शनिवार, जुलाई 23, 2016

My Poetry

बज रही बांसुरी
सज रही ज़िन्दगी
चांद की आहटें
सुन रही चांदनी
मन में कान्हा बसे
रोशनी -  रोशनी
इश्क़ गढ़ने लगा
हर तरफ आशिक़ी
नेह - "वर्षा" हुई
भीगती शायरी
- डॉ वर्षा सिंह

My Poetry


भोर हो कर भी ज़िन्दगी ठहरी
गर  ख़ुमारी  न रात की  उतरी

ज़िद पे गर आ गये विफल होगी
लाख़ दुश्मन की चाल हो गहरी

आइये मिल के हम करें कोशिश
हो  न  'वर्षा' कहीं  कभी  ज़हरी
    - डॉ वर्षा सिंह

रविवार, जून 05, 2016

पर्यावरण : बुंदेली छंद

पर्यावरण :- एक बुंदेली छंद
      - डॉ वर्षा सिंह

काट-काट जंगल खों,
बस्तियां बसाय दईं
मूंड़ धरे घुटनों पे
सबई अब रोए हैं।

‘पर्यावरण’ की मनो
ऐसी- तैसी कर डारी
बेई फल मिलहें जाके
बीजा हमने बोए हैं।

गरमी के मारे सबई
भुट्टा घाईं भुन रए
‘वर्षा’ खों टेर- टेर
बदरा खों रोय हैं।

कछू तो सरम करो
ऐसो- कैसो स्वारथ है
दूध की मटकिया में
मट्ठा जा बिलोए हैं।
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