम तो इधर निकल आए।
नदी नहीं न सही, इक नहर निकल आए।
यूं हाथ, हाथ पे रख  बैठने से क्या होगा
करें कुछ आप कोई रहगुज़र निकल आए।

अभिव्यक्त का लहज़ा हरेक ग़ज़लकार की अलग पहचान बन जाता है. ग़ज़लगोई एक संवेदनशील क्रिया है। वस्तुतः यह एक अनुभूति है जो मन की भावनात्मक हलचल से उपजती है और काव्यात्मक अभिव्यक्ति के लिए विवश कर देती है। लेकिन यह अभिव्यक्ति तभी सार्थकता का चोला पहनती है जब उसे पढ़ने और सुनने वाला उसे अपनी अभिव्यक्ति महसूस कर गुनगुना उठता है। डॉ. अनिल की ग़ज़लों में यह खूबी है। एक बानगी देखिए -
हर मौसम  का  आना-जाना  इन आंखों ने देखा है।
फूल का खिलना फिर मुरझाना इन आंखों ने देखा है।
कैसा  प्यार,  मुहब्बत  कैसी, सभी  क़िताबी  बातें हैं
खेल के दिल से दिल बहलाना इन आंखों ने देखा है।

आज हम जिस परिवेश और यथार्थ में सांसें ले रहे हैं, वह पूरी तरह से चुनौतीभरा है। एक प्रवुद्ध ग़ज़लकार के नाते डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ इस पीड़ा को अच्छी तरह समझते हैं और अपनी ग़ज़लों में व्यक्त करते हैं। उनके शेर वर्तमान हालात पर कटाक्ष करते हैं -
खो  गई  सारी  दुआएं,  शहर में क्या गांव में।
अब नहीं मिलती  वफ़ाएं,  शहर में क्या गांव में।
क्या ग़लत है, क्या सही है, आदमी की जात को
सर  नहीं  इसमें  खपाएं, शहर में क्या गांव में।
यथार्थ की विसंगतियों की खुरदरी ज़मीन तैयार करता है तो दूसरी ओर कल्पना और सौन्दर्य एक ऐसी दुनिया रचता है जिसमें सब कुछ मीठा और मधुर अहसास कराता है। जैसे डॉ़ अनिल के लम्बे बहर के इन शेरों में अनुभव कीजिए -
निखर गई कली-कली,  चमन-चमन महक उठा,  बहार ही बहार है।
ये कान में मेरे सनम,   है  भंवरा  गुनगुना  रहा,  बहार ही बहार है।
ये दिल फ़रेब वादियां, ये शोख-शोख तितलियां, गिरा रही हैं बिजलियां
ये  मौसमें  बहार  है,  बहार  राग   तो  सुना,   बहार ही बहार है।

छोटी बहर की ग़ज़लों में भी डॉ. अनिल ने उसी खूबी से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है, जो खूबी उनकी लम्बी बहरों की ग़ज़लों में दिखाई देती है। छोटी बहर की ग़जत्रल के कुछ शेर बानगी के तौर पर -
जीवन में दुख गहरे हैं।
सच पे झूठ के पहरे हैं।
इस दुनिया में लोगों के
होते दो-दो चहरे हैं।
सूनी-सूनी  आंखों में
क्या-क्या ख़्वाब सुनहरे हैं।
बस्ती   में   ख़ामोशी  है
रहते   गूंगे    बहरे  हैं।

डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ की ग़ज़लों के सरोकार दुख से हैं तो सुख से भी हैं, विरह से हैं तो मिलन से भी हैं, जीवन के कठोर यथार्थ से हैं तो कोमल कल्पनाओं से भी हैं। कुलमिला कर एक ऐसी समग्रता डॉ. अनिल की ग़ज़लों में देखने को मिलती है जो उनके भीतर के शायर को अभिव्यक्ति की ऊंचाइयों तक ले जाती है। 

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(साप्ताहिक सागर झील दि. 24.04.2018)
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साहित्य वर्षा : 07 डॉ. गजाधर सागर की ग़ज़लों में समसामयिक परिवेश    - डॉ. वर्षा सिंह        

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा" । जिसकी सातवीं कड़ी में पढ़िए मेरे शहर सागर के वरिष्ठ कवि एवं शायर डॉ. गजाधर सागर की ग़ज़लों में समसामयिक परिवेश।....  और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को  ....

साहित्य वर्षा : 7

डॉ. गजाधर सागर की ग़ज़लों में समसामयिक परिवेश
   - डॉ. वर्षा सिंह                                  
सागर नगर के काव्यात्मक पन्ने पर ग़ज़ल विधा के संदर्भ में यूं तो कई नाम हैं किन्तु अपने काव्यात्मक सरोकारों के कारण एक नाम अलग से रेखांकित किया जा सकता है और वह नाम है डॉ. गजाधर सागर का। एक लम्बे अरसे से डॉ. गजाधर सागर ग़ज़लें लिख रहे हैं। उनकी ग़ज़लों का समसामयिक परिवेश से सरोकार साफ़-साफ़ दिखाई देता है। चूंकि डॉ. सागर को उर्दू ग़ज़ल के शिल्प का भी बखूबी ज्ञान है इसलिऐ वे बड़ी सरलता से अपनी ग़ज़लों को उर्दू लहज़े में ढालते हैं।
कभी इस पार जाते हैं, कभी उस पार जाते हैं।
परिंदे सरहदों को तोड़ सौ-सौ बार जाते हैं।
मसाइब के पहाड़ों से, वो कैसे पार पाएंगे
इरादे जो कि पहले से, ही हिम्मत हार जाते हैं।

जब से हिन्दी ग़ज़ल के रूप में ग़ज़लों का एक और भाषाई रूप परवान चढ़ा तब से उर्दू और हिन्दी ग़ज़लों के शिल्प को ले कर चिन्तन भी जन्मने लगा। संदर्भगत् चर्चा आवश्यक है कि ग़ज़ल में शब्द के सही तौल, वज़न और उच्चारण की भांति काफ़िया और रदीफ़ का महत्व भी अत्यधिक है। काफ़िया के तुक (अन्त्यानुप्रास) और उसके बाद आने वाले शब्द या शब्दों को रदीफ़ कहते है। काफ़िया बदलता है किन्तु रदीफ़ नहीं बदलती है। उसका रूप जस का तस रहता है। मतला के दोनों मिसरों में तुक एक जैसी आती है और मकता में कवि का नाम या उपनाम रहता है। मतला का अर्थ है उदय और मकता का अर्थ है अस्त। उर्दू ग़ज़ल के नियमानुसार ग़ज़ल में मतला और मक़ता का होना अनिवार्य है वरना ग़ज़ल अधूरी मानी जाती है। लेकिन आज-कल ग़ज़लकार मकता के परम्परागत नियम को नहीं मानते है और इसके बिना ही ग़ज़ल कहते हैं। कुछेक कवि मतला के बगैर भी ग़ज़ल लिखते हैं लेकिन बात नहीं बनती है; क्योंकि गज़ल में मकता हो या न हो, मतला का होना लाज़मी है जैसे गीत में मुखड़ा। गायक को भी तो सुर बाँधने के लिए गीत के मुखड़े की भांति मतला की आवश्यकता पड़ती ही है। ग़ज़ल में दो मतले हों तो दूसरे मतले को ’हुस्नेमतला’ कहा जाता है। शेर का पहला मिसरा ’ऊला’ और दूसरा मिसरा ’सानी’ कहलाता है। दो काफ़िए वाले शेर को ’जू काफ़िया’ कहते हैं। डॉ. गजाधर सागर ग़ज़ल के शिल्पगत नियमों का गंभीरता से पालन करते हैं। उदाहरण देखिए -
जो हो सके तो ज़ीस्त में इतना कमाल कर ।
अपनी ख़ुशी से और को भी कुछ निहाल कर।
अय दिल हज़ार बार सही देखभाल कर।
किरदार को ज़रूर ही रख ले संभाल कर
ये वक़्त कह रहा है कि इतना ख़्याल कर।
अपने लिए न और का जीना मुहाल कर
जिन को दिया था हमने कलेजा निकाल कर।

हिन्दी में गज़ल लिखने की परम्परा काफी पुरानी है। अमीर खुसरो को यदि हिन्दी का पहला रचनाकार माना जाता हैं तो हिन्दी के पहले गजलकार भी अमीर खुसरो ही हैं। अमीर खुसरो ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी काव्य रचना की अंगभूत विधा के रूप में ग़ज़ल रचना का भी सूत्रपात किया। ख़ुसरो ने अपने समय की प्रचलित खड़ी बोली अर्थात् हिन्दवी में काव्य रचना की प्रक्रिया में फारसी साहित्य की इस प्रमुख विधा के कलेवर को अपनाकर नए प्रयोग के साथ उसे नया मुकाम देने की कोशिश की। ग़ज़ल का रदीफ़ फ़ारसी में है और क़ाफ़िया हिन्दवी में है। खुसरो के बाद कबीर और मीरा ने भी अपनी भक्ति भावना को व्यक्त करने के लिए इस विधा को अपनाया। शेर में काफिया का सही निर्वाह करने के लिए उससे सम्बद्ध कुछ एक मोटे-मोटे नियम हैं जिनको जानना या समझना कवि के लिए अत्यावश्यक हैं। दो मिसरों से मतला बनता है जैसे दो पंक्तियों से दोहा। मतला के दोनों मिसरों में एक जैसा काफिया यानि तुक का इस्तेमाल किया जाता है। इस तारतम्य में डॉ. गजाधर सागर का यह मतला देखें -
हर दिल में आ चली हैं तभी से ख़राबियां।
चेहरों पे जब से  आ गई हैं बेहिजाबियां।

ग़ज़ल की अपनी पृष्ठभूमि और हिंदी साहित्य की सामंती एवं दरबारी मानसिकता विरोधी प्रकृति इसका प्रमुख कारण रहा है। फ़ारसी साहित्य में विलासी राजाओं के विलास और मनोरंजन के लिए गज़लकार आशिक और माशूका की रोमैंटिक कथाओं को अभिव्यक्त करते थे। इसमें आम जनता के दुःख दर्द या प्रगतिशील चेतना की अभिव्यक्ति की कोई संभावना नहीं थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने हिंदी की साहित्य परंपरा में इसे सामंती एवं दरबारी चेतना मानते हुए ऐसे विषयों को साहित्य के लिए वर्जित घोषित किया है । यही कारण है कि जब शमशेर ने पारंपरिक रूमानी संस्कार के दायरे से बाहर आकर ग़ज़ल को लोक जीवन की सच्चाई और समग्रता से जोड़ने का ‘दुस्साहस’ किया तो डॉ. राम विलास शर्मा ने यह कहकर खारिज कर दिया कि“ ग़ज़ल तो दरबारों से निकली हुई विधा है, जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है !“ लेकिन भारतीय कवियों ने उनके इस विचार को झुठलाते हुए ग़ज़ल को भारतीय मानको पर स्थापित ही नहीं किया बल्कि बेहद लोकप्रिय विधा बना दिया। शायरों ने आमज़िन्दगी की दुश्वारियों को अपनी ग़ज़लों का विषय बनाया और उसे पूरी संज़ीदगी से सामने रखा। यही खूबी डॉ. गजाधर सागर के इन शेरों में देखी जा सकती है-
उनसे कभी तो पूछिए होती है भूक क्या
देखे हैं जिनने वक़्त पे पत्थर उबालकर।
“सागर“ चले चले न चले दोस्ती मगर
हर्गिज़ न दोस्ती में कभी तू सवाल कर।

डॉ. गजाधर सागर आज मानवता के गिरते हुए स्तर से परेशान नज़र आते हैं। उनका मानना है कि जो व्यक्ति दूसरों के दुख-दर्द में शामिल हो और दूसरों के काम आए वही सच्चा इंसान है।
बुग़्ज़ कीना रखे है, आदमी आज दिल में
आदमीयत रखे जो, आदमी वो सही है।
तीरगी के मुक़ाबिल, हो चिराग़ां भले कुछ
जो मिटा दे अंधेरा, रौशनी वो सही है।

अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. सागर कहते हैं कि सूरतें भले ही कितनी भी अच्छी क्यों न हों लेकिन जिनके मन में खोट है वे भलाई का काम कर ही नहीं सकते हैं -
सूरतें वो ,हैं भला किस ,काम की
ठीक ही जिन ,की नहीं हैं ,सीरतें

ऐसा नहीं है कि डॉ. सागर का सरोकार ज़िन्दगी के सिर्फ़ खुरदरेपन से हो, वे कोमल भावनाओं को भी उसकी शिद्दत से अपनी ग़ज़लों में रखते हैं-
रोज़ मिलने का बहाना हो गया
आपसे जब दोस्ताना हो गया
अब न भटकेगा ये दिल दर दर कभी
एक जब पुख़्ता ठिकाना हो गया
आपकी चाहत के सादे तीर का
ख़ुद-ब-ख़ुद ये दिल निशाना हो गया

सागर नगर के काव्य-संसार में डॉ. गजाधर सागर ने अपनी जो जगह बनाई है वह उनके समसामयिक परिवेश के सामाजिक सरोकारों के रूप में उनकी ग़ज़लों में तो दिखाई देती ही है, साथ ही उन्हें एक संज़ीदा शायर के रूप में स्थापित करती है।
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(साप्ताहिक सागर झील दि. 17.04.2018)
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सोमवार, अप्रैल 30, 2018

Happy Buddha Purnima !

प्रिय मित्रों,
      बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं !!!

May the auspucious occasion of Buddha Purnima enlighten you on the path of love, peace and truth.

Happy #BuddhaPurnima !

सोमवार, अप्रैल 23, 2018

HAPPY WORLD BOOK DAY ❗ 📚 📙📖📘📗📒📕📔📚

जाने कितना लिख्खा मैंने
जाने कितना बांचा मैंने. 📖
आड़ी तिरछी इस दुनिया में
ढूंढा अपना खांचा मैंने.

दागरहित जो दिखा हमेशा
वही फरेबी निकला अक्सर,
बदनामी जिसके सिर चिपकी
उसको पाया सांचा मैंने.

       📚 - डॉ. वर्षा सिंह

रविवार, अप्रैल 22, 2018

HAPPY EARTH DAY

बोतल-बोतल बिकता पानी
क़ैदी  जैसा  दिखता   पानी
"वर्षा" को आमंत्रित करता
मौसम को ख़त लिखता पानी
         🌍 - डॉ. वर्षा सिंह