बुधवार, अगस्त 16, 2017

यादों के ठिकाने

कुछ लिफाफे
कुछ टिकटें
कुछ पुरानी चिट्ठियां
कुछ तस्वीरें
और कुछ डायरी के पन्ने
               यादों के ठिकाने
               पता नहीं कहां- कहां होते हैं
- डॉ वर्षा सिंह

यादों के ठिकाने....

कभी सोते हुए
कभी जागते हुए
अचानक, अप्रयास
सामने आ जाती हैं
बीते हुए दिनों की कतरनें
                यादों के ठिकाने
                पता नहीं कहां- कहां होते हैं

               - डॉ वर्षा सिंह

मंगलवार, अगस्त 15, 2017

संघर्षों के बाद मिली है आज़ादी

संघर्षों के बाद मिली है आज़ादी
दिल की ले कर चाह पली है आज़ादी
हम भारत के लोग बढ़ाते क़दम जहां
परचम ले कर साथ चली है आज़ादी

- डॉ वर्षा सिंह

#IndependenceDayIndia

बुधवार, अगस्त 02, 2017

हम जहां पर हैं....

प्रिय मित्रों,
    मेरे ग़ज़ल संग्रह " हम जहां पर हैं" में संग्रहीत मेरी एक ग़ज़ल..... Please read & share.

हम जहां पर हैं वहां विज्ञापनों की भीड़ है।
मोहपाशी छद्म  के आयोजनों की भीड़ है।

अब नहीं पढ़ना सहज सम्पूर्णता से कुछ यहां,
मिथकथाओं की अपाहिज कतरनों की भीड़ है ।

किस तरह से हो सकेगा सर्वजनहित का कलन,
व्यक्तिगत रेखागणित के गोपनों की भीड़ है ।

शब्द कैसे हों प्रतिष्ठित, आइए सोचें जरा,
व्यर्थ के संकेत बुनते मायनों की भीड़ है।

"रात है" कह कर नहीं हल हो सकेगा कुछ यहां ,
रोशनी लाओ, अंधेरे बंधनों की भीड़ है।

टूटती अवधारणायें सौंप जाती हैं चुभन,
हर कदम रखना संभलकर, फिसलनों की भीड़ है।

श्रावणी लय से न "वर्षा" हो कहीं जाना भ्रमित,
छल भरे सम्मोहनी संबोधनों की  भीड़ है।

           - डॉ वर्षा सिंह

मंगलवार, अगस्त 01, 2017

सोमवार, जुलाई 31, 2017

ये बारिशों का मौसम - 2

सावन  का  ये  महीना ।
मुश्किल हुआ है जीना ।
ये बारिशों का मौसम ,
लागे कहीं भी जी ना ।
- डॉ वर्षा सिंह

ये बारिशों का मौसम -1

ये बारिशों का मौसम
है ख़्वाहिशों का मौसम
रूठों को मनाने की
कुछ कोशिशों का मौसम
- डॉ वर्षा सिंह

मंगलवार, जुलाई 18, 2017

Good Evening Everyone

My Poetry

भूल गये गांव.....

शहरी  हंगामें  में भूल  गये  गांव।
पनघट, चौबारे और पीपल की छांव।
बात-बात बिछती शतरंजी बिसात,
क़दम-क़दम चालें है, क़दम- क़दम दांव ।
         🍀 - डॉ वर्षा सिंह

Sagar Rahgiri

Organized by Dainik Bhaskar News paper & Rajguru Social Group, Sagar
Cheif Guest Me Dr Varsha Singh.

बुधवार, जुलाई 12, 2017

बारिश

अब तक तो बिताई थी तन्हाई में बारिश।
अब की दफा है बरसी शहनाई में बारिश ।
साजन हैं पास मेरे,  दिल भी है ख़ुश मेरा,
बीतेगी अब की बार तो पुरवाई में बारिश ।
         🍁 - डॉ वर्षा सिंह

रविवार, जुलाई 09, 2017

वर्षा गीत

वर्षा का गीत
                - डॉ. वर्षा सिंह

गरमी के झुलसाते दिन तो गए बीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
       वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

कितना भी सूखे ने  कहर यहां ढाया
अब तो है कजरारे  बादल की छाया
रिमझिम से सजती है पौधों की काया
इसको ही कहते हैं ऋतुओं की माया
दुनिया ये न्यारी है
परिवर्तन जारी है
दुख के हज़ार दंश
एक खुशी भारी है
रहती हर  हार  में  छुपी हुई जीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
     वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

गूंथ रहा मनवा भी सपनों की माला
पुरवा ने लहरा कर  जादू ये डाला
भीगी-सी रागिनी, स्वर में मधुशाला
हृदय के  भावों को  छंदों में ढाला
बारिश की लगी झड़ी
सरगम की जुड़ी कड़ी
दिल तो है छोटा-सा
मचल रही  चाह बड़ी
राग है मल्हार और प्यार का संगीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
      वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

गांव में निराशा के आशा का डेरा
जागी उम्मीदों ने जी भर कर टेरा
रिमझिम फुहारों से खेलता सवेरा
सबका है सबकुछ ही, क्या तेरा-मेरा
बूंद की  अठखेली में
तृप्ति की   पहेली में
लहरों की चहल-पहल
नदी   अलबेली   में
खुशबू बन चहक रही ओर-छोर प्रीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
      वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।

पड़ती हैं  धरती   पर  पावसी फुहारें
गली-गली बरस  रहीं अमृत की धारें
मेघों से  करती  है  बिजली  मनुहारें
टूट रहीं जल-थल के बीच की दीवारें
बिखरी हरियाली है
छायी खुशहाली है
फूलों के बंधन में
बंधती हर डाली है
पाया है ‘‘वर्षा’’  ने  अपना मनमीत
मौसम ने  गाया है  वर्षा का गीत
     वर्षा का गीत, वर्षा का गीत।
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शुक्रवार, जून 30, 2017